Wednesday, October 28, 2015

आखिर तकलीद पर क्यो?

بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم

आखिर तकलीद पर क्यो?


ऐ ईमानवालो अल्लाह से इतना डरो जितना उससे डरने का हक़ हैं और तुम इस्लाम के सिवा किसी और दीन पर हर्गिज़ न मरना| (क़ुरान)
ऐ ईमानवालो अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो और अपने आमाल को बरबाद मत करो| (कुरान)
तुममे बेहतर शख्स वो हैं जो कुरान सीखे और सिखाये|(हदीस)


इस्लाम के शुरु के 400 साल तक तकलीद का नामोनिशान नही था फ़िर अचानक 4 मज़हबो की बुनियाद पड़ गयी और लोगो मे ये बात आम हो गयी चार मज़हब मे से किसी एक मज़हब की पैरवी फ़र्ज़ हैं बिना किसी एक मज़हब की पैरवी के इन्सान कामयाब नही हो सकता| अस्तगफ़िरुल्लाह लोग तकलीद को फ़र्ज़ कहने मे हिचकिचाये भी नही| फ़र्ज़ जो के सिर्फ़ अल्लाह के लिये है, ये तक भी लोगो ने ना सोचा की सिर्फ़ अल्लाह किसी चीज़ को फ़र्ज़ करता हैं अगर तकलीद फ़र्ज़ हैं तो अल्लाह इस लफ़्ज़ का इस्तेमाल कुरान मे भी ज़रूर करता या नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम इसको सहाबा को ज़रूर बताते| अगर तकलीद को फ़र्ज़ मान लिया जाये तो नाऊज़ोबिल्लाह अव्वल मुस्लीमीन जो सहाबा थे उनके बाद ताबाईन, उनके बाद ताबाअ ताबाईन, उनके बाद ताबाअ ताबाअ ताबाईन से एक फ़र्ज़ छुट गया| अस्तगफ़िरुल्लाह ! क्या आज का मुसलमान इनसे ज़्यादा मुत्तकी, परहेज़गार हैं| आईये ज़रा इस फ़र्ज़ को जिसे उम्मत मुसलिमा करती चली आ रही हैं इस पर गौर करते है |

तकलीद के मायने
लुगत से - गर्दन बन्द(गले का पट्टा) गले मे डालना और किसी की ज़िम्मेदारी पर काम करना और अपनी गर्दन पर कोई काम ले लेना और माअनी मज़ाज़ी ये हैं की ताबेदारी बगैर हकीकत मालूम किये करना| गले का पट्टा |
(अज़ ग्यास अल लुगत पेज 103)

शराह से - तकलीद ये हैं के जिस कि बाबत मुल्ला कारी हनफ़ी रह0 अपनी किताब शरह कसिदा अमाली मतबुआ युसुफ़ी देहली सफ़ा 34 मे लिखते हैं कि-
तकलीद कुबूल करना किसी और की बात को बिना सबूत के, तो इस मुकल्लिद ने बोझा कुबूल कर लिया अपने इमाम की बात का और अपने इमाम की बात को गले का हार बना लिया|

मगतनम अल हसूल मे फ़ाज़िल कंधारी हनफ़ी फ़रमाते हैं-
तकलीद उस शख्स की बात पर बिना दलील अमल करना हैं जिस की बात शरई हुज्जतो मे से ना हो| तो रुजु करे मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम और इज्माअ से तकलीद नही|
(मयारुल हक़ मतबुआ रहमानी पेज 37)

लिहाज़ा किसी की बात को उसकी दलील (सबूत) के बिना जाने मान लेना तकलीद हैं|


तकलीद कब शुरु हुई ?
शाह वलीउल्लाह किताब हुज्जतुल बलाग मतबुआ सिद्दीकी बरेली पेज 157 मे लिखते है कि-
मालूम होना चाहिए की चौथी सदी हिजरी से पहले के लोग किसी खालिस एक मज़हब पर मुत्ताफ़िक ना थे|

अल्लामा अल मौकाईन मतबुआ अशरफ़ अल मताबअ देहली जिल्द अव्व्ल पेज 222 मे हैं-
ये तक्लीद कि बिदअत चौथी सदी हिजरी मे जारी हुई हैं| ये वो ज़माना हैं कि जिस कि मज़म्मत मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम से साबित हो चुकी हैं|

अल्लामा सनद बिन अन्नान मालिकी तहरीर फ़रमाते हैं-
तक्लीद नाम का मज़हब न था जिसको पढ़ा पढ़ाया जाता हो और इसकी तकलीद की जाती हो बल्कि वो लोग वाकई मे कुरान व हदीस की तरफ़ रुजु करते थे और कुरान व हदीस मे न मिलने कि सूरत मे जिस तरफ़ उनकी बसीरत पहुँचती| इसी तरह ताबाईन रह0 करते रहे| यानि कुरान व हदीस कि तरफ़ रुजु करते अगर कुरान व हदीस से न मिलता तो इज्माअ सहाबा कि तरफ़ रुख करते, अगर इज्माअ भी न मिलता तो खुद इज्तेहाद करते और बाज़ सहाबी के कौल को कवि समझ कर इख्तेयार कर लेते| फ़िर ताबाअ ताबाईन का ज़माना आया| इस ज़माने मे इमाम अबु हनीफ़ा रह0, इमाम मालिक रह0, इमाम शाफ़ई रह0 और इमाम अहमद बिन हंबल रह0 हुए क्योकि इमाम मालिक रह0 ने 179 हिजरी मे वफ़ात पाई और इमाम अबु हनीफ़ा रह0 ने 150 हिजरी मे वफ़ात पाई और इसी साल इमाम शाफ़ई रह0 पैदा हुए और इमाम अहमद बिन हंबल रह0 164 हिजरी मे पैदा हुए| ये चारो भी पहले वालो के तरीके पर थे और इस ज़माने मे भी किसी खास शख्स का मज़हब मुकर्रर न था| जिस की ये चारो इमाम दर्स या तब्लीग करते हो बल्कि इनका अमल भी इत्तेबाअ सुन्नत था| लिहाज़ा तकलीद इनके ज़माने मे भी न वजूद मे आई और अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के कौल को सच कर दिखाया कि बेहतर ज़मानो मे पहले मेरा ज़माना हैं, फ़िर बाद वाले हैं, फ़िर बाद वाले हैं|(सहीह बुखारी)

तमाम तकलीद करने वालो पर अफ़सोस हैं के वो कैसे कहते हैं के दीन ए इस्लाम तकलीद वाला मज़हब हैं| हांलाकि जिन बुज़ुर्गो का नाम लेकर तकलीद की जाति हैं वो 200 हिजरी के आस-पास पैदा हुए हैं और खुद मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने जो बेहतर ज़माने की पेशनगोई की वो इससे पहले का हैं|


तकलीद की तरक्की
शाह वलिउल्लाह साह्ब हुज्जतुलाह अल बलाग मतबुआ सिद्दीकी बरेली पेज 151 मे फ़रमाते हैं-
इमाम अबु हनीफ़ा रह0 के शागिर्दो मे सब से ज़्यादा शोहरत इमाम अबु युसुफ़ रह0 कि हुई| हारुन रशीद के अहद मे काज़ी का मनसब (ओहदा) उनको हासिल हुआ जिसकी वजह से इमाम अबु हनीफ़ा रह0 का मज़हब फ़ैल गया और तमाम आस-पास के मुल्को इराक़, खुरासान तक इसकी शोहरत हुई और ये मज़हब फ़ैला|

तकलीद की मज़म्मत(विरोध)
अल्लाह ने क़ुरान मे फ़रमाया : इन लोगो ने अल्लाह को छोड़ कर अपने आलिमो और दुर्वेशो अपना रब बना रखा हैं और मरयम के बेटे ईसा को | हांलाकि उन्हें सिवाये अल्लाह के किसी और की इबादत का हुक्म ना दिया गया था जिसके सिवा कोई माबूद नही वो पाक हैं इनके शरीक मुकर्रर करने से|
(सूरह तौबा 9/31)

इमाम फ़खरुद्दीन राज़ी इस आयत की तफ़सीर अपनी तफ़सीर कबीर मतबुआ इस्ताम्बुलजिल्द जिल्दसाजी पेज 623 मे फ़रमाते हैं-
अकसर मुफ़्फ़सरीन कहते हैं की इस आयत मे अरबी लफ़्ज़ अरबाब से मुराद ये नही की यहुदी और ईसाई ने अपने मौलवियो और दुर्वेशो को खुदा बना लिया बल्कि इससे मुराद ये है के उन्होने उनकी इताअत की थी और अपने मौलवियो और दुर्वेशो के हलाल ठहराने को हलाल जानते और हराम ठहराने को हराम जानते|

इस आयत के बारे मे जब हज़रत अदी बिन हातिम रज़ि0 ने अल्लाह के रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम से पूछा के ऐ अल्लाह के रसूल हम तो अपने आलिमो और दुर्वेशो को अपना रब नही ठहराते| तो अल्लाह के रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया| क्या तुम उनके हराम की गयी चीज़ को जो अल्लाह ने हलाम की थी हराम ना जानते थे और क्या तुम उनके हलाल की गयी चीज़ जिसे अल्लाह ने हराम किया हलाल ना जानते थे| हज़रत अदी बिन हातिम रज़ि0 ने कहा हा ऐसा ही होता था तो अल्लाह के रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया "यही उनकी इबादत हैं" |


तकलीद का हदीस से जायेज़ा
हज़रत जाबिर रज़ि0 से रिवायत हैं : के हज़रत उमर रज़ि0 नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के पास तौरात का एक नुस्खा लाये और कहा ऐ अल्लाह के रसूल ये तौरात क नुस्खा है और पढ़ना शुरु किया और नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम क चेहरा सुर्ख होने लगा तो हज़रत अबु बक्र रज़ि0 ने कहा गुम करे तुझे तेरी मां, क्या नही देखता तू उस चीज़ को रसूल अल्लाह सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के चेहरे पर हैं| हज़रत उमर रज़ि0 ने नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के चेहरे की तरफ़ देखकर फ़रमाया मैं अल्लाह की पनाह मांगता हूं उसके गज़ब से और रसूल अल्लाह सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के गज़ब से| हम अल्लाह के रब होने पर और इस्लाम के दीन होने पर और मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के नबी होने पर राज़ी हुए|

फ़िर नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने फ़र्माया : कसम हैं उस ज़ात की जिस के हाथ मे मुहम्मद की जान हैं अगर मूसा तुम्हारे वास्ते ज़ाहिर होते और मुझे छोड़ कर तुम उनकी पैरवी करते तो सीधी राह से भटक जाते और अगर मूसा ज़िन्दा होते और मेरी नबूवत पाते तो सिवाए मेरी पैरवी के उनके पास कोई चारा न होता|"
(मिश्कात)

