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Sunday, September 27, 2015

और मस्जिद तोडऩे वाला मुसलमान हो गया




मस्जिद तोडऩे वाला मुसलमान हो गया !

क्या कह रहे हो ?? जी हाँ..अगर यकीन नहीं होता तो पोस्ट पढ़ें...।।

यह जुबानी है एक ऐसे नौजवान शख्स की जिसे इस्लाम और मुसलमान नाम से ही बेहद चिढ़ थी। मुसलमान और इस्लाम से नफरत करने वाला और एक मस्जिद को तोडऩे वाला यह शख्स आखिर खुद मुसलमान हो गया।

मैं गुजरात के मेहसाना जिले के एक गांव के ठाकुर जमींदार का बेटा हूँ । मेरा पुराना नाम युवराज है, युवराज नाम से ही लोग मुझो जानते हैं।

हालांकि बाद में पण्डितों ने मेरी राशि की खातिर मेरा नाम महेश रखा, मगर मैं युवराज नाम से ही प्रसिद्ध हो गया, लेकिन अब मैं सुहैल सिद्दीकी हूँ । मैं 13 अगस्त 1983 को पैदा हुआ। जसपाल ठाकुर कॉलेज से मैं बी. कॉम कर रहा था कि मुझे पढ़ाई छोडऩी पड़ी। मेरा एक भाई और एक बहन है। मेरे जीजा जी बड़े नेता हैं। असल में वे भाजपा के हैं, स्थानीय राजनीति में वजन बढ़ाने के लिए उन्होंने इस साल कांग्रेस से चुनाव लड़ा और वे जीत गए।

गुजरात के गोधरा कांड के बाद 2002 ई के दंगों में हम आठ दोस्तों का एक ग्रुप था, जिसने इन दंगों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। हमारे इलाके में दरिंदगी का नंगा नाच हो रहा था। हमारे घर के पास गांव में एक छोटी सी मस्जिद थी। लोग कहते हैं यह ऐतिहासिक मस्जिद है। हम लोगों ने योजना बनाई कि गांव की इस मस्जिद को गिरा देना चाहिए।

हम आठों साथी उस मस्जिद को गिराने के लिए गए। बहुत मेहनत के बाद भी हम उस मस्जिद को गिरा ना सके। ऐसा लगता था हमारे कुदाल लोहे के नहीं लकड़ी के हों। बहुत निराश होकर हमने मस्जिद के बाहर वाली दीवार गिरानी शुरू कर दी जो कुछ साल पहले ही गांव वालों ने बनवाई थी।

दीवार गिराने के बाद हम दोस्तों ने सोचा कि इस मस्जिद को जला देना चाहिए। इसके लिए पेट्रोल लाया गया और पुराने कपड़े में पेट्रोल डालकर मस्जिद को जलाने के लिए एक साथी ने आग जलाई तो खुद उसके कपड़ों में आग लग गई। और देखते ही देखते वह खुद जलकर मर गया।

मैं तो यह दृश्य देखकर डर गया। हमारी इस कोशिश से मस्जिद को कुछ नुकसान पहुंचा। हैरत की बात यह हुई कि इस घटना के बाद दो सप्ताह के अन्दर ही मेरे चार साथी एक के बाद एक मरते गए। उनके सिर में दर्द होता था और वे तड़प-तड़प कर मर जाते थे। मेरे अलावा बाकी दो साथी पागल हो गए। यह सब देख मैं तो बेहद डर गया। मैं डरा-छिपा फिरता था।

