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Monday, May 15, 2017

तलाक, हलाला और खुला की हकीकत

तलाक और इस्लाम
यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए |

पति पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है तो अपनी ज़िदगी जहन्नम बनाने से बहतर है कि वो अलग हो कर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है |

इसी लिए दुनियां भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है | और इसी लिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहाँ भी लगभग वही था जो अब इस्लाम में है लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थी |

किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए |

जब किसी पति पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे तो अल्लाह ने कुरआन में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायत दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें इसका तरीका कुरआन ने यह बतलाया है कि एक फैसला करने वाला शोहर के खानदान में से मुकर्रर करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों जज मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें, इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए.

अल्लाह ने कुरआन में इसे कुछ यूं बयान किया है :
और अगर तुम्हे शोहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शोहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है | (कुरआन सूरह अन- निसा 35).

इसके बावजूद भी अगर शोहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है तो शोहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इन्तिज़ार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानि शोहर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि "मैं तुम्हे तलाक देता हूँ"

तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है | अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है वो इस्लामी शर्यत और कुरआन की मज़ाक उड़ा रहा होता है |

इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानि 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने) तक शोहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शोहर ही के जुम्मे रहेगा लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरआन ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरआन ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शोहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं |

अक्ल की रौशनी ने अगर इस हुक्म पर गोर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है, हर मआशरे में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं, अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी माँ के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शोहर ही के घर गुज़ारे |

फिर अगर शोहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए तो फिरसे वो दोनों बिना कुछ किये शोहर और बीवी की हेस्यत से रह सकते हैं इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी उनको खबर करदें कि हम ने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही "रुजू" करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है इससे ज्यादा नहीं |

अल्लाह कुरआन में फरमाता है :
"यह तलाक जिसमें पति अपनी बीवी की इद्दत के समय में "रुजू" कर सकते हैं] दो बार ही इजाज़त दी है।" (कुरआन सूरह बक्राह,-229)

शोहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शोहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, लिहाज़ा कुरआन ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है तो शोहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए, सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए

अल्लाह कुरआन में फरमाता है :
और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुँच जाएँ तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोकलो या भले तरीक़े से रुखसत करदो, और उन्हें नुक्सान पहुँचाने के इरादे से ना रोको के उनपर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है | (कुरआन सूरह अल बक्राह-231)
हदीसे नबवी है :
सारी हलाल चीजों में अल्लाह के नज़दीक सबसे ना पसन्दीदा चीज़ तलाक़ है | ( अबू दावूद )

लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है |

इस मौके पर कुरआन ने कम से कम दो जगह
(सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रूपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी उसका वापस लेना शोहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शोहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है |

नोट: अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शोहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था तो महर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शोहर के लिए जायज़ है |

अब इसके बाद बीवी आज़ाद है वो चाहे जहाँ जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शोहर का उस पर कोई हक बाकि नहीं रहा |

इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शोहर को महर देने होंगे और बीवी को महर लेने होंगे।

अब फ़र्ज़ (assume) करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो मैंने ऊपर लिखा है, अब फ़र्ज़ (assume) करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।
तफसील के लिए इस लिंक पर Click करे |https://hadithquote.blogspot.ae/2016/03/talaaq-ki-chhoori-aur-halaale-ki-laanat.html

हलाला
अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दुसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शोहर भी उसे तलाक देदे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में "हलाला" कहते हैं|

लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है जान बूझ कर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इस लिए तलाक लेना ताकि पहले शोहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (स) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।
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खुला'
अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शोहर से तलाक मांगना होगी, अगर शोहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शोहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शोहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान करदे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ''खुला'' कहा जाता है.

यही तलाक का सही तरीका है लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहाँ इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है |
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Posted by : मुशर्रफ अहमद

Sunday, May 14, 2017

मुहर्रम और मौजूदा मुसलमान (कुछ हैरतअंगेज और कड़बी हक़ीक़तें)

मुहर्रम और मौजूदा मुसलमान (कुछ हैरतअंगेज और कड़बी हक़ीक़तें)

माह मुहर्रम की नवीं व दसवीं तारीख़ जबर्दस्त अहमियत और इबादत का दिन है। इस दिन हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने नफ़ली रोजे़ रखने का हुक्म दिया है। मातम व मौजूदा रस्म -रिवाज और खुराफ़ात का इस्लाम धर्म से कोई वास्ता (सम्बन्ध) नहीं है।

पवित्र कुरआन में है-
‘‘इस्लाम वह धर्म है जो सबसे अच्छा और सीधा रास्ता दिखाता है।‘‘

लेकिन अत्यन्त खेद व दुःख के साथ यह हक़ीक़त सुपुर्दे क़लम की जा रही है कि हिजरी सन् के इक्कीवीं वर्ष के प्रारम्भ में कर्बला में जो दर्दनाक हादसा पेश आया बाद के अमीरों (शासकों) ने सियासी रंग देकर अपनी हुकूमत क़ायम रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिसकी वजह से मुहर्रम की हुर्मत (मर्यादा) खत्म होती गई। और योम-ए-आशूरा (दसवीं मुहर्रम) जो इबादत का एक ख़ास दिन है, को शहादते हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु को नज़र कर दिया और इस तरह से मुसलिम कौ़म को एक इन्तिहाई रहमत व इबादत के दिन से महरूम (वंचित) करके ग़म व मातम और अनेक खुराफ़ातों के जाल में जकड़ दिया।