सहाबा रज़ि0, ताबईन रह0, और ताबाअ ताबईन से
हज़रत उमर रज़ि0 फ़रमाते थे कसम हैं उस ज़ात की जिस के कब्ज़े मे उमर की जान हैं नही कब्ज़ की अल्लाह ने अपने नबी रुह और न उठाया उन से वह्यी को यहां तक की बेपरवाह कर दिया अपनी उम्मत को राय से|
[ मीज़ान शीरानी मतबुआ मिस्र जिल्द 1 पेज 47 मे हैं ]

हज़रत उमर रज़ि0 जब कोई फ़त्वा देते तो कहते कि ये उमर कि राय हैं अगर ठीक हैं तो अल्लाह की तरफ़ से समझो वरना खता हो तो उमर कि तरफ़ से|
[ मीज़ान शीरानी जिल्द 1 पेज 47 मे हैं ]

शरीह रह0 कहते हैं कि हज़रत उमर ने मुझे खत लिखा इस मे ये था कि अगर कोई मसला दरपेश हो और कुरान मे हो तो इससे फ़ैसला करना, अगर ऐसी चीज़ पेश आये जो कुरान मे नही हैं तो इसका फ़ैसला सुन्न्त रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के मुताबिक करना, अगर असला कोई ऐसा पेश आये जो न कुरान मे हो न हदीस रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम मे हो तो अगर लोग किसी बात पर मुत्तफ़िक हो गये तो इस पर अमल करना| अगर अगर ऐसा मामला पेश आये जो न कुरान मे हो न हदीस मे हो न तुम से पहले इसे किसी ने कहा हैं तो तुझे इख्तेयार हैं कि इन दो बातो मे से एक पंसद करे| एक ये कि इज्तेहाद करके अपनी राय से फ़ैसला करे दूसरा ये के सुकूत कर और कोई फ़ैसला न कर| मेरी राय मे तेरे वास्ते सुकूत बेहतर हैं|
[हुज्जतुल बलाग मतबुआ सिद्दीकी बरेली पेज 154 ]

हज़रत जाबिर बिन जैद रज़ि0 से अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि0 ने फ़रमाया
कि तुम बसरा के फ़कीहो मे से हो इसलिये हमेशा फ़त्वा कुरान व हदीस के मुवाफ़िक ही देना अगर ऐसा न करोगे तो खुद भी हलाक होगे और हलाक करोगे|
[ हुज्जातुल बलाग पेज 153 ]

हज़रत अबुद्ल्लाह बिन मसऊद रज़ि0 फ़रमाते थे तकलीद करे कोई मर्द किसी मर्द की अपने दीन मे (इस तरह) की अगर ईमान लाये तो वो ईमान लाये ये और अगर काफ़िर करे वो तो काफ़िर करे ये|
[ मीज़ान शीरानी जिल्द 1 पेज 47 ]

हज़रत इब्ने मसऊद रज़ि0 फ़रमाते हैं
के कोई शख्स दीन के बारे मे किसी की तकलीद न करे क्योकि अगर वो मोमिन रहा तो इसका मुकल्लिद भी मोमिन रहेगा और अगर वो काफ़िर हुआ तो इसका मुकल्लिद भी काफ़िर रहेगा| बस बुराई मे किसी की पैरवी नही|
[ अल्लामा अलमौकईन मतबूआ अशरफ़ अल मताबेए जिल्द 1 पेज 217 ]

शाअबी रह0 कहते थे
कि कयास वालो के पास मत बैठो वरना तू हलाल को हराम और हराम को हलाल कर देगा|
[ अल्लामा अल मौकईन जिल्द 1 पेज 94 ]

दाऊद बिन अबी हिन्द रह0 कहते हैं
कि इब्ने सीरिन ने कहा की पहले जिस ने क्यास किया वो शैतान हैं और सूरज और चांद कि क्यास ही से इबादत की गयी हैं|
[ दारमी पेज 25 ]

मुजाहिद अपने शागिर्द से कहते थे
कि मेरी हर बात और हर फ़त्वा मत लिखा करो सिर्फ़ हदीस रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम को लिखने के कायल रहो शायद कि मैं आज जिन चीज़ो का हुक्म देता हूं कल इससे रुजु कर लूं|
[ मीज़ान जिल्द 1 पेज 48 ]


तकलीद की मनाही इमामो के कौल से
चारो इमाम से साबित हो चुका हैं कि उन्होने लोगो को अपनी तकलीद से मना किया हैं और यही हुक्म दिया हैं कि जब कोई बात उन को किताब व सुन्नत से मालूम हो जाये जो उनकी बात के खिलाफ़ हो तो इसी बात को ले जो किताब व सुन्नत से मालूम हुई हो और उन की बात को छोड़ दे|
[ फ़तावा इब्ने तैमिया मतबुआ मिस्र पेज 406 ]

इमाम अबू हनीफ़ा का हुक्म
इमाम अबू हनीफ़ा रह0 से किसी ने पूछा अगर आपने कुछ कहा और कुरान इस के खिलाफ़ हो, इमाम अबू हनीफ़ा रह0 ने जवाब दिया मेरी बात छोड़ दो| इसने फ़िर पूछा कि अगर नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम की हदीस आपकी बात के खिलाफ़ हो तो, इमाम अबू हनीफ़ा रह0 ने जवाब दिया मेरी बात छोड़ दो| इसने फ़िर पूछा अगर सहाबा रज़ि0 की बात आपकी बात के खिलाफ़ हो तो, इमाम अबु हनीफ़ा रह0 ने जवाब दिया मेरी बात छोड़ दो|
[ - ]

इमाम आज़म(अबु हनीफ़ा) रह0 ने अपने इस कौल से इशारा किया हैं कि जो नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम से पहुंचे वो सर आंखो कुबूल हैं, जो सहाबा रज़ि0 से पहुंचे इस मे इन्तिखाब करेंगें और जो सहाबा क सिवा ताबईन रह0 वगैराह से पहुंचे तो वो आदमी हैं और हम भी आदमी हैं|
[ मीज़ान शीरानी मतबुआ मिस्र पेज 29 ]

कलमात तैयबात मतबुआ मताला अलउलूम मे इमाम अबु हनीफ़ा रह0 क कौल नकल फ़रमाते हैं कि- "जब सही हदीस मिल जये तो वही मेरा मज़हब हैं|"
[ कलमात तैयबात मतबुआ मताला अलउलूम पेज 30 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 फ़रमाते थे कि लोग हिदायत पर रहेंगे जब तक कि उन मे हदीस के तलब करने वाले होंगें जब हदीस को छोड़ कर और चीज़ तलब करेंगे तो बिगड़ जायेंगे|
[ मीज़ान सफ़ा 49 ]

हदीसे मर्सल हमरे लिये हुज्जत हैं|
[ ऐनी शरह हिदाया मतबुआ जिल्द 1 पेज 253 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 फ़रमाते थे कि ज़ईफ़ हदीस मुझे ज़्यादा मह्बूब हैं लोगो कि राय से|
[ दुर्रे मुख्तार शरह दुर्रे मुख्तार मतबुआ देहली जिल्द 1 पेज 51 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 कहते हैं कि जो शख्स मेरी दलील से वाकिफ़ न हो उस को हक़ नही कि मेरे कलाम का फ़त्वा दे|
[ अकीदा अल जैद पेज 70 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 फ़रमाते हैं कि किसी को हलाल नही कि मेरी बात को माने जबकि ये न जाने की मैंने क्या कहा हैं, तो तकलीद से मुमानियत कि और मार्फ़त दलील कि जानिब तरगीब दी|
[ मुकदमा हिदाया जिल्द 1 पेज 93 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 फ़रमाते थे कि मेरी तकलीद मत करना और न मालिक रह0 कि और न किसी और कि तकलीद करना और अहकाम को वहा से ले जहा से उन्होने लिये हैं किताब व सुन्नत से|
[ मतबुआ फ़ारुकी से पेज 4 ]

इमाम मालिक का हुक्म
इमाम मालिक रह0 फ़रमाते थे मैं भी एक आदमी हूँ कभी मेरी राय सही और कभी गलत होती हैं, तुम मेरी राय को देख लो जो किताब व सुन्नत के मुताबिक हो इसको ले लो और जो मुखालिफ़ हो इसे छोड़ दो|
[ जलबू अल मनफ़आता पेज 74 ]

हाफ़िज़ हमीद ने हकायत की हैं कि कानबी ने ब्यान किया कि मैं इमाम मालिक रह0 के मर्ज़ मौत मे उनके पास गया और सलाम करके बैठा तो देखा उन को रोते हुए| मैंने कहा आप क्यो रोते हैं| फ़रमाया ऐ कानबी मैं क्यो न रोऊ मुझ से बढ़ कर रोने के काबिल कौन हैं मैंने जिस जिस मसले मे राय से फ़त्वा दिया, मुझे ये अच्छा मालूम होता हैं कि उन मसले के बदले कोड़े से मैं मार खाता, मुझको इसमे गुन्जाईश थी काश मैं राय से फ़त्वा न देता|
[ तारीख इब्ने खलकान मतबुआ इरान जिल्द जिल्दसाज पेज 11 ]

इमाम शाफ़ई का हुक्म
इमाम शाफ़ई रह0 फ़रमाते हैं जब मैं कहूँ और नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने मेरी बात के खिलाफ़ फ़रमाया हो तो, जो मसला नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम की हदीस से साबित हो वो अव्वल हैं, लिहाज़ा मेरी तकलीद मत करना|
[ अकदाल ज़ैद पेज 54 ]

इमाम शाफ़ई रह0 से रिवायत हैं वह फ़रमाया करते थे जब सहीह हदीस मिल जाये तो वही मेरा मज़हब हैं| एक और रिवायत मे हैं कि जब मेरी बात को हदीस के खिलाफ़ देखो तो हदीस पर अमल करो और मेरी बात को दीवार पर मार दो| एक दिन मजनी से कहा कि ऐ इब्राहिम हर एक बात मे मेरी तकलीद न करना और इससे अपनी जान पर रहम करना, क्योकि ये दीन हैं| इसके अलावा इमाम शफ़ई रह0 ये भी फ़रमाया करते थे कि किसी कौल मे हुज्जत नही हैं सिवाये रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के| चाहे कहने वाले बहुत ज़्यादा क्यो न हो, और न किसी क्यास मे, और न किसी शै मे| यहां बात सिवाये अल्लाह और उसके रसूल की तसलीम करने के और कुछ नही हैं|
[ अकदाल ज़ैद पेज 80 ]