रात को उसी टूटी मस्जिद में जाकर रोता था और कहता था: ए मुसलमानों के भगवान! मुझे क्षमा कर दे। मैं अपना माथा वहां टेकता। इस दौरान मुझे सपने में नरक और स्वर्ग दिखाई देने लगे। मैंने एक बार सपने में देखा कि मैं नरक में हूं और वहां का एक दरोगा मेरे उन साथियों को जो मस्जिद गिराने में मेरे साथ थे अपने जल्लादों से सजा दिलवा रहा है। सजा यह है कि लंबे-लंबे कांटों का एक जाल है, उस जाल पर डालकर उनको खींचा जा रहा है जिससे मांस और खाल गर्दन से पैरों तक उतर जाती है लेकिन शरीर फिर ठीक हो जाता है। इसके बाद उनको उल्टा लटका दिया और नीचे आग जला दी गई जो मुंह से बाहर ऊपर को निकल रही है और दो जल्लाद हंटर से उनको मार रहे हैं। वे रो रहे हैं, चींख़ रहे हैं कि 'हमें माफ कर दो।'दरोगा क्रोध में कहता है- 'क्षमा का समय समाप्त हो गया है। मृत्यु के बाद कोई क्षमा और प्रायश्चित नहीं है। 'सपने में इस तरह के भयानक दृश्य मुझे बार-बार दिखाई देते और मैं डर के मारे पागल सा होने को होता तो मुझे स्वर्ग दिखाई पड़ता। मैं स्वर्ग में देखता कि तालाब से भी चौड़ी दूध की नहर है। दूध बह रहा है, एक नहर शहद की है। एक ठण्डे पानी की इतनी साफ कि उसमें मेरी तस्वीर साफ दिख रही है। मैंने एक बार सपने में देखा कि एक बहुत सुंदर पेड़ है, इतना बड़ा कि हजारों लोग उसके साए में आ जाए। मैं सपने में बहुत अच्छे बाग देखता और हमेशा मुझे अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर की तीन बार आवाज़ आती। यह सुनकर मुझे अच्छा ना लगता और जब कभी मैं साथ में अल्लाहु अकबर ना कहता तो मुझे स्वर्ग से उठाकर बाहर फैंक दिया जाता। जब मेरी आंख खुलती तो मैं बिस्तर से नीचे पड़ा मिलता। एक बार सपने में मैंने स्वर्ग को देखा तो 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहा तो वहां के बहुत सारे लड़के-लड़कियां मेरी सेवा में लग गए।

इस तरह बहुत दिन गुजर गए। गुजरात में दंगे होते रहे लेकिन अब मुझे दिल से लगता जैसे मैं मुसलमान हूँ । अब मुझे मुसलमानों की हत्या की सूचना मिलती तो मेरा दिल बहुत दुखता। मैं एक दिन बीजापुर गया।, वहां एक मस्जिद देखी। वहां के इमाम साहब सहारनपुर के थे। मैंने उनसे अपनी पूरी कहानी बताई। उन्होंने कहा- 'अल्लाह को आपसे बहुत प्रेम है, अगर आपसे प्रेम ना होता तो अपने साथियों की तरह आप भी नरक में जल रहे होते। आप अल्लाह के इस उपकार को समझों। 'सपने देखने से पहले मैं इस्लाम के नाम से ही चिढ़ता था। ठाकुर कॉलेज में किसी मुसलमान का प्रवेश नहीं होने देता था। लेकिन जाने क्यों अब मुझे इस्लाम की हर बात अच्छी लगने लगी। बीजापुर से मैं घर आया और मैंने तय कर लिया कि अब मुझे मुसलमान होना चाहिए। मैं अहमदाबाद की जामा मस्जिद में गया और इस्लाम कबूल कर लिया। अहमदाबाद से नमाज सीखने की किताब लेकर आया और नमाज याद करने लगा और फिर नमाज पढऩा शुरू कर दिया।।

यह आर्टिकल दिल्ली से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक 'कान्ति' (21 फरवरी से 27 फरवरी 2010) से लिया गया है....।।

Friday, November 8, 2013

मीनारों के विरोधी स्विस नेता ने किया इस्लाम कबूल



मीनारों के विरोधी स्विस नेता ने किया इस्लाम कबूल
स्विट्जरलैंड में मस्जिदों के मीनारों का विरोधी, प्रसिद्ध नेता एवं स्विस मिल ट्री के इन्सट्रक्टर डेनियल स्ट्रेच(Daniel Streich)जो मीनारों की मुखालफत का झण्डा उठाये हुआ था ने इस्लाम कबूल कर लिया है।