हदीस शरीफ़ में है कि-
“दीन (इस्लाम) में अपनी तरफ से कोई नया काम निकाला जाय वह बिदअ़त है और बिदअत गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है। (बुखारी)

उपर्युक्त हदीस की रू (संदर्भ) में अगर आज हम मुसलिम कौ़म को देखें तो मुसलमानों की एक बड़ी तादाद (संख्या) बिदअ़त में फंसी नजर आयेगी। इसका एक बड़ा कारण मुसलमानों में जाहिलियत के सिवाय और क्या हो सकता है।

सुन्नी मुसलमानों की एक बड़ी तादाद मौलाना रजा खां बरेल्वी से अकी़दत रखती है लेकिन आश्‍चर्य है इसके बावजूद वह मुहर्रम की खुराफात में खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते है | हालांकि मौलाना रजा खां बरेल्वी ने भी ऐसी खुराफातों से मना किया है और इन्हें बिदअत और नाजायज व हराम लिखा है और ताजिये देखने से भी मना किया है।

चुनांचे उनका फ़तवा है |
ताजिया आता देखकर एराज व रूगर्दानी कर (मुंह फेर) लें उसकी ओर देखना ही न चाहिए। (इरफाने शरियत भाग1 पृ015)
और पृष्ठ 16 पर एक सवाल के जवाब में कहते हैं कि
मुहर्रम पर मर्सिया पढ़ना नाजायज है वह मनाही और मुनकरात (नास्तिकता) से पुर होते हैं।
इनका एक रिसाला (पत्रिका) है। इसके पर लिखते हैं |
ताजिये पर चढ़ाया हुआ खाना न खाना चाहिए अगर नियाज़ देकर चढ़ायें या चढ़ाकर नियाज़ दें इस पर भी ऐतराज करें। ( ताजियेदारी पृ0 11 )

फिर यह सब सिर्फ बिदअत ही नहीं बल्कि इससे भी बढ़कर यह षिर्क (अनेकेश्‍वरवाद) व बुत परस्ती क अन्तर्गत आ जाती है क्योंकि प्रथम तो हुसैन (रजिअल्लाहो अन्हु) की रूह आत्मा को मौजूद समझा जाता है। इसी प्रकार मज़ारों में पीरों-फक़ीरों के बारे में भी ऐसा ही समझा जाता है तभी तो उनको काबिले ताज़ीम समझते हैं और उनसे मदद मांगते हैं। हालांकि किसी बुजुर्ग की रूह (आत्मा) को हाज़िर व नाज़िर (विद्यमान) जानना और आलिमुल गै़ब (छुपी बातों को जानने वाला) समझना शिर्क और कुफ्र है।

चुनांचे हनफ़ी मजहब की विश्‍वसनीय किताब में लिखा है,
जो शख्स यह विश्‍वास रखे कि बुजुर्गों की रूहें हर जगह हाजिर व नाजिर है। और ज्ञान रखती हैं, वह काफिर (नास्तिक) है। ( फताबा बजाजिया )

द्वितीय, ताजिया परस्त ताजियों के सामने सिर झुकाते हैं जो सजदे के अन्तर्गत ही आता है और कई लोग तो खुल्लम-खुल्ला सजदा बजा लाते हैं और गैर अल्लाह (अल्लाह के अतिरिक्त) को सजदा करते हैं, चाहे वह इबादत के तौर पर हो या ताजीम (आदर) के लिए, खुला शिर्क है।

चुनांचे अल्लाम क़हसतानी हनफी फरमाते हैं कि-
गैर अल्लाह को सजदा करने वाला बिल्कुल काफिर है, सजदा इबादतन हो या ताजीमन। (रद्दुल मुख़्तार)
मातम व ताजियेदारी की ईजाद
सन् 352 हिजरी के प्रारम्भ में इब्ने बूसिया ने हुक्म दिया कि 10 मुहर्रम को हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु की शहादत के गम में तमाम दुकानें बन्द कर दी जायें। शहर व देहात के लोग मातमी लिबास पहनें और मातम करें।

शीओं ने इस हुक्म का पालन खुशी से किया मगर सुन्नी दम-बखुद और खामोश रहे, क्योंकि शीओं की हुकूमत थी।

इसके बाद शीओं ने हर साल इस रस्म को अमल में लाना शुरू कर दिया और आज तक इसका रिवाज हिन्दुस्तान में हम देख रहे हैं। अजीब बात यह है कि हिन्दुस्तान में अक्सर सुन्नी लोग भी ताजिया बनाते हैं।‘(तारीखे इस्लाम अकबर नजीबाबादी पृ0 66 जिल्द 2 प्रकाशित कराची)

मुख्य बातें
शहादत मनाने का हुक्म होता तो नबियों से बढ़कर हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु की शहादत नहीं हो सकती। बनी इस्राईल में कई नबियों को शहीद किया गया। आखिरी पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के चाचा हजरत हमजा रजिअल्लाहो अन्हु की शहादत बड़ी दर्दनाक और यातना भरी है। शहादत मनाई जाती तो मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम अपने चाचा की शहादत मनाते और हुक्म भी देते लेकिन ऐसा नहीं किया।

हजरत उसमान रजिअल्लाहो अन्हु जो मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के दामाद थे उनकी भी दर्दनाक शहादत कुरआन पढ़ते में हुई। एक और मुख्य बात हजरत अली रजिअल्लाहो अन्हु, जो हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु के पिता और मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के दामाद थे, की भी दर्दनाक शहादत हुई। अब गौ़र तलब बात है कि इनके बेटे हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु ने शहादत क्यों नहीं मनाई तो फिर हजरत हुसैन रजिअल्लाहो अन्हु की शहादत क्यों मनाई जाती है?