अल्लामा मरजानि हनफ़ी फ़रमाते हैं इमाम शाफ़ई रह0 ने फ़रमाया कि सब मुसल्मानो ने इत्तेफ़ाक किया है नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम कि हदीस से तो किसी की बात से हदीस ना छोड़ी जाये|
[ नज़रातूलहक मतबुआ बल्गार पेज 26 ]

इमाम शाफ़ई रह0 ने इमाम अहमद रह0 से कहा कि सही हदीस का इल्म तुम को हम से ज़्यादा हैं, जो हदीस सही हुआ करे वह मुझे बता दिया करो ताकि मैं इसी को अपना मज़हब करार दूँ|
[ हुज्जतुल बलाग मतबुआ सिद्दीकी पेज 153 ]

इमाम अहमद बिन हंबल का हुक्म
इमाम अहमद बिन हंबल रह0 फ़रमाते थे कि किसी को अल्लाह और उसके रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के कलाम के साथ गुन्जाईश नही है|
[ अकदाल ज़ैद मतबूआ सिद्दीकी लाहौर पेज 81 ]

इमाम अहमद बिन हंबल रह0 के बेटे अब्दुल्लाह कहते हैं कि मैने अपने बाप अहमद बिन हम्बल रह0 से दरयाफ़्त किया कि एक शहर ऐसा हैं जहां एक मुहद्दीस हैं जो सही, ज़ईफ़ हदीस का इल्म नही रखता और एक सहाबुल राय हैं| अब आप फ़रमाये कि मैं किस से फ़तवा पूंछू| तो इमाम अहमद बिन हंबल रह0 सहाबुल हदीस से पूछो सहाबुल राय से नही|
[ मीज़ान शअरानी मे मतबुआ मिस्र जिल्द जिल्ददार पेज 51 ]

इमाम अहमद बिन हम्बल रह0 फ़रमाते थे कि अपना इल्म इसी जगह से लो जहां से इमाम लेते हैं और तकलीद मत करो क्योकि ये अंधापन हैं, समझे|
[ मीज़ान शअरानी मतबुआ मिस्र जिल्द जिल्ददार पेज 10 ]

इमाम अहमद बिन हम्बल रह0 फ़रमाते थे और फ़रमाया करते थे कि मेरी तकलीद न करना और न मालिक कि और न औज़ाई कि और न किसी और कि तकलीद करना और अहकाम को वहां से लेना जहां से उन्होने लिये हैं(किताब और सुन्नत)|
[ अकदाल ज़ैद मतबुआ सिद्दीकी लाहौर पेज 81 ]

इस तरह हर दौर के बुज़ुर्गो ने इस उम्मत पर आने वाली तबाही को पहले ही भांप लिया था और वक्त ब वक्त इससे आगाह करते रहे मगर अफ़सोस उम्मत गहरी गुमराहीयो मे गुम हो गयी और उस गुमराही को ही हक समझ बैठी और जो लोग कुरान और सुन्नत के पांबन्द हैं या पांबदी करने की कोशिश करते हैं उन्हें बदमज़हब का खिताब दे देते हैं|

अल्लाह कुरान मे फ़रमाता हैं और जो लोग अल्लाह कि उतारी हुई वह्यी(कुरान और सुन्नत) के साथ फ़ैसला न करें वो काफ़िर हैं|
[ सूरह माइदा 5/44 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 के इन्तेकाल के 278 साल के बाद 428 हिजरी मे उनकी तरफ़ मन्सूब करके पहली किताब कुदुरी लिखी गयी, फ़िर 573 हिजरी मे हिदाया लिखी गयी जिसे क़ुरान की तरह माना गया|(नाऊज़ोबिल्लाह) और ढ़ेरो मनगंढत मसले इमाम अबू हनीफ़ा कि तरफ़ मंसूब कर दिये गये और धीरे-धीरे लोग इस मज़हब पर एक के बाद एक जमा होते गये और हिन्दुस्तान मे इस मज़हब की बुनियाद पड़ गयी और अब तो हनफ़ी मसलक के भी अनगिनत टुकड़े हो गये|

नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम का इर्शाद हैं हज़रत अबू हुरैरा रज़ि0 रिवायत करते हैं कि नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – मेरी उम्मत एक ज़माने तक तो कुरान व सुन्नत पर अमल करती रहेगी इसके बाद उम्मती उम्मतीयो कि राय पर चलने लगेगा तो उम्मत गुमराह हो जयेगी|
[ इब्ने कसीर ]

बैतुल्लाह मे चार मुसल्ले
चोथी सदी हिजरी मे तकलीद निकली फ़िर तकलीदी मज़हब पैदा हुये फ़िर इनकी आपस मे इख्तेलाफ़ शुरु हुये|
हनफ़ी शाफ़ई मे इतना इख्तेलाफ़ बढ़ा कि एक दूसरे के पीछे नमाज़ न पढ़ते थे यहां तक की 665 हिजरी मे मिस्र मे चारो मज़हबो के चार काज़ी बना दिये गये| इसके बाद 900 हिजरी के शुरु मे बैतुल्लाह के अंदर चार मुसल्ले बना दिये गये| हालत ये थी जब एक इमाम जमात करा रहा होता तो तीन मसलक के दूसरे नमाज़ी बैठे रहते और एक दूसरे के पीछे नमाज़ नही पढ़ते|

वत तखेज़ू मिम मकामे इब्राहीमा व मुसल्ला की मिसाल को तकलीदी मज़हब ने पारा पारा कर दिया था| सुल्तान इब्ने मसूद रह0 कि कब्र को अल्लाह नूर से भरे कि जब अल्लाह ने उसे हिजाज़ का बादशाह बनाया तो उसने 1343 हिजरी मे बैतुल्लाह से इस बिदअत को मिटा दियाऔर चारो मुसल्लो को ढहा दिया और अल्हम्दुलिल्लाह अब एक ही मुसल्ले पर नमाज़ होती हैं|

सबसे ज़्यादा गौर फ़िक्र की बात ये हैं के आज जो मसलकी तकलीद का दम भरते हैं उनको तो शायद ये भी नही पता के जिन इमाम की तकलीद वो करते हैं खुद उन्होने या उनकी पिछ्ली पुश्त ने उनकी पिछली की पिछली पुश्त ने भी तकलीद को नही जाना सिवाये कुरान और हदीस के| सिर्फ़ सहाबा की जमात थी जो हर मसले का हल कुरान और हदीस से लेती थी लिहाज़ा जो कोई भी कुरान और हदीस से हट कर कही और से किसी और से मसले का हल तलाश करेगा वो खुली गुमराही मे पड़ जायेगा|

Posted by : Islam The Truth

Tuesday, October 27, 2015

मुख़्तसर सहीह अल बुखारी हिंदी में


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
मुख़्तसर सहीह अल बुखारी हिंदी में

नबी ए करीम की आखरी बात मैं अपने पीछे इस धरती पर दो चीज़े छोड़ कर जा रहा हूँ. अगर तुम इनको मजबूती से पकड़े रहोगे तो कभी गुमराह नही होंगे. वह है क़ुरान और मेरा तरीका ( हदीस). जो मेरा आवाज़ सुन रहा है वा उन लोगो तक पहुचा देना जो मेरा आवाज़ नही सुन रहा है. और वह लोग उनको जो उनके आगे आने वाले है, और बेहतर मेरे बातों को समझेगे. ए अल्लाह गवाह रहना हम ने सारे तेरे संदेश लोगो तक पहुँचा दिए. 

यह पुस्तक “मुख़्तसर सही बुख़ारी”, जिसका नाम “अत्तजरीदुस्सरीह लि-अहादीसिल जामिइस्सहीह” है, क़ुरआन करीम के बाद सबसे विशुद्ध और विश्वसनीय किताब सही बुख़ारी का संक्षेप है। इसमें इमाम अज़्ज़ुबैदी ने सहीह बुखारी की हदीसों को बिना तकरार के व बिना सनदों के उल्लेख किया है; ताकि बिना कष्ट के उसको याद करना आसान हो जाए। जो हदीस कई बार आई है उसे उसके पहले स्थान पर बाक़ी रखा है, यदि दूसरे स्थान पर उसमें कोई वृद्धि है तो उसे उल्लेख किया है अन्यथा नहीं। अगर एक मुख्तसर हदीस के बाद दूसरी जगह वह तफ्सील और वृद्धि के साथ आई है तो दूसरी हदीस को वर्णन किया है। तथा केवल उसी हदीस का चयन किया है जो सहीह बुख़ारी में मुत्तसिल व सनद के साथ है। मक़तूअ या मुअल्लक़ हदीस को छोड़ दिया है। यह पुस्तक इस किताब के उर्दु अनुवाद से हिंदी में रुपांतरित की गई है।

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Vol-1 | Vol-2 | Vol-3

सहीह अल बुखारी हिंदी में


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
सहीह अल बुखारी हिंदी में

आख़िरी नबी का आख़िरी संदेश
ए लोगो मेरे बातो को ध्यान पूर्वक सुनो, पता नही मैं इस साल के बाद तुम्हारे बीच रहूं या नही. इस लिए ज़रा ध्यान से सुनो जो मैं तुमको बाते बता रहा हूँ. और इन बातों को उन लोगो तक पहुचा दो जो इस वक़्त मौजूद यहा नही है.

याद रखो. एक दिन ईश्वर के सामने तुमको हाजिर होना है और अपने हर एक काम का जवाब देना होगा. याद रखो, सतमार्ग से विचलित मत होना, मेरे इस दुनिया से जाने के बाद. ए लोगो मेरे जाने के बाद ना कोई नबी या रसूल आएगा और ना ही कोई नयी धर्म. इस वजह से जो भी मैने संदेश तुम तक पहुचा दी है उस को अच्छी तरह समझ लेना.

मैं अपने पीछे इस धरती पर दो चीज़े छोड़ कर जा रहा हूँ. अगर तुम इनको मजबूती से पकड़े रहोगे तो कभी गुमराह नही होंगे. वह है क़ुरान और मेरा तरीका ( हदीस). जो मेरा आवाज़ सुन रहा है वा उन लोगो तक पहुचा देना जो मेरा आवाज़ नही सुन रहा है. और वह लोग उनको जो उनके आगे आने वाले है, और बेहतर मेरे बातों को समझेगे. ए अल्लाह गवाह रहना हम ने सारे तेरे संदेश लोगो तक पहुँचा दिए.

सहीह अल बुखारी पैगंबर मुहम्मद (PBUH) की हदीसो की सबसे सहीह Athentic संग्रह है. बुखारी के संग्रह हदीसो के सबसे प्रामाणिक संग्रह में से एक होने के लिए मुस्लिम विश्व की भारी बहुमत से मान्यता प्राप्त है.