वही पहला नेता था जिसने स्वीटजर्लेंड में मस्जिदों ताले लगाने और मीनारों पर पाबन्दी लगाने की मुहिम छेडी थी। उसने अपनी इस इस्लाम विरोधी आन्दोलन को देश- भर में फैलाया था। लोगों से मिलकर उनमें इस्लाम के विरूद्ध नफरत की बीज बोये और मस्जिदों के गुम्बद और मीनारों के लिखाफ आम जनता को खडा कर रहा था।

परन्तु आज वह इस्लाम की सिपाही बन चुका है। इस्लाम के विरोध ने उसे इस्लाम के इतना निकट कर दिया कि वह इस्लाम कबूल किये बगैर न रह सका और अब अपने किये पर इतना शर्मिन्दा है और अब वह स्वीटजर्लेंड में युरोप की सबसे सुन्दर मस्जिद बनाना चाहता है।

दिलचस्प बात यह है कि स्वीटजर्लेंड में इस समय मीनारों वाली केवल चार मस्जिदें हैं और डेनियल स्ट्रेच पांचवीं मस्जिद की बुनियाद रखना चाहता है। उनकी तमन्ना है कि वह दुनिया की सबसे सुन्दर मस्जिद बना सकें और अपने उस गुनाह की तलाफी कर सकें जो उन्होंने मस्जिदों की विरूद्ध जहर फैला कर किये हैं। वह स्वयं अपने आरम्भ किये आन्दोलन के विरूद्ध भी आन्दोलन चलाना चाहते हैं। हालाँकि स्वीटजर्लेंड में मीनार पर पाबन्दी अब कानूनी हेसियत पा चुकी है।

इस्लाम की सबसे बडी खूबी यही है कि विरोध से इसका रंग अधिक निखरकर सामने आता है। नफरत से भी जो इसका अध्ययण करता है वह उसको अपना बना लेता है। जितना इसका विरोद्ध किया जाए उतनी ही शक्ति से इस्लाम उभरकर सामने आता है। आज युरोप में इस्लाम बहुत तेजी से फैल रहा है जिन इलाकों में जितनी कडाई से इस्लाम के विरूद्ध प्रोपगेंण्डा होरहा है वहां उतनी ही तेजी से इस्लाम कबूल किया जा रहा है।

युरोप में सभी जानना चाहते हैं कि इस्लाम को आतंक के साथ क्यूँ जोडा जाता है फिर वह अध्ययण करते हैं ऐसा ही इस नेता के साथ हुआ । डेनियल स्टेच मीनारों के विरोध और इस्लाम दुशमनी में कुरआन मजीद का अध्ययण किया जिससे इस्लाम को समझ सके। तब उसके दिमाग में केवल इस्लाम धर्म में कीडे निकालना था। वह इस्लाम में मीनारों की हकीकत भी जानना चाहता था ताकि मीनार मुखलिफ आन्दोलन में शक्ति डाल सके और मुसलमानों और मीनारों से होने वाले खतरों से स्वीटजर्लेंड की जन्ता का खबरदार कर सके लेकिन हुआ इसका उल्टा। जैसे-जैसे वह कुरआन और इस्लामी शिक्षाओं का अध्ययण करता गया, वह उसके दिल और दिमाग पर छाते गये।

उसके दिल और दिमाग से गुनाह और बुत-परस्ती की तह हटती गयी। न उसे तीन खुदाओं पर विश्वास न रहा। डेनियल स्टेच का कहना है कि वह पहले पाबन्दी से बाईबिल पढा करता था और चर्च जाया करता था लेकिन अब वह कुरआन पढता है और पांचों समय की नमाज अदा करता है। उसे इस्लाम में जिन्दगी के तमाम सवालात का जवाब मिल गया जो वह ईसाइयत में कभी नहीं पा सकता था। वह जो सुन्दर मस्जिद युरोप में बनाना चाहते हैं उसके लिए कुछ दौलतमन्दों ने उनकी साहयता करने का वचन दिया है लेकिन साथ ही यही भी कह दिया कि इस्लाम की महानता के लिए मीनारों और गुम्बदों के सहारे की आवश्यकता नहीं है। मुल्क का कानून मीनारों पर ही पाबन्दी लगा सकता है दिल और दिमाग पर नहीं।