Saturday, May 6, 2017

झूटी हदीस क्यू गढ़ी गई

जिस वजह से हदीस गढ़ी गई उसके कुछ खुलासे इस पोस्ट में किये गए है जेसे. . . .

1. अल्लाह से नजदीकी दिखाने की झूटी नियत अल्लाह से नज़दीकी की नियत झूटी हदीस गढ़ने वाले अपने आप में लोगो को नैक और भलाई की तालीम देने की चाह रखते या उन्हें बुराईयो से रोकना चाहते और कुछ बाते बनाकर हदीसो की सूरत में बयान करते है | ऐसे लोग ख़ास तोर से ज़ाहिद और सूफी होते और ये सबसे बुरी हदीस गढ़ने वाले माने जाते है | क्यूकी लोग उनकी ज़ाहिरी शक्ल और सूरत और तक़वा की वजह से उनकी बातो को बहुत जल्द क़बूल कर लेते है |

मेसरा बिन अब्द रुबा इमाम इब्ने हिबन (र.अ.) ने अपनी कितबुज़्ज़ुआफ़ा में इब्ने मेहदी से रिवायत करते है कि
मेने मैसारा से पुछा आप ये हदीस कहा से लेते है की अगर फल'न फल'न चीज़ पढ़े तो उसके लिए यह सवाब है आदि आदि | तो उसने जवाब दिया कि ये बाते मेरी अपनी गढ़ी हुई होती है | मै इस तरह लोगो को भलाई और नेकी की तरफ बुलाता हूँ |

2. अपने मज़हब की ताईद वा बढ़ावा शियासी व मज़हबी गिरोह के वजूद के बाद जेसे ख्वारजी और शिया आदि , हर गिरोह के लोगो ने अपने मज़हब की ताईद और बढ़ावा के लिए हदीस गढ़ी जेसे की रिवायत है की अली लोगो में सबसे बेहतरीन है और जो इसमें शक करे वोह काफ़िर है |

3. दीन इस्लाम पर बोहतान लगाना जब लोग इस्लाम में कीड़ी और तरह खुले तोर पर बिगाड़ पैदा न कर सके तो ख़ुफ़िया तोर पर उन्होंने यह राय अपना ली और फिर बोहुत सी बाते गढ़ी और नापसन्दीदा बाते हदीसो और रिवायत की शक्ल में लोगो के अन्दर फेलादी, फिर उन्ही की बुनियाद पर इस्लाम को बदनाम करने लगे |

जेसे मुहम्मद बिन सईद शामी एक मशहूर ज़िनदिक थे उसके इन बुरे कामो के बिना पर ही इसे सूली पर लटकाया गया और फिर वोह अलामसलुब ख़याल इसकी गढ़ी हुई एक रिवायत इस तरह है |
जो वो अनस (र.अ) मार्फू'अन ज़िक्र करता था,
मै खातिमुननबीयीन हु मेरे बाद कोई नबी नहीं यह है कि अल्लाह चाहे |

4. वक्त के हुक्मुरान से करीब होना कुछ कमज़ोर ईमान वाले लोग वक्त की हुकूमत की चाहत के लिए कुछ रिवायत गढ़ कर उनके सामने बयान करते उनके यहाँ. अपने दरजात बढ़ने की कोशिश करते थे जेसे...

"घयास बिन इब्राहीम नखाई कूफी उसका मशहूर वाक्या है की जो अमीरुल मोमिनीन मेहन्दी अब्बासी यहाँ पेश आई है ये शक्स जब ख़लीफा के यहाँ गया तो देखा की वह कबूतरों से खेल रहे है उसने जाते ही अपनी सनद से रसूल (स.अ.व) तक एक गढ़ी हुई हदीस सुनाई जो इस तरह है |
आप रसूल (स.अ.व.) ने फ़रमाया मुक़ाबला सिर्फ नेज़ाबाज़ी, ऊँट दौड़, घोड़ो की दौड़ और परिंदों (कबूतर आदि) में ही जाईज़ है |"

गयास ने इस रिवायत में परिंदों के पर या कबूतर के लफ्ज़ अपनी तरफ बढ़ा दिये थे, ख़लीफा खुश हो गया मगर मेहन्दी को इस गढ़ी हुई हदीस का पता चल गया उसने कबूतरों को ज़िबह करने का हुकूम दिया और कहा मेने इस शक्स के ये गढ़े हुए अलफ़ाज़ रसूल (स.अ.व.) के फरमान से ज़ियाद्दती करने पर उभारा है |

5. रिवायतो का बयान रोज़गार का ज़रिया बना लेना कुछ किस्सा सुनाने वाले लोग आवाम में ऐसी झूटी रिवायत बयान करते है जिनमे अजीब सा राज़ होता है | और इस तरह वोह चाहते है की लोग उनकी महफ़िलो बैठे और नज़राना पेश करे |
अबू सईद मद्यानी का नाम इन्ही में शामिल है |

6. मशहूर होने की चाहत कुछ लोग ऐसी ऐसी अनोखी रिवायत बयान करते है की वह किसी और के पास नहीं है, या वोह सनद बदल देते है ताकि लोग उनकी तरफ माईल हो और उनकी मशहूरी हो जेसे इबने अबी दह्या और हिमादुननसीब

हवाला : तैसीर मुस्ताल्हुल हदीस तबरीब रावी, जिल्द 1, पेज 282, 284, 286.