सहीह अल बुखारी (अरबी: صحيح البخاري), फारसी मुस्लिम विद्वान मुहम्मद अल बुखारी द्वारा एकत्र किए गए थे। सुन्नी मुसलमानों "सहीह मुस्लिम" और Muwatta इमाम मलिक के साथ हदीस के तीन सबसे भरोसेमंद संग्रह में से एक के रूप में इस दृष्टिकोण। कुछ हलकों में, यह कुरान के बाद सबसे प्रामाणिक पुस्तक माना जाता है।

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Monday, October 26, 2015

TAQLEED GUMRAHI HAI



بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم

TAQLEED GUMRAHI HAI


Topic – “Kaha Muqallid or Kaha Itteba e rasool”

Taqleed ve ek ayse afat hai k ager banda ek dafa es changul me fas jaye tou fer sunnat-e-rasool per amal k kabel nahi rahta , Wo fer Andha or behra ho ker apne Taqleede Mazhab per he chalta hai, goya wo Sunnat-e-rasool (s.a.w) k Mutalib ho ya Mukhalif , Apne Galat Mazhab ki himayat me ager unh Ahadees me tod-maroor ve karna pade tou esse ve nahi chukte, humare ek hanfi muqallid sb ne Apne ulma ki andhe taqleed kar k itteba ko tod-maroor ker taqleed sabit karne me koi gurez nhi ki aur taqleed ko sahi sabit karne ki nakaam kosis ke.

Muqallid kavi ve sahi hadees per Nahi amal kar sakta kuki wo jahil hota hai , Aur Muqallid jahil hota hai esper ummat k ijma hai.

Ager kisi ve Muqallid ko itteba-e-rasool karna ho tou wo kisi ka Muqallid he ku bane , jab wo kisi k Muqallid ban gaya tou wo itteba -e- rasool kaise ker sakta hai? Taqleed Muqallid ko Izazat nahi deta k wo kisi aur k itteba kare , Taqleed tou touq aur bairi hai jo Muqallid ko apne Imam ki Taqleed se Azaad nahi hone dete, Muqallid jis Imam ki Taqleed karta hai Ankhe band ker k use Imam k piche jata hai Muqallid Andha hota hai aur Itteba karne wala bina (Ankh wala)jo frk bina or Nabina me hai wahi frk Motaba aur Muqallid me hai jaise :

Mushrik Muwahid Nahi ho sakta
Biddati Ahle-Sunnat Nahi ho sakta

Ayse he Muqallid Mutabeh rasool nahi ho sakta , Muqallid ke bebasi k ye haal hai k ager usse pucha jaye k tu Apne Imam ki Taqleed ku karta hai ?
Allah tala ne kaha hai k tu hanfi ban ? ya rasullah sallahu alaihe wasallam ne kaha ?
Wo kahta hai k Mujhe tou kuch pata nahi , log jiske Taqleed karte hai main ve uske Taqleed karta hu, balke yahi sawal Mutabeh rasool ya Ahle hadees se koi ager puche k tu Ahle hadees ku hai ?
Tu hadees per Amal ku karta hai ?

tou wo fouran jawab deta hai k itteba Rasullah sallahu alaihe wasallam k Allah Tala ne Quraan paak me hukm deya hai aur Itteba rasool (s.a.w) rasool ki hadees per Amal karne se he ho sakta hai.
Ese leye main hadees per Amal karta hu aur Ahle hadees kahlata hu, rasullah sallahu alaihe wasallam k sewa na koi humara Imam hai aur Na hum kisi k Muqallid humare Imam serf Mohammad sallahu alaihe wasallam hai, jo rasul hai aur rasool ki Taqleed nahi hote aur Muslim Al Sabut me hai jo hanfio ki Motebar kitab hai.

*۔۔ لَیْسَ الرَّجُوْعُ اِلَی النَّبِیِّ عَلَیْہِ الصَّلٰوۃُ وَالسَّلاَمُ اَوْ اِلَی الاِجْمَاعِ لَیْسَ مِنْہُ لاَنَّ اْلاَخْذَ عَنِ الْمُؤَیِّدِ لَیْسَ تَقْلِیْدٌ بَلْ عِلْمٌ نظریٌ

Nabi ki hadees per Amal karna Taqleed nahi Taqleed un logo ki hotebhai jinko logo ne Imam banaya hota hai , Allah ki taraf se unke paas Imam k koi Certificate nahi hota aur yahi Quraan kahte hai.

(اِنْ ھِیَ اِلاَّ اَسْمَآءٌ سَمَّیْتُمُوْھَآ اَنْتُمْ وَ اَبَآؤُکُمْ مَّآ اَنْزَلَ اﷲُ بِھَا مِنْ سُلْطاَنٍ ) [53:النجم:23]

“Ye tou mahaz chand naam he hai jo tumne aur tumhare baap dada ne rakh leye hai,Allah ne unke koi sanad nazil nahi ki, wo log tou guman he ki pairwi karte hai aur us chez ki jo unke dil chate hai”
(sreh No53,ayat No23)

Tahrer Musannif Ibn humman hanfi me hai :

’’ اَلتَّقْلِیْدُ الْعَمَلُ بِقَوْلِ مَنْ لَیْسَ قَوْلُ اِحْدٰی الحُجَّۃِ بِلاَ حُجَّۃٍ مِّنْھَا‘‘

“Taqleed us Admi ki baat per bela dalill Amal karne ko kahte hai jiske baat ki sareyat Mohammadia me koi haiseyat nahi”
yaani taqleed khud sakta Imam ki hote hai, Allah k banaye hue Imaam yaani Nabi ki Taqleed nahi hote,Nabi ki itteba aur Itaat he hote hai, hanfio ne apne ek Imam bana leya aur dusre Muqallido ne apne Imaam bana leya ,es Tarah sab Muaqllid apne apne Imaam ki Taqleed karne lag gaye jiska natiza ye hua k Islam aur Musalmano me tafarka pad gaya , Allah tala ne serf ek Imam banaya tha hazrat Mohammad sallahu Alaihe Wasallam aur uske Itteba k hukm deya tha tabk Musalmano me ferka paida na ho , leken Muqallid ne apne peswa or Imam ki Taqleed suru kar de.

Ab apke samne pess e khidmat h kuch scan page Jisse Apko Taqleed ku hakikat pata chalege. Kuch Scan page hanfio k ghar ki h jiska wo radd nhi kar sakte .

Taqleed aur itteba me fark hai , khud hanfio k ghar ki gawahi with scan..
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1-Taqleed e saksi per koi ijmaa nahi,hanfio k ghar ki gawahi.
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2-Taqleed e saksi 4th hijri sadi me wajud me aya, Mufti Taqi Usmani sahab :
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3-Taqleed e saksi na sahaba r.a k jamana me tha or na he tabaye k jamane me tha,Mufti Taqi Usmani sahab :
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4-Taqleed e saksi kise kahte hai ? , Taqi Usmani sahab :
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5-Taqleed e saksi se hazrat Muaaz ibn jabal r.a (sahaba) ne mana farmaya :
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6-Taqleed e saksi karne wala Munkir e hadees hota hai, hanfio k ghar ki gawahi :
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7-Taqleed e saksi k he hukm dete hai hanafi Muqallid :
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Ab Aina dekhaya ja raha jo taqleed jaij or halal samjhte hai,jabke ye Nazaiz or Haraam hai.

1-Shah Waliullah Muhaddish dehlawi r.al se Taqleed k Radd:
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2-Imaam Hafiz ibn hazam r.al Taqleed jaise sadid gumrahi se bachne k leye Allah se dua karte :
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3-Moulana Abdul hayy lakhnwai r.al Taqleed se bachne or Quraan o hadees per chalne ko batate:
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4-EESAA ALAIHIS SALAM ve kisi ki Taqleed Nahi karege Allama Abdul Hayy Lakhnawi :
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5-Imaam Qurtubi r.al Taqleed karne se mana karte :
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6-Sayed Nazer hussain r.al ne Taqleed se ruzu keya :
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7-Sah Waliullah Muhaddis dehlawi r.al Taqleed karne se Mana karte :
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8-Sah Waliullah Muhaddis dehlawi r.al se Taqleed k Radd “Chauthi sadi se pahle koi Taqleed Nahi karta tha” :
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9-Sah Waliullah Muhaddis dehlawi r.al k Taqleed karne walo ko Nasihat :
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10- Sah Waliullah Muhaddis dehlawi r.al se kisi ek Mazhab ki Taqleed karne walo per Waar :
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11-Imaam Jalaluddin suyuti r.al ne Imaam Gazali r.al k Qaul Naqal karte aur kahte
“MUQALLID KA ILAAJ TALWAAR HAI” :
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12-Imaam Tabrani r.al se Taqleed k radd:
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13-Taqleed karne waala Sahi hadees per Amal Nahi karte Khud hanfio ki jubani :
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14-.Taqleed karne wala hadees v gadta hai :
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15-Kisi saks k saksiyat se khud ko jana-jaana , usse Taqleed karna us saks k sabit Nahi :
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16-Imaam Ahmed ibn Hambal r.al se Taqleed k Radd:
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17-Imaam Ahmed ibn Hambal r.al Aksar Raye(Qayas) ki kitabo ko dekte tou unka Dil Afsos karta :
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18-Muqallid jahil he hota hai,Aur sab Fasaad ki jar “Taqleed” he hai, Hanfio ki gawahi :
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19-Taqleed karne walo ki baat jhote hote hai :
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20-Taqleed karne wala chupaya janwar ki tarah hai :
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21-Taqleed karne wala jahil or serf galti karne wala hota hai, Hanfio ki gawahi :
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22-Taqleed serf jahil or Bewakuf he karta hai :
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23- Taqleed karna Haraam hai :
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24- Imaam Safaii r.al se Taqleed k Radd :
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25- Imaam Ahmed r.al se Taqleed k Radd :
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26- Imaam Safayi r.al ne Dusro ko v Taqleed karne se Mana keya or Khud ki ve :
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27- Imaam Amir bin Shuraheel Al Sho’ab (Tabayi) r.al ne Quraan o hadees ko Apnane Aur Qayas ko Radd karne ko kaha :
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28-Taqleed karna Haraam hai, Imaam hafiz Shukaani r.al :
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29-Imaam Zamakhsari r.al “Gumrahi ki Maa ki Maa ko Taqleed kahte” :
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30-Hazrat Salmaan Farsi raziallahuanha ne “Taqleed karne se Mana keya” :
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31-Hazrat Muaaz ibn jabal raziallahuanhu ne ve “kisi ki Taqleed karne se Mana keya” :
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32-Imaam Shaukani r.al “Taqleed karne walo ki aur jo Mujtahid khud ki Taqleed karne ko bolta 2no ki remaand (class) lete :
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33-Taqleed Halal Nahi Haram hai :
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34-Sufiyan Al Soori r.al ne Quraan o Hadees ko Afzal kaha Aur Raaye wa Qayas ko Tark karne ki Nasihat ” :
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35-Quraan o Hadees ko Apnao Raaye wa Qayas ko Nahi :
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36-Haq wajeh ho jaane k baad Muqallid Andha or Behra hota hai, hanfio ki jubani :
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Allah paak Taqleed jaise sadid gumrahe se hume bachane ki toufeq de or hak ko hak jaan ker usper amak karne ku toufeq de…Aameen.

Posted by : Mohammad Farhan Salafi

TAQLEED AUR 4 IMAM



بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم

TAQLEED AUR 4 IMAM


Sawaal: Ek Rab, Ek Rasool , Ek Ummat Fir Yeh 4 Imaam Ki Taqleed Kyu ??

Jawaab: Sabse Pahli Baat – Ke Kisi Bhi Ummati Ki Koi Baat Agar Kitabo Sunnat Se Mel Khati Ho Tou Behrhaal Uske Man’ne Me Koi Harz Nahi.

Dusri Baat Yeh Hai Ke- Hajir Dour Ke Logon Se Behtar Hai Jo Pichle Gujar Chukey.. Kyunki Wo Johad, Taqwe Aur Zamane Ke Lihaj Se Rasool’Allah(Sallallahu Alaihay Wasallam) Se Jyada Nazdiq They. Jaisa Ke Kuch Log Haal Ke Dour Ko Mantey Hai Us’se Behtar Hai Ke Jo Pichle Gujre Hai Unko Mana Jaye..

Aur Tisri Baat Ke Taqleed Mutlaqan (100%) Haraam Nahi Hoti ..
Kuch Jagah Aa Kar Jab Kitabo Sunnat Se Muamla Nahi Milta Jo Ulma Akaz Karke Detey Hai, Usko Bhi Taqleed Kaha Jata Hai Arbi Zubaan Me … Haa! Lekin Agar Taqleed Se Muraad Yeh Ke ‘Bagair Sochey Samjhye Kisi Ke Pichey Chal Padna Fir Yeh Durust Nahi’..Iski Ijajat Shariyat Nahi Deti ..

Aur Iskey Bil-Mukabil Shariyat Ne Surah Yusuf Ki Ayat No.108 Me Farmaya.. “Qul Haazihee Sabeeleee” »Keh Dijiye Yeh Mera Rasta Hai"
“Ad’ooo Ilal Laah” »Mai Logon Ko Allah Ki Taraf Bulata Hu"
“Alaa Baseera Tin” »Aqalmandi Ke Sath Mai Bhi Bulata Hu"
“Ana Wa Manit Taba’anee” »Mere Pairokaar Bhi Baseerat Se Bulatey Hai"

(Al-Quran: Surah Yusuf: Ayat-108)

* Tou Kisi Shakhs Ne Aqal Aur Baseerat Ka Pura Istemal Kiya, Kitabo Sunnat Se Koi Dalayeel Akaz Kiye Jiska Sidhe Aur Wajeh Koi Baat Quraano Hadees Me Humko Nahi Mil Rahi Thi Tou Isko Bhi Arbi Zubaan Me Taqleed Kaha Jata Hai ..
Aur Isko Man’ne Me Koi Harz Nahi..

* Lekin Ha! Agar Taqleed Se Muraad Galey Me Patta Daal Kar Kisi Ke Pichey Chal Dena Tou Shariyat Iski Izajat Nahi Deti.. Jabke Shariyat Ne Itteba Ka Hukm Diya.. Rasool’Allah(Sallallahu Alaihay Wasallam) Ki Bhi Itteba Allah Ki Itteba Hai.. Allah Aur Uske Rasool Ki Taqleed Ka Hukm Nahi Diya .. Aur Taqleed Ka Lafz Quraano Hadees Me Aata Bhi Nahi Hai..
Ellah Ke “Khalayda” Lafz Aaya Hai Janwaro Ke Talluk Se Pattey Dalne Ka Bus Usi Tarha..

* Lekin Momin Itteba Ke Mukallab Hota Hai..
Lekin Uske Bawajud Koi Kahe Ke – Kya Mutlaqan Haraam Hai ?
Tou Hum Kahenge Nahi !!! Kyunki Kuch Masayeel, Kuch Muamlaat Me Aakar Hum Badey Ulemao Ke Hawale Fir Dete Hi Hai..
“Ke Iss Muamle Me Unhone Falah Cheez Akaz Ki” .. Tou Fir Yeh Kya Hua ???
Yeh Bhi Tou Kitabo Sunnat Ki Dalayeel Ka Kuch Akaz Karke Diya Jo Sidhey Se Nahi Mila Hume, Tou Isko Bhi Arbi Zuban Me Taqleed Kaha Jata Hai.. Aur Yeh Taqleed Durust Hai,..

* Ab Logon Ne Isme 2 Moukuf Bana Diye..
(1) Ek Boltey Hai Ke Taqleed Mutlaqan Haraam Hai.
(2) Aur Dusre Boltey Hai Ke Haraam Nahi! Jaya , Farz Aur Farze-Aiyn Hai Aur Iske Bagair Insan Ki Raahe Najat Nahi Aur Chara Nahi…
Fir Wo Kehte Hai Ke Taqleed 4 Imamo Ki Hi Jaruri Hai,…

Tou Sawal Yeh Niklta Hai Ke Kya Yeh Ummat Itni Kamzor Hai Ke Iske Paas Sirf 4 Hi Imam Hai???
Itni Badi Ummat Kya Iss Ummat Me Sirf 4 Hi Imaam Gujrey??
Ha! Yeh Alag Baat Hai Ke Yeh 4 Imaam Mash’hur Huey …

Hala Ke Rasool’Allah(ﷺ) Ke Baad Bohot Se Aise Log Gujre Jinka Maslak Bohot Mash’hur Hua.. Jaise Ke – Imam Lays(Rahmatullah Alayh) ..Inka Maslaq Bohot Mash’hur Tha, Hatta Ke Imam Shafayi(Rahmatullah Alayh) Se Jyada Man’ne Wale Inke Log They..

Lekin Ek Zamana Aaya Ke Misr Me Ek Hukumat Aayi Jinhone Imam Shafayi Ke Maslak Par Chalne Walo Ko Wajifa Diya Jata Tou Sab Imam Lays Ke Maslaq Ko Chodkar Idhar Chaley Gaye.. Aur Inka Maslak 400 Salo Tak Chala , Tou Goya Imam Lays Ka Maslak 5th Wa Hua..
Isi Tarha Aur Bhi Kayi Maslak Gujre Jo Mash’hur They
Jaise Ke – Imam Sufyan Sauri Ka Maslak.. Yeh Bhi Ek Bada Mash’hur Maslak Tha,..
Khud Imam Abu Hanifa(Rahmatullah Alayh) Jo Inke Ustad They Inka Bhi Maslak ,..
Tou Aisi Bohot Si Cheeze Thi..

* Maslak Se Murad Kisi Masley Ka Unhone Unsey Jawab Liya Aur Behtar Samjha Inki Daleel Ko..
Lekin Baad Ke Daur Ke Logon Ne Isko Thaam Liya Ke Ek Ke Pichey Hi Chalna.
Aur Fir 4 Ki Taqleed Wajib Ki Iss Ummat Ko ..
Jab Ke Agar Koi Kahe Ke 4 Imamo Se Kis Ek Ki Taqleed Hum Par Wajib Hai Tou Fir Sawal Yeh Hota Hai Ke Sahaba Kiski Taqleed Karte They ?
Sidha Sa Ekdum Aam Sawal Hai Ye.. Sidhi Ek Misaal Jati Hai Ke Rasool’Allah(Sallallahu Alaihay Wasallam) Ke Baad Jo Log Aaye, Sahaba Ki Jamaat, Jabke Pahle Imam Jo Log Kahte Hai Behrhaal Hum Kahte Hai Ke Imam Tou Kayi Gujre,

Jaise Ke
Abu Baqar Siddhiq(RaziAllahu Anhu) .. Kya Mere Aur Aapke Liye Imam Nahi Hai Yeh ??
Umar Ibne Khattab(RaziAllahu Anhu) .. Kya Mere Aur Aapke Liye Imam Nahi Hai Yeh ??
Usman Ibne Affan(RaziAllahu Anhu),
Ali Ibne Abu Talib(RaziAllahu Anhu),
Abdulla Bin Umar(RaziAllahu Anhu),
Abdulla Bin Abbas(RaziAllahu Anhu)!!
Kya Yeh Sab Mere Aur Aapke Liye Imam Nahi Hai ??

Aur Sahaba Ki Tadat Lakho Me Jati Ho Jo Apne Wakt Ke Imaam They,,
Kya Yeh Sab Humare Liye Imam Nahi Hai ??
Gaur Karne Wali Baat Hai.. Jaraasa Ta’suff Jehan Se Hatakar Ek Khuley Jehan Se Sochne Wali Baat Hai Ye… Ke Sahaba Ki Puri Jamat Ko Kabhi Imam Nahi Kahte Hum ,..

* Unke Baad Jab Imam Abu Hanifa(Rahmatullah Alayh) Ka Daur Jinhe Pahla Imam Mana Jata Hai Aur 80 Saal Baad Inki Paidayish Hoti Hai 80 Hijri Me ..
Aur Uske Baad Maslak Inka Rayej Hota Hai Bahrhaal 20 Saal Bhi Agar Maan Le Tou 100 Saal Ho Gaye..
Tou Sawal Yeh Aata Hai Ke Yeh 100 Saalo Me Log Kiske Tareeko Par Chaley???
Yeh 100 Salo Ka Jo Waqfa Gujra Is Waqfe Me Log Kis Imam Ke Pichey Chaley??, Kiski Itteba Ki? Kiski Pairwi ?
Unke Baad Imam Shafi(Rahmatullah Alayh) Aatey Hai.. Unka Daur Tou Aur Baad Ka Hai ,,.
Fir Imam Ahmad Bin Hanbal(Rahmatullah Alayh) Aatey… Tou Itne Daur Me Log Kiski Itteba Karte They ???