Wednesday, May 3, 2017

दुआ के बाद हाथो को चेहरे पर फेरना

दुआ के बाद हाथो को चेहरे पर फेरना
अल्लाह कुरान में फरमाता है
और हमने ये किताब नाजिल फरमाई है जिस में हर चीज़ का साफ़ बयान है एयर हिदायत और रहमत और खुशखबरी है मुसलमानों के लिए ( कुरान, अल-इसरा 17, आयत 89 )
रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने फ़रमाया
“सबसे बेहतरीन कलाम अल्लाह की किताब है और सबसे बेहतरीन तरीका मुहम्मद (स.अ.व.) का तरीका है |” ( सहीह अल-बुखारी, वोलियम 9, किताब 92, हदीस #382 )

ये साबित नहीं है की रसूल अल्लाह (स.अ.व.) दुआ लारने के बाद अपने चेहरे पर अपना हाथ फेरते थे | बहुत सी हदीसे है जो कहती है की रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने अल्लाह को दुवाओ में पुकारा लेकिन कोई साबित रिवायत नहीं है जो कहती है की रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने दुवाओ के बाद अपने चेहरे पर अपना हाथ फेरा | जो ये कहता है की दुआओं के बाद चेहरे पर हाथ फ़ेरना चाहिए वो कुछ हदीस को बयान करते है लेकिन तहकीक करने पर ये पता चलता है की वो हदीस सहीह नहीं है |

पहली रिवायत
ये रिवायत किया गया था की इबने अब्बास (र.अ.) ने कहा की
रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया “जब तुम अल्लाह से दुआ मांगो, सीधी हतेली से मांगो उलटी हातेली से मत मांगो और जब दुआओं को ख़तम करो तो अपने चेहरे पर (अपना हाथो को) फेरलो |” ( सुनन इबने माजाह 3866, इस हदीस को इमाम इबने माजाह ने ज़ईफ़ करार दिया है | )
देखे : सुनन इबने माजाह http://Sunnah.Com/Ibnmajah/34/40

दूसरी रिवायत
यज़ीद इबने सईद अल-किन्दी (र.अ.) रिवायत करते है
“जब रसूल अल्लाह (स.अ.व.) दुआए मांगते थे वो अपने हाथो को उठाते थे और अपने हाथ अपने चेहरे पर फेरते थे |” ( सुनन अबी दावुद 1492, इस हदीस को अल्बानी ने ज़ईफ़ करार दिया है | )
देखे : सुनन अबी दावुद http://Sunnah.Com/Abudawud/8/77

शैख़ अल-इसलाम इबने तयमियाह कहते है |
रसूल अल्लाह (स.अ.व.) के दुआ में हाथ उठाने के हवाले से ये साबित है क्यूकी बहुत सी सहीह हदीसे है लेकिन दुआ के बाद चेहरे पर हाथ फेरने की सिर्फ एक या दो हदीस है जिन्हें दलाईल के तोर पर नहीं लिया जा सकता है (क्यूके वो हदीसे ज़ईफ़ है |) ( फ़तवा अल-इज्ज़ इबने अब्द अल-सलाम, पेज 47 )

तो शरियत में इस अमल की इजाज़त नहीं है | लोगो को दुआओं के बाद अपने जिस्म पर भी हाथ नहीं फेरने न ही अपने आँखों को चूमना चाहिए |

उलेमाओं ने ये बयान किया है की अंगूठे को चूम कर अपने आँखों पर रखना एक बिद्दत है जो की सुफीयो के तरीके से इजाद हुआ है और जो इसके बारे में हदीसे है वो रसूल अल्लाह (स.अ.व.) पर झूठा मनसूब किया गया है |

अल्लाह हम सब को बिद्दतो से महफूज़ रख्खे , कुरान और सहीह हदीस पर अमल करने की नैक तोफीक़ दे | हिदायते इल्म और दिदायत अ अमल अता फरमाए और हमारी इबादत कबूल फरमाये | आमीन ||

अल्लाह सुभानो वा ताला हम सब को सही दीन सीखने और समझ ने की तोफीक़ दे और सहीह हदीस के मुताबिक अमल की फोफीक दे | आमीन ||

अल्लाह से दुआ है के हम को घर वालो को आप लोगो को और सारे मुसलमानों को कुरान और सुन्नत को सहबा के मनहज पर अमल करने वाला फिर दावत देने वाला बनाये | आमीन या रब्बुल आलामीन |

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Saturday, September 10, 2016

महापाप (बड़े गुनाह) क्या हैं ?