* Aur Kaha Jata Hai Ke – Taqleed 400 Saal Baad Shuru Hui Rasool’Allah(ﷺ) Ke.. Iss Andaz Se Ke – EK Imam Ko Man’na Compulsory Hai.?
Jab Ke Us’se Pahle Log Imamo Ko Mantey Lekin Kisi Masley Me Ek Imam Ki Raay Ko Behtar Samjhtey Tou Kisi Masley Me Dusre Imam Ki Ray Ko Behtar Samjha Jata,…
Lekin Badme Yeh Hua Ke Compulsory Ek Hi Imam Ko Man’na Hoga,…

* Aur Fir Taqleed Ek Aisa Roop Le Li Ke Dheere Dheere Yeh Majahib Ban Gaye …
Aur Fir Muamla Yeh Hua Ke Ye 4 Alag-Alag Ajib Cheeze Ho Gayi..
Jiska Natija Yeh Hua Ke – ‘Kaabe Ke Andar 4 Musalley Hua Karte They..
Aur Log 4 Alag-Alag Wakt Me Ek-Ek Namaz Padhtey They,,
Wo Hanfi Musalla,
Wo Shafayi Musalla,
Ye Maliki Musalla Aur
Yeh Hanbali Musalla!!!
Subhan Allah !! Allah Ke Deen Ko Aisa Baant Diya Humne..
Allah Reham Kare…

» Sabak: Aur Aisi Taqleed Ka Natija Bhi Samne Aya – Ke Log Aksar Sawal Karte – Kya Mera Nikah Hoga?
Ladki Shafayi Hai Aur Mai Hanfi.. SubhanAllah !!
Kyu Hum Bhul Gaye Ke Hum Sab Ek Nabi Ki Ummat Hai.. Behrhaal !! Kisi Imaam Ki Baat Man’na Jo Kitabo Sunnat Se Mel Khati Ho Ismey Koi Harj Nahi …

Lekin Fir Hum Yeh Kahenge Ke Allah Ki Kitaab Aur Uske Rasool’Allah (ﷺ) Ki Sunnat Mukaddam Aur Uske Baad Jiska Qoul Insey Rayej, Mel Khaye Chahe Uss Daur Ke Imaam Ho, Ya Iss Daur Ke Imaam Ho! Aap Unki Baat Yakinan Maan Saktey Hai Lekin Iteeba Ke Toar Par!!! Naa Ke Iss Andaz Se – Ke Jo Bhi Unhone Keh Diya Wo Patthar Ki Lakeer Hai Fir Chahey Kitabo Sunnat Ke Khilaf Hi Unki Baat Kyu Na Jaye.

Lihaja Hum Tamam Par Lazim Hai Ke Sahi Ilm Hasil Karey, Uspar Amal Karey, Aur Ikhlas Ke Saath Apni Aur Ummat Ki Islah Ki Koshish Karey.


Taqleed Ka Radd Aur Char(4) Imam

Imam Abu Haneefa (R.A)
Imam Abu Haneefa (R.A) Farmate hain: Mere Raae ko Qubul karna Haram hai jab tak Meri Baat ke Dalil Malum Naa Karlo.
(Mezan Al Sharani, Aqeedal jaid Page # 80)

Imam Abu Haneefa (R.A) Farmate hain: “Jab Dekho ke Hamara Raai Quran aur Hadees Ke Khilaf Hai tou Quran aur Hadees par Amal karo aur Hamare Qaul ko Deewar Per dey Maro.”
(Mezan Al Sharani, Aqeedal jaid Page # 53)

Imam Abu Haneefa (R.A) Farmate hain: “Jab Tumhe koi Sahih hadith mil jaye to wahi mera Mazhab hai.”
Ibn `Aabideen in al-Haashiyah (1/63)

Imam Abu Haneefa (R.A) Farmate hain: “Lanat ho tumpar O Yakub. Har chiz jo mai farmata hu wo na likho, Kyuki ye hota hai ki agar aj mai ek Raae rakhta hu to kal usi Raae ka inkar kar sakta hu ya mai kal ek Raae rakhta hu aur parsu us se inkar kar sakta hu.
(An Nafi- Al kabir p:135 by Abdul hasanaat al Luqnawi)

Ek dusri riwayat me Imam Abu Haneefa farmate hai: “…Kyuki ham Insan hai: Ham ek chiz ek din kahte hai aur dusre din (apni baat) wapis le lete hai.


Imam Malik (R.A)
Hazrat Imam Malik (R.A) farmate hai: “Mai Sirf ek Insaan hu, Kabhi meri baath saahi hoti hain aur Kabhi Ghalat to tum meri es baat ko jo Quran aur Hadees ke Mutabik ho lay liya karo aur us baath ko jo is ke khilaf ho chor diya karo (yaani meri Taqleed Mat karo).
Ibn `Abdul Barr in Jaami’ Bayaan al-‘Ilm (2/32)

Ibn Wahb farmate hai:
“Maine Malik se (wuzu ke dauran)Panjo ke bich saaf karne ko puchte hua suna. Unhone farmaya logo ko ye nahi karna chaiye. Jab bhid kam hui maine unke pas jaa kar unse kaha ki hame iske bareme ek sunnah pata hai. Unhone farmaya wo kya hai? Maine kaha: “Laith ibn Sa’d, Ibn Lahee’ah aur Amr ibn al-Haarith ne hamse riwayat kiya hai Yazeed ibn Amr al-Ma’aafiri se aur unhone Abu Abdur-Rahman al-Hubuli se aur unhone Mustawrid ibn Shaddaad al-Qurashi se jinhone farmaya: Maine RasoolAllah (sallallaahu alaihi wa sallam) ko Apni choti ungli se panjo ke bich ragadte hue dekha. Imam MAlik ne farmaya ye hadith sahih hai aur maine abhi tak ye nahi suna tha. Uske baad maine unse yahi sawal puchte hue suna jispar unhone panjo ke bich saaf karne ka hukm diya.
From the Introduction to Al-Jarh wat-Ta’deel of Ibn Abi Haatim, pp. 31-32.

Imam Shafai(R.A)
Imam Shafi farmate hai: “RasoolAallah ki sunnat ham sab tak pahuchti hai aur faraar(escape) bhi hoti hai, isliye jab bhi mai apni Raae ya koi Sharai baat tayar karta hu jo ki RasoolAllah ki Ikhtiyar se takraati hai toh fir sahih Raae Rasool Allah ka Ikhtiyar hai aur yahi meri Raae hai.
Related by Haakim with a continuous sanad up to Shaafi’i, as in Taareekh Dimashq of Ibn Asaakir (15/1/3).

Imam Shafi farmate hai: “Jab Tumhe koi Sahih hadith mil jaye to wahi mera Mazhab hai.”
Nawawi in Al-Majmoo’ (1/63),
Sha’raani (1/57),
giving its sources as Haakim and Baihaqi, & Fulaani (p. 107).

Imam Ahmed Ibne Hambal (R.A)
Imam Ahmed imamo ke sabse pahle imam the sunnah jamah karne wale aur use padke rahne wale, itna ki unhe ye sakht na-pasand tha ki unke Qiyas aur Raae ki kitab likhi jaye.
Ibn al-Jawzi in al-Manaaqib (p. 192)

Imam Ahmed Ibne Hambal (R.A) Ney Farmaya: Hargiz naa meri Raae Naa Malik (R.A) ke Aur Imam shafai (R.A) ke aur Naa Imam Auzai ke aur naa Imam Thawri ke , Jaha say yeh Tamam Imam Deen ke Ahkam waa Masail Layte theay (Quran aur Hadees) Tum bhi wahi say hi Leena.
(Aqeedatul Jaid Page # 70)

In Charo Muhtaram Imamo ke qaul say yeh Baat Saaf Zahir hoti Hai ke Mohammed (s.a.w.) ke hadees ke Mutabik Maa Aana Alaihi Wa Ashabihi kaa Rasta Eqtiyar karne ka hukum Farmaya, Yeh sub ke sub Quran aur Hadees par Amal Karte the, Yehi inka Mazhab tha, in charo Buzurgo ney apni Taqleed say Mana kiya tha aur kisi ney bhi Alag Mazhab apne naam say mansoob karke Murtib Nahi kiya, Wo koi naya mazhab nahi banane aye the, In imamo ka mazhab wahi tha jo ke RasoolAllah ka mazhab tha.

RasoolAllah (ﷺ) ney farmaya :sub say bahetar Ahle Zamana Mere Hain, Phir woh jo en ke Baad wale hain, apne zamane ke baad Do Zamano ka Zikr Kiya.
[Sahih al Bukhari, hadith- 437.]

Allah hame Rasool ki baat ko imamo ki baat se amalan unchi rakhne ki taufeek ata farmaye aameen.
Posted By: Subhani Nadeem

Sunday, October 25, 2015

हदीस क्या है ?


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
हदीस क्या है ?

हदीस - हदीस एक अरबी लफ़्ज़ है जिसके मायने अरबी ज़बान में कई तरह से इस्तेमाल किए जाते है मिसाल के तौर पर हदीस के मायने किसी खबर के , बातचीत के , या कहानी या किसी रिपोर्ट के होते हैं भले ही वो खबर या कहानी या रिपोर्ट झूठी हो या सच्ची , माज़ी की हो या मुस्तकबिल की इससे फर्क नहीं पड़ता । लेकिन हदीस के मायने शरीयत ए इस्लाम में एक खास मायने में इस्तेमाल किया गया है , जिस तरह सलात लफ़्ज़ के मायने दुआ के होते है लेकिन हम इसे नमाज़ के लिए इस्तेमाल करते है , क्यूंकी सलात को शरीयत ने इसी तरह हमारे सामने पेश किया अब कोई भी सिर्फ दुआ को सलात नहीं बोलता या सलात को दुआ नहीं बोलता है सलात अब एक ख़ास मायनों में इस्तेमाल किया जाता है । इसी तरह ज़कात के मायने पाक साफ करने के होते है लेकिन शरीयत ने इसे ख़ास मायने में इस्तेमाल किया है और ज़कात एक ख़ास तरह की इबादत मानी जाती है । इसीलिए हमे ये ज़रूर समझना चाहिए की किसी लफ़्ज़ का लफ़ज़ी मायने कब इस्तेमाल करने है और शरई मायने कब इस्तेमाल करने हैं। इसको मजीद समझने के लिए हम इसके इस्तेमाल को और समझेंगे ।

हदीस लफ़्ज़ के इस्तेमाल- हदीस लफ़्ज़ का इस्तेमाल कुरान और सुन्नत की रिवायात में काफी बार लफ़ज़ी मायनों में इस्तेमाल हुआ है । यहाँ हम हदीस लफ़्ज़ को कुरानी आयात से समझने की कोशिश करेंगे ।

A-हदीस लफ़्ज़ का इस्तेमाल “कुरान” के लिए –मिसाल के लिए
“फ़जरनी वमन यूकेज़ज़ेबो बेहाज़ल हदीस सनसतदँ रेजुहुम मिन हीसु ला”

“पस जो इस हदीस(कुरान) को झुटलाता है तुम उसको मुझ पर छोड़ दो, हम उसे जल्द इस तरह आहिस्ता आहिस्ता उसे खींचेंगे की उन्हे पता भी न होगा” (सूरह कलम आयत न-44)

इस आयत में अल्लाह ने अपनी कुरान को हदीस लफ़्ज़ का इस्तेमाल करके कुरान को हदीस कहा , यहाँ हदीस का लफ़ज़ी मायने “बातचीत या कलाम ” के मायनों में इस्तेमाल हुआ क्यूंकी कुरान भी अल्लाह का कलाम है इसीलिए अल्लाह ने कुरान न कहकर यहाँ अपने कलाम को हदीस कहा है ।
इसी तरह एक हदीस में भी अल्लाह के रसूल(सल्ल) ने कुरान को अल्लाह की हदीस कहा है:
“ इन्ना अहसनल हदीसे किताबुल्लाही”
“सबसे अहसन हदीस अल्लाह की किताब(कुरान) है “ (सहीह मुस्लिम )

B-“एक तारीख़ी क़िस्से” के इस्तेमाल के लिए-मिसाल के तौर पर:
“वहल आताइका हदीसु मूसा”
“ क्या तुम्हें मूसा की खबर आई?” (सूरह ताहा आयत न- 9)

यहाँ अल्लाह ने हदीस लफ़्ज़ का इस्तेमाल उसके लफ़ज़ी मायने “खबर” के मायनों में इस्तेमाल किया है.

C- हदीस लफ़्ज़ का इस्तेमाल “आम बातचीत” के लिए- मिसाल के लिए:
“जब नबी ने अपनी बीवी से एक राज़ की बात की ” 
(सूरह तहरीम आयत न-3)

यहाँ नबी(सल्ल) ने जो अपनी बीवी से बातचीत की उसके बताने के लिए अल्लाह ने उस बातचीत को हदीस कहा क्यूंकी हदीस के लफ़ज़ी मायने “बातचीत” के भी होते हैं ।

हदीस के आलिम हदीस लफ़्ज़ की वजाहत करते हुए कहते हैं की कोई भी चीज़ जो नबी (सल्ल) से मुंतकिल हो जैसे उनकी की बातचीत , उनका हुक्म , उनके अमल , उनकी किसी बात पर खामोशी , उनकी जिस्मानी खुसुसियत , उनका अंदाज़ , सबको हदीस कहा जाएगा ।

क्यूंकी सब बातचीत में सबसे आला बातचीत नबी (सल्ल) की है , सब अमल में सबसे आला अमल नबी (सल्ल) के है ,सब अंदाज़ो में सबसे अच्छा अंदाज़ नबी (सल्ल) का है ,सब खबर में सबसे आला खबर नबी (सल्ल) की है, इसलिए शरीयत ने हदीस लफ़्ज़ को नबी (सल्ल) के लिए खास कर दिया है अब किसी आम इंसान की बातचीत , उसकी दी हुई खबर , उसके अमल को कभी भी हदीस नहीं कहा जाएगा क्यूंकी हदीस लफ़्ज़ नबी (सल्ल) से मुंतकिल चीज़ों के लिए खास कर दिया गया है ।

हदीस की अहमियत- इस्लाम अल्लाह का भेजा हुआ दीन है जो 1400 सालों में भी एक हर्फ़ की भी मिलावट से महफ़ूज है क्यूंकी इसके हिफाज़त की ज़िम्मेदारी खुद अल्लाह ने ली है , अल्लाह ने हर ज़माने में इन्सानो के रहनुमाई के लिए अपना पैगम्बर भेजा और उसके साथ अपना कलाम भेजा , कई बार ये तो हुआ की पैगंबर आए लेकिन अल्लाह की शरीयत नहीं आई लेकिन यह कभी नहीं हुआ की कोई नई शरीयत आई हो लेकिन पैगम्बर न आया हो । क्यूंकी सिर्फ अल्लाह के कलाम से हुक्म निकालना अपने आप में एक परेशानी हो जाती अगर उसके कलाम में आए हुए हुक्मो को कोई बताने वाला न हो और उस पर अमल करके दिखाने वाला हो। इसीलिए हर उम्मत के को अपने नबी की पैरवी करना फर्ज़ रही , जबकि हम जानते है की इस दुनिया में कुरान अल्लाह का आखिरी कलाम है , आखिरी पैगाम है , और उस पैगाम को लाने वाला आखिरी पैगम्बर है इसीलिए अभी इस उम्मत ए रसूल(सल्ल) पर ये फर्ज़ है की वो अल्लाह के कलाम के साथ साथ उसके पैगम्बर ए इस्लाम की पैरवी भी पैरवी को फर्ज़ समझे इसका मतलब यह हैं अपने पैगंबर से मुंतकिल सब चीज़े, यानि हदीस को मानना भी इस उम्मत पर फर्ज़ है ।

हदीस की अहमियत इतनी है की बिना इसके इस्लाम का दीन होना न मुमकिन है आइए इसको मजीद समझने की कोशिश करे की कैसे हदीस इस्लाम का अहम सुतुन है और कैसे इसको मानना उतना ही फर्ज़ है जितना कुरान को फर्ज़ मानना । हदीस कि अहमियत अनगिनत मायनों में है लेकिन यहाँ हम कुछ का ज़िक्र करेंगे ताकि कुछ मजीद वजाहत हो जाए:

1-वही ए इलाही- यहाँ ये जानना ज़रूरी है की नबी (सल्ल) कि कही हुई बात, और उनके अमल की बुनियाद ख़ालिस वही ए इलाही है, इसलिए हमारे लिए रहनुमाई के जो ज़राए है उसमे बुनियादी ज़राए कुरान के साथ साथ हदीस भी है , इस बात को अल्लाह ने ही कुरान में वाजेह किया है :

“(मुहम्मद) अपनी नफ़्स(ख़्वाहिश) से नहीं बोलते बल्कि असलियत में वो “वही” है जो उनकी तरफ भेजी जाती है “ 
( सूरह नज़्म आयत न-3-4)

अब हदीस को यह कहा जा सकता है कि यह वो “वही” है जो अल्लाह ने अपने रसूल को ज़ाती तौर से अता की है । इसी बात को अल्लाह के रसूल(सल्ल) ने अपनी एक हदीस में बड़े साफ अंदाज़ में बयान किया है

"रसूल(सल्ल) ने फरमाया  “यकीनन मुझे कुरान के साथ साथ इस जैसी एक और चीज़ दी गयी है “ 
(अबु दाऊद) ।

2-तफ़सीर- जैसा कि हम जानते है अल्लाह ने अपने कलाम कि हिफाज़त का ज़िम्मा खुद लिया है लेकिन हिफाज़त किन मायनों में इसको समझना ज़रूरी है , और उससे पहले तो यह समझना ज़रूरी है कि किसी चीज़ की हिफाज़त क्यूँ की जाती है ?।

हिफाज़त हमेशा उस चीज़ की जाती है जिसको हम मुस्तकबिल के लिए हम अपने पास रखना चाहते है और उस चीज़ की हम उसको उसी शक्ल में मुस्तकबिल में पाना चाहते हैं , और इसके लिए ज़रूरी है की उसकी लगातार निगरानी की जाए ताकि न उसमे कोई मिलावट आए और न ही उसमे कोई उसके गिरावट आए। जब हम कुरान की बात करते हैं सबसे पहले ये जाने की कुरान क्या है ? कुरान अल्लाह ने इन्सानो के रहनुमाई के लिए भेजा इसलिए ज़रूरी यह है इसका पैगाम सही मायनों में इन्सानों तक पहुचे क्यूंकी कुरान में अल्लाह के अल्फ़ाज़ है अब अगर अल्लाह सिर्फ उन अल्फ़ाज़ों की हिफाज़त का ज़िम्मा लेगा तो उसके मायनों की तावील और तफ़सीर इंसान कहाँ से करेगा , क्या इंसान अपने ख़्वाहिश के मुताबिक उसकी तावील करने के लिया आज़ाद है ? क्या वो कुरान को मनमाने ढंग से समझने के लिए आज़ाद है ? अगर वो आज़ाद है तो कुरान की सिर्फ अल्फ़ाज़ों की हिफाज़त का क्या फायेदा क्यूंकी फिर रहनुमाई इलाही हिदायत के मुताबिक न होगी बल्कि अपने ख्वाहिशे नफ़्स के मुताबिक हो जाएगी ,और कुरान अपने ख्वाहिशे नफ़्स पर चलने के लिए मना करता है क्यूंकी इंसानी ज़िंदगी का मक़सद अल्लाह की इबादत है और इबादत का मतलब अपनी ख्वाहिशों को कुर्बान करके अल्लाह के अहकाम पर चलना है। इसलिए यहाँ ये बात समझ में आती है की जब अल्लाह यह कहता है की उसने कुरान की हिफाज़त का ज़िम्मा लिया है तो वहाँ यह महज़ अल्फ़ाज़ की हिफाज़त नहीं है बल्कि उन अल्फ़ाज़ों से जो अहकाम निकलते है , उन अल्फ़ाज़ों के जो  मफ़हूम निकलकर आता है इन सबकी ज़िम्मेदारी अल्लाह ने ली है । इसलिए अल्लाह ने कुरान के साथ एक नबी(सल्ल) भेजा ताकि उसकी कुरान के अल्फ़ाज़ सिर्फ अल्फ़ाज़ न रह जाए बल्कि उसके अल्फ़ाज़ों के मफ़हूम और उसके अहकाम किस तरह अदा करने है उसका एक ज़िंदा नमूना लोगो के सामने आ जाए , इसीलिए ये ज़रूरी है की सिर्फ अल्फ़ाज़ की हिफ़ाज़त नहीं बल्कि उसके मफ़हूम की भी हो ताकि दुनिया में कोई इकतेलाफ़ की हुज्जत न हो , ज़ाहिर है दुनिया में जितने नबी(सल्ल) से पहले नबी आए वो सब एक खास वक़्त और एक खास लोगो के बीच आए थे इसीलिए उनके जमाने में ये कभी नहीं हुआ की उनके उम्मत ने अपने नबी के अमल , उनके कौल को भी लेखा जोखा बनाया हो और आने वाले वक़्त के लिए संभालकर रखा हो । क्यूंकी उनकी उम्मत को पता था की ये नबी सिर्फ इसी वक़्त के लिए है और नबी अभी खुद मौजूद है किसी बात पर को समझने में या मफ़हूम समझने में कोई गलती होगी तो नबी खुद ब खुद उसे ठीक कर देगा , और नबी के जाने के बाद कोई दूसरा नबी आ जाएगा आगे की रहनुमाई के लिए । लेकिन अल्लाह ने इस दुनिया के लिए आखिरी नबी मुहम्मद (सल्ल) को भेज दिया और अब उसके बाद कोई नबी नहीं आना था इसलिए अल्लाह ने न सिर्फ अल्फ़ाज़ बल्कि उससे निकले हुए अहकाम और उनके मफ़हूम को सीरत और हदीस की शक्ल में आज तक महफ़ूज रखा हुआ है ।