महापाप (बड़े गुनाह) क्या हैं

महापाप (बड़े गुनाह) प्रत्येक वह कार्य जिस का पाप बहुत ज़्यादा हो और पाप और गुनाह के कारण उसकी गम्भीरता बढ़ जाती है, इसी प्रकार प्रत्येक कार्य जिस में लिप्त व्यक्ति के लिए सजा या लानत (धिक्कारित) या अल्लाह के क्रोध का वादा किया गया हो, उसे महापाप कहते हैं।

महापाप (बड़े गुनाह) प्रत्येक वह कार्य जिस का पाप बहुत ज़्यादा हो और पाप और गुनाह के कारण उसकी गम्भीरता बढ़ जाती है, इसी प्रकार प्रत्येक कार्य जिस में लिप्त व्यक्ति के लिए सजा या लानत (धिक्कारित) या अल्लाह के क्रोध का वादा किया गया हो, उसे महापाप कहते हैं।

वास्तविक्ता तो यह है कि महापापों की संख्यां के प्रति हदीस शास्त्रों में मतभेद हैं। कुछ लोगों ने महापाप को  हदीस में बयान की गई सात वस्तुओं में सीमित कर दिया है और कुछ लोगों ने 70 बड़े गुनाह को गिनाया है तो कुछ लोगों ने उस से अधिक कहा है।

परन्तु महापापों की सही संख्यां हदीस से प्रमाणित नहीं है बल्कि यह विद्वानों की कोशिश है कि रसूल की  हदीसों से लिया गया है। जिस कार्यकर्ता को जहन्नम की धमकी, या अल्लाह की लानत या अल्लाह का ग़ज़ब और क्रोध उस पर उतरता है तो वह महापापों में शुमार होगा। जैसा कि इस्लामिक विद्वानों ने महापाप की परिभाषा किया है।

महापापों से अल्लाह और उस के रसूल ने दूर रहने का आदेश दिया है और मानव को अपने आप को इन गंदगियों से प्रदुषित न करने पर उभरा है।

महापाप से अल्लाह और उसके रसूल (सल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दूर रहने की आदेश दिया है। जैसा कि
अल्लाह का फरमान है।
“जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते हैं और जब उन्हें (किसी पर) क्रोध आता है तो वे क्षमा कर देते हैं।” (सूरः  37)

दुसरे स्थान पर
अल्लाह का फरमान है।
“यदि तुम उन बड़े गुनाहों से बचते रहो, जिनसे तुम्हें रोका जा रहा है, तो हम तुम्हारी बुराइयों को तुमसे दूर कर देंगे और तुम्हें प्रतिष्ठित स्थान में प्रवेश कराएँगे।” (सूरः निसाः 31)

रसूल (ﷺ) ने फरमायाः
“पांच समय की फर्ज़ नमाज़ें और जुमा से दुसरे जुमा तक और रमज़ान से दुसरे रमज़ान तक नेक कार्य गुनाहों के लिए प्रायश्चित हैं जब तक कि महापापों से बचा जाए।” (सिल्सिला सहीहा- अलबानीः 3322)
इस हदीस में स्पष्ठ रूप से बड़े गुनाह से सुरक्षित रहने पर उत्साहित किया है और यह सूचना दी गई है कि नेकियां करने से छोटे पाप मिट जाते हैं। ”

महापाप से प्रायश्चित कैसे संभव है

अल्लाह से वास्तविक तौबा और महापाप से बहुत दूरी के माध्यम से महापाप से प्रायश्चित किया जा सकता है। हमेशा उस पाप के होने के कारण अल्लाह रो रो कर माफी मांगनी चाहिये और यदि वह महापाप किसी व्यक्ति के हक और अधिकार से संबन्धित है तो उस अधिकार को अदा करना अनिवार्य होगा। महापाप अपने अप्राध और अल्लाह की नाराज़गी के कारण कई क़िसमों में विभाजित हैं। सब से बड़ा पाप अल्लाह के साथ शिर्क है। जैसा कि सही हदीस में आया है।

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (ﷺ) ने फरमायाः
“सात सर्वनाश करने वाली चीजों से बचो,
प्रश्न किया गया है, “ वह क्या हैं ? ”
तो आप (ﷺ) ने फरमायाः “अल्लाह के साथ शिर्क, जादू, बेगुनाह की हत्या, अनाथों का माल नाहक खाना, ब्याज खाना, युद्ध की स्थिति में युद्धस्थल से भागना, भोली भाली पवित्र मुमिन महिलाओं पर प्रित आरोप लागना ”
عن أبي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ: اجْتَنِبُوا السَّبْعَ الْمُوبِقاتِ قَالُوا: يا رَسُولَ اللهِ وَما هُنَّ قَالَ: الشِّرْكُ بِاللهِ، وَالسِّحْرُ، وَقَتْلُ النَّفْسِ الَّتي حَرَّمَ اللهُ إِلاَّ بِالْحَقِّ، وَأَكْلُ الرِّبا، وَأَكْلُ مَالِ الْيَتيمِ، وَالتَّوَلِّي يَوْمَ الزَّحْفِ، وَقَذْفُ الْمُحْصَنَاتِ الْمُؤْمِناتِ الْغافِلاتِ). صحيح البخاري: 2766, صحيح مسلم: 89)
(सही बुखारीः 2766 और सही मुस्लिमः 89)
दुसरी हदीस में रसूल ने लोगों को खबरदार करते हुए कहा, महापापों में सह से बड़ा महापाप किया है जिस पर सहाबा ने कहा कि आप ही सूचित करें जैसा कि हदीस में वर्णन हुआ है।

अबू बकरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन हा कि रसूल (ﷺ) ने फरमायाः
“क्या मैं तुम्हें सब से बड़े पापों की जानकारी न दूँ, तीन बर फरमाया, तो हमने कहा, क्यों नहीं, ऐ अल्लाह के रसूल! आप ने कहा, अल्लाह के साथ शिर्क करना, माता पिता की अवज्ञा करना, रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) टेक लगाए हुए थे, तो सीधा बैठ गए और फरमयाः सुनो, झूटी गवाही देना, (रावी ) कहते हैं, यह शब्द रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बार बार दुहराते रहें, यहां तक कि सबाहा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) हृदय में कल्पना करने लगे कि काश रसूल खामूश हो जाते। ”
عن أبي بَكْرَةَ قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: أَلا أُنَبِّئُكُمْ بِأَكْبَرِ الْكَبائِرِ ثَلاثًا، قَالُوا: بَلى يا رَسُولَ اللهِ، قَالَ: الإِشْراكُ بِاللهِ وَعُقوقُ الْوالِدَيْنِ وَجَلَسَ،وَكانَ مُتَّكِئًا،فَقالَ أَلا وَقَوْلُ الزّورِ قَالَ فَما زَالَ يُكَرِّرُها حَتّى قُلْنا لَيْتَهُ سَكَتَ – (صحيح البخاري : 2654)
(सही बुखारीः 2654)

अबदुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (ﷺ) ने फरमायाः
“बेशक सब से बड़े गुनाह में से है कि व्यक्ति अपने माता-पिता को गाली दे, लोगों ने आश्चर्य से पूंछा, क्या कोई अपने माता पिता को गाली देता है ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः व्यक्ति दुसरे व्यक्ति के पिता को गाली देता है तो वह उस के पिता को गाली देता है और उस के माता को गाली देता है।”
عن عَبْدِ اللهِ بْنِ عَمْرٍو قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم: إِنَّ مِنْ أَكْبَرِ الْكَبائِرِأَنْ يَلْعَنَ الرَّجُلُ والِدَيْهِ قِيلَ يا رَسُولَ اللهِ وَكَيْفَ يَلْعَنُ الرَّجُلُ والِدَيْهِ قَالَ: يَسُبُّ الرَّجُلُ أَبا الرَّجُلِ فَيَسُبُّ أَباهُ وَيَسُبُّ أُمَّهُ  – صحيح أبي داؤد -الألباني- 5141)
(सही अबू दाऊदः 5141)


परन्तु आज के युग में माता पिता को गाली देना और मारना पीटना और उनकी हत्या करना तो सर्वजनिक घटना हो चुकी है। जरा ध्यान पूर्वक विचार करें कि जब दुसरे व्यक्ति के माता पिता को गाली देना महापाप और बड़ा गुनाह है, क्योंकि संभावना है कि वह व्यक्ति उस के माता पिता को गाली दे, तो माता पिता को गाली देना या उन्हे मारना पीटना या उनकी हत्या का पाप कितना महान होगा जिस की कल्पना भी मुश्किल है.? महापापों की कुछ उदाहरण हदीस के माध्यम से पेश की गईं परन्तु वास्तविक्ता तो यह है कि महापापों की संख्यां के बहुत ज़्यादा हैं, जैसा की हदीस शास्त्रों के बातों गुज़र चुकी हैं और इमाम ज़हबी (उन पर अल्लाह की रहमत हो) ने एक पुस्तक (अल-कबाइर) संकलन किया जिस में महापापों को हदीस एवं क़ुरआन से प्रमाणित किया है।

अल्लाह हमें और आप को महापापों से सुरक्षित रखें। आमीन

Tuesday, May 3, 2016

तावीज़ गन्डे की हकीकत

TAVEEZ KI HAQIKAT

आज हमारे समाज मे दीन धर्म के नाम पर जो गोरखधंधे हो रहे हैं उसे ने आम इन्सान को फ़िक्र हैं न इस हुकुमत के ज़िम्मेदारो को खुसुसी मुस्लिम समाज मे आज कुरान और हदीस की तालीम खत्म हो रही हैं| बिदअत को बढ़ावा दिया जा रहा हैं और सुन्नत को झुठलाया जा रहा हैं| अल्लाह का डर खौफ़ दिल और दिमाग से लोगो के निकल रहा हैं बुराई को आम कर घर-घर मे दाखिल किया जा रहा हैं| लोगो को शिफ़ा के नाम पर ताविज़ और गन्डे को आम किया जा रहा हैं| तावीज़ गन्डे और झाड़-फ़ूंक का ये शिर्किया अमल एक ऐसा रोग हैं के ये जिस समाज मे फ़ैल जाये वो समाज तौहीद(एकेशवरवाद) की तालीम को भूल कर खुल्लम-खुल्ला शिर्क करने लगता हैं और उसे अहसास तक नही होता के वो खुद अपने आप को जहन्नम (नर्क) मे ढकेल रहा हैं| अफ़सोस की बात तो ये के लोग इसे बड़ी खुशी से करते हैं और मीलो का सफ़र भी तय करते हैं|