कई लोगो का मुतालबा है की जब कुरान हमारे पास है तो हम हदीस को क्यूँ माने वो पूछते है क्या कुरान अधूरी किताब है? या कुरान में दुनिया के मसाइल के हल नहीं है ? लेकिन ये सवाल करते वक़्त वो नबी कि अहमियत को भूल जाते है और ये भूल जाते है कि नबी का भेजे जाने का क्या मक़सद होता है , अगर किताब ही भेजनी होती तो अल्लाह सीधे सीधे कहीं उतार देता फिर लोग अपने हिसाब से उसे समझते लेकिन अल्लाह ने किताब के साथ उसकी तफ़सीर करने वाला भी साथ भेजा ताकि वो लोगो को उसकी किताब को समझाये और उसकी तफ़सीर बयान करे , इसलिए नबी(सल्ल) से मुंतकिल जितनी चीज़े हैं वो सब हदीस है और मफ़हूम के हिसाब से हदीस भी कुरान का हिस्सा है यानि हदीस कुछ नहीं है मगर कुरान की तफ़सीर है बिना रसूल(सल्ल) की तफ़सीर के , बिना उनके बताए हुए मफ़हूम के , और बिना उनके दिखाये  गए हुए तरीके को माने कुरान को समझ पाना न मुमकिन है क्यूंकी इस्लाम की बुनियाद के तराजू के एक पल्ले में तौहीद है और दूसरे पल्ले में रिसालत है । दोनों पल्लो का बराबर होना लाज़मी है। इसी बात को कुरान अपने इन अल्फ़ाज़ों में ब्यान करता है।

“और अब यह याददिहानी(कुरान) तुमपर नाज़िल की है ताकि तुम लोगों के सामने खोलखोल कर बयान कर दो जो कुछ भी उनकी तरफ उतारा गया है और ताकि वे सोच विचार करे” 
(सूरह नहल आयत न-44)

3-अखलाक- हम यह जानते हैं की रसूल(सल्ल) की ज़िंदगी का हर एक पहलू अल्लाह की वही के मुताबिक है , उनका किरदार , उनका माशरी ज़िंदगी सब कयामत तक के लिए हमारे लिए बेहतरीन नमूना है , इसी चीज़ को कुरान भी अपने इन अल्फ़ाज़ों में कहता है

“नबी की ज़िंदगी में तुम्हारे लिए बेहतरीन नुमुना है “
(सूरह न-33 आयत न-21)

अब अगर हम अपने रसूल(सल्ल) की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को देखना चाहते है तो हमारे पास हदीस की तरफ रुख करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है क्यूंकी रसूल की पूरी ज़िंदगी हदीसों में दर्ज है , इसलिए कुरान के बताए हुए अखलाक के मेराज को देखने के लिए हम रसूल की ज़िंदगी यानि हदीस को ही अपनी मंज़िल बनाएँगे । अख्लाक़ को नहीं समझा जा सकता अगर हम सीरत को न समझे , और हम सीरत को नहीं समझ सकते जब तक की हदीस को न पढे , यानि हदीस इस्लाम को वो हिस्सा है जिसके बिना इस्लाम अधूरा है ।

4-ज़िंदगी के लिए कानून – ज़िन्दगी के हर लम्हे में इंसान कुछ न कुछ फैसला करता है, इंसानी ज़िन्दगी में हर अमल से पहले उस अमल के लिए गए फैसले उसके अमल पर हावी होते है इसीलिए ईमान वालों को हुक्म है की वो अपने ज़िन्दगी के सारे फैसले अपने रसूल(सल्ल) से कराये क्यूंकी किसी भी उम्मत के रसूल उस उम्मत के लिए रहनुमा हुआ करते हैं, दूसरी चीज़ रसूल(सल्ल) के नुजुल के मक़सद में से एक जो अहम मक़सद है वो ये है कि वो लोगो के ज़िन्दगी के आए हुए मामलात में अपना फैसला सुनाये । इसीलिए कुरान नबी(सल्ल) से कहता है कि

“ ये तब तक ईमान वाले नहीं हो सकते जब तक कि ये तुमसे हर मामले में फैसला न कराये और जब तुम इनके बीच फैसला कर दो , इनके दिल उस पर कोई कसक न महसूस करे ।“
(सूरह न-4 आयत न-65)

कुरान कि इस आयत से ये साफ है कि उम्मत पर ये फर्ज़ है कि वो अपनी ज़िन्दगी के फैसले रसूल (सल्ल) से कराये यानि रसूल(सल्ल) के ज़िन्दगी से अखज़ करे, इसलिए इस्लामी निज़ाम में अदालती निज़ाम को बैगर हदीस के नहीं चलाया जा सकता । मिसाल के तौर पर कुरान में चोर के हाथ काटने का हुक्म है , लेकिन इसी हुक्म को इस्लामी निज़ाम में अपनाने के लिए हमे सीरत में ये देखना होगा की चोर का कितना हाथ काटना होगा , आधा , चौथाई ,या पूरा ? हदीस असल में हुक्म के निफ़ाज़ का तरीके को बताता है, इस्लामी कानून के समझ के लिए और उसके निफ़ाज़ के लिए बिना रसूल(सल्ल) से फैसला कराये हम ईमान वाले नहीं हो सकते । क्यूंकी हमारा ईमान रसूल(सल्ल) की पैरवी पर टिका है।

अल्लाह का शुक्र है कि अल्लाह ने न सिर्फ हमको कुरान दी है बल्कि उसके पैगाम को , उसके मफ़हूम को , उसकी तफ़सीर को , उसके मायने को , ज़िंदा नमूना के तौर पर अल्लाह के रसूल(सल्ल) को हमारे सामने भेज दिया ताकि उसकी रहनुमाई हम पर वजह हो जाए और हम पर कोई और हुज्जत न बचे , अल्लाह हमको रहे हक़ पर बनाए रखे ,कुरान और सीरत से हमे रहनुमाई मिलती रहे । और यह तभी होगा जब हम कुरान कि इस आयत पर खासकर अमल करेंगे –

“और जो तुम्हें रसूल दे उसे ले लो और जिससे रसूल तुमको रोके उससे रुक जाओ , और तुम अल्लाह से डरो , बेशक अल्लाह सख़्त सज़ा देने वाला है “
(सूरह हश्र आयत न-7)

Saturday, October 24, 2015

COMMENTARY ON THE 40 HADITH OF Al-NAWAWI


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
Commentaries on Imam Nawawi's 40 Hadith 


The collection of Forty Hadith by al-Imam alNawawi (or Imam Nawawi) has been known, accepted and appreciated by Muslim scholars for the last seven centuries.

Dr. Jamal Ahmed Badi Associate Professor Department of General Studies International Islamic University Malaysia

Volumes: 1 | Size: 2 MB

Download - Vol 1  [2 MB]

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40 HADITH AL-NAWAWI ENG-URDU


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
40 Hadith An Nawawi

40 Hadiths of Imam Al Nawawi (Arbaeen Al nawawi), in 3 different languages (Arabic, English and Urdu) collected into one single file.


Volumes: 1 | Size: 2 MB

Download - Vol 1  [2 MB]

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COMMENTARY ON THE 40 HADITH OF Al-NAWAWI


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
Commentary on the Forty Hadith of Al-Nawawi


A comprehensive work consisting of 2 Volumes commenting on al-Nawawi¦s Forty Hadith. by Jamaal al-Din M. Zarabozo

With an Introduction by Prof. Jaafar Sheikh Idris.Here are just a few excerpts from Prof. Jaafar Sheikh Idris¦s comments to the work. The reader will not be studying explanations of the hadith in a narrow sense; the reader will, in fact, be introduced to many branches of the Islamic sciences: the different sciences of hadith, the science of textual interpretation, the science of jurisprudence, law, and even Arabic language.This is a great commentary on a great book. Brother Jamaal Zarabozo is to be congratulated for producing such a scholarly book. -- Prof. Jaafar Sheikh Idris T

This commendable work offers a detailed analysis of forty of the most important hadith of the Prophet (S) for a Muslim to understand. Beginning with a biography of Imam Al-Nawawi, the author then explains each hadith in depth. Each hadith features the Arabic text, English translation, selected vocabulary in Arabic with English translation, general comments, circumstances behind the hadith, brief biography of the narrator and then a detailed commentary that explains the hadith's major subjects. Each subject is studied from a logical and shariah point of view, deducing the lessons of the hadith for the reader. The author then familiarises the reader with the interpretations of the great scholars and provides his own interpretation. 'An important study for any student of hadith'.


Author: Jamaal al-Din M. Zarabozo | Volumes: 2 | Size: 39 MB
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Thursday, October 22, 2015

ASHOORA ROZE KI FAZILAT


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم

ASHOORA ROZE KI FAZILAT DALEEL KE SATH



PEHLI FAZILAT : Ye roza pechle saal ke sabiqa gunah muaf kar ta hai. Abu Qatada Radi Allahu Anhu se rivayat hai:
Nabi-e-Rahmat (ﷺ) se Ashoora ke din ke rozey ke bare mein pucha to:
Aap (ﷺ) ne faramaya "ye Guzrey huye saal ke (sagheerah) gunahon ka kaffara hai."

[Sahih-Muslim, kitab as Siyaam, Hadees: 1162] Subhanallah, agar koi shaks is roze ko la parwahi se choad de toh sochiye uska kitna nuqsan hoga.


DUSRI FAZILAT : Abdullah ibn Abbas Radhi Allahu Anhu bayan karte hain: "Maine Aap (ﷺ) ko Aashoora ke roze aur ramzan ke rozon ke Siwa aur kisi dinon ko afzal jaan ke qasd (yani talash) karte hue nahi dekha."

[Sahih Bukhari, kitab as siyaam, Hadees: 2006]


TEESRI FAZILAT : Abu Huraira Radhi Allahu Anhu se rivayat hai:
Nabi-e-Rahmat (ﷺ) ne farmaya: "Ramzan ke baad sabse behtar aur Afzal roze Muharram ke roze hain."

[Sahih: Tirmidhi,Kitab as saum, Hadees: 740]


Allah hum sab ko naik hidayath de ..Ameen