दरहकीकत ऐसे लोग ताविज़ गन्डे का शिर्क करके तौहीद को चुनौती देते हैं के इस कायनात के पालनहार अल्लाह के मर्ज़ी के बिना भी वो लोगो को बीमारी मे शिफ़ा दे सकते या उनकी तकदीर बदल सकते हैं| मुस्लिम समाज के ये बदअकीदा उल्मा और शिर्क के कारोबार से पेट पालने वाले ये बाबा और मुल्लाओ ने तावीज़ और गन्डे के शिर्किया कारोबार से बिदअत और बुराईयो का बाज़ार गर्मा रखा है| इसके ज़रिये वो न सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसे का लोगो से ऐतमाद खत्म कर रहे बल्कि ये उनकी रोज़ी का ज़रिया बना हैं| भोली भाली आवाम अपने दुख-दर्द मे मुब्तला अपनी बदहाली को दूर करने की गर्ज़ से इनके पास जाती हैं और ये जाहिल तावीज़ गन्डे वाले इनसे मन चाही रकम वसूलते हैं| और तो और मुसीबत की मारी आवाम इन धोकेबाज़ो को अपनी परेशानी का मसीहा समझ इनके बहकावे मे आकर अपनी रकम के साथ-साथ अपना ईमान भी गवां देती हैं|

आज आम तौर से लोगो का ये गुमान हैं के तमाम बीमारी, परेशानी का हाल सिर्फ़ तावीज़ और गन्डा हैं और इसके करने वाले ही उन्हे इस परेशानी से निजात दिला सकते हैं| बीमारी चाहे दिमागी हो या जिस्मानी अगर वो किसी डाकटर के इलाज से सही न हो तो लोग उसका हल सिर्फ़ झाड़-फ़ूंक और तावीज़ गन्डे मे तलाशते है| परेशानी चाहे अहलो अयाल की हो या रिश्तेदार की या कारोबारी आज लोगो का अकीदे मे ये शामिल होता जा रहा हैं की उनकी मुश्कीलात का हल झाड़-फ़ूंक करने वाले ही दूर कर सकते हैं| जबकी

Sunday, May 1, 2016

रजब के कूंडे

Rajab Ke Kunde | रजब के कूंडे

दुश्मने इस्लाम ने जितनी कोशिश इस्लाम का असल चेहरा बदलने के लिये की हैं अगर वो इतनी ही कोशिश इस्लाम को समझने मे करते तो शायद उनको दुनिया और आखिरत दोनो मे फ़ायदा पहुंचता मगर जब किसी के दिल और कानो पर मुहर लग जाती हैं तो उसे शैतान की राह के सिवा कुछ नही मिलता|

इन दुश्मनो ने इस्लाम मे बिदअतो को इतनी खूबसूरती के साथ बनाकर पेश किया के ये बिदअते असल दीन हैं, भोली-भाली मुस्लिम कौम इनके जाल मे फ़ंस कर असल दीन को भूल कर इन बिदअतो मे मश्गूल हो गयी| साथ ही कुछ जाहिल किस्म के मौलवियो ने भी इन बिदअतो की हकीकत जानना तो दूर उल्टा इन्हे इतना बढ़ावा दिया के धीरे-धीरे ये बिदअते इस्लाम का एक अरकान बन गयी और आज हालत ये हैं के मुसल्मान खुद को मुसल्मान कहता हैं कल्मा नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का पढ़ता हैं और अमल इस्लाम के मुखालिफ़ (बिदअतो) करता हैं| इन्ही बिदअतो मे से एक बिदअत रजब के कूंडे हैं जिसे मुसल्मान बड़े जौक-शौक से मनाता हैं| आइये ज़रा इसका जायज़ा लेते हैं के ये बिदअत की हकीकत क्या हैं|

रजब के कूंडे रजब के महीने मे मनाये जाते हैं और लोग इसे इमाम जाफ़र सादिक के नाम से कूंडे भरते हैं| इसको साबित करने के लिये एक झूठी कहानी का सहारा लेते हैं जिस का मसला कुछ इस तरह हैं की मदीना मे एक गरीब लकड़हारा रहता था, उसकी बीवी वज़ीर के घर झाड़ू देती थी| एक दिन उसने महल(घर) के दरवाजे के पास इमाम जाफ़र बिन मुहम्मद सादिक को ये फ़रमाते सुना कि जो शख्स आज 22 रजब को नहा धो कर मेरे नाम के कूंडे भरे, फ़िर अल्लाह से जो भी दुआ करे वो कबूल होगी, नही तो कयामत के दिन वो मेरा गिरेबान पकड़ ले| उस लकड़हारे की बीवी ने ऐसा ही किया और उसका शौहर बहुत सी माल दौलत लेकर वापस लौटा और एक आलीशान मकान बना कर उसमे रहने लगा और वज़ीर की बीवी ने कूंडे की हकीकत से इन्कार किया तो उसके शौहर की वज़ारत चली गयी| फ़िर जब उसने तौबा की और कूंडे की हकीकत को तस्लीम किया तो उसके शौहर की वज़ारत बहाल हो गयी और वो पहले की तरह मालदार हो गये| इसके बाद बादशाह और उसकी कौम हर साल बड़ी धूम-धाम से कूंडे की रस्म मनाने लगी|

इस मनगढ़तं कहानी को कुरान और हदीस की रोशनी मे देखे तो पता चलता हैं के इसमे एक शिर्किया काम की दावत दी गयी हैं क्योकि इसमे गैर उल्लाह (इमाम ज़ाफ़र सादिक) के नाम से नज़्र नियाज़ दी जाती हैं और गैर उल्लाह के नाम से नज़्र नियाज़ करना शिर्क हैं| क्योकि नज़्र मानना इबादत हैं और इबादत खालिस अल्लाह ही के लिये खास हैं, इसे किसी दूसरे के लिये करना अल्लाह के साथ शिर्क हैं| लिहाज़ा किसी नबी, वली, बुज़ुर्ग, पीर आदि के लिये नज़्र माना शिर्क हैं|

अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया
जो आदमी यह नज़्र माने कि वह अल्लाह की इताअत करेगा उसे चाहिये की अपनी नज़्र पूरी करके अल्लाह की इताअत करे, और जो आदमी अल्लाह की नाफ़रमानी की नज़्र माने तो उसे चाहिये की नाफ़रमानी न करे यानि अपनी नज़्र पूरी न करे| (बुखारी)

इसी तरह इस कहानी मे 22 रजब को कूंडा भरने की बात कही गयी हैं जिसका इमाम जाफ़र सादिक की पैदाईश या मरने के दिन से कोई ताल्लुक नही, क्योकि रजब के महीने मे न उनकी पैदाईश हुयी और न मौत और मदीना के अन्दर जिस वज़ारत और बादशाहत का ज़िक्र किया गया हैं उसका तारिख मे कोई ज़िक्र नही मिलता बल्कि इमाम जाफ़र सादिक के ज़िन्दगी मे मुसलमानो की दारुल सल्तनत या तो दमिश्क मे रही या बगदाद मे| दरहकीकत ये शिर्किया रस्म और दूसरी रस्मो की तरह शियाओ से सुन्नीयो के अन्दर आई जो हकीकत मे अल्लाह के रसूल (ﷺ) के जलीलो कद्र सहाबी हज़रत मुआविया रज़ि0 की वफ़ात (22 रजब) पर खुशी मनाते मनाते हैं लेकिन पर्दा डालने के लिये लकड़हारे की कहानी गढ़ ली गयी|

इसी तरह रजब के कूंडे भरने वाले इसी बीच अल्लाह की हलाल कर्दा चीज़ो जैसे गोश्त, मछली वगैराह खाने से बचाव करते हैं, जो के अल्लाह के इस कौल की खिलाफ़ वर्ज़ी हैं –
अल क़ुरआन –
ऐ ईमानवालो अल्लाह ने जो पाक चीज़े तुम्हारे लिये हलाल की हैं उन को हराम मत करो| (सूरह अल मायदा 5/87)

इस्रा और मेराज कि रात की

रजब के महीने मे की जाने वाली इन बिदाअत मे से एक बिदाअत 27 वी रात को इस्रा व मेराज का जश्न मनाना हैं जिसके बारे मे न अल्लाह के रसूल (ﷺ) से कोई दलील मिलती हैं न सहाबा से| बल्कि इन इबादत अक्ली एतबार से भी गलत हैं जैसे –
  1. इस्रा और मेराज जिस रात को हुआ इसकी तारिख, महीना और साल का कोई भी सबूत नही बल्कि इस बारे मे उल्मा के कई कौल मिलते हैं जो दस से भी ज़्यादा हैं| लिहाज़ा इस रात को खास मानना बेअक्ल और बेबुनियाद हैं|
  2. अगर इस रात की सही दिन तारीख उल्मा के किसी एक कौल को सही मान भी लिया जाये तब भी ये जायज़ नही के इस रात मे कोई ऐसी इबादत करे जो कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) और उनके सहाबी या ताबाईन या तबा ताबाईन से साबित नही| लिहाज़ा इसका कोई सबूत नही मिलता के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने इसे कभी खुद किया हो या अपने सहाबी को करने का हुक्म दिया हो| साथ ही नबी के बाद इस रात की इबादत का ज़िक्र या हुक्म खुलफ़ा राशीदीन से भी नही मिलता और न कभी खुद खुलफ़ा राशीदीन ने इसको किया| इसलिए अगर इस रात का कही भी कोई ज़िक्र होता तो किसी न किसी सहाबी के ज़रिये कोई न कोई हदीस हम तक ज़रूर पहुंचती लेकिन ऐसा कही भी नही मिलता| बल्कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने अपनी ज़िन्दगी मे हर किस्म की इबादत के ताल्लुक से ही ज़ाती तौर पर अमल या अपने सहाबी के किसी हुक्म के ज़रिये नही पहुंचाया और आज जो लोग इस बिदअत को दीन ए इस्लाम का अहम रुक्न समझ कर करते हैं तो वो क्या ये साबित करना चाहते हैं के वो नबी (ﷺ) से या सहाबा से या उनके बाद के लोगो से ज़्यादा दीनदार और अमल करने वाले हैं|
  3. इस जश्न के अन्दर कई तरह के नाजायज़ और गैर इस्लामी काम किये जाते हैं जिनका शरियत ए इस्लामिया से कोई ताल्लुक नही और सबसे ताज्जुब की बात ये हैं इस जश्न को मनाने वाले अनगिनत लोगो शरियत इस्लामी से हज़ारो मील दूर हैं जिनको ये तक शर्फ़ हासिल नही के नमाज़ पढ़े जो उन पर फ़र्ज़ हो चुकी हैं| अलबत्ता वो ऐसी बिदअतो मे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं| और ऐसी खुशी का इज़हार करते हैं जैसे उन्होने दुनिया मे ही अपनी मग्फ़िरत करा ली हो और उन्हे जन्नत का सर्टिफ़िकेट मिल गया हो|

लिहाज़ा ये दीन का हिस्सा नही बल्कि बिदअत हैं जिसके लिये नबी (ﷺ) का फ़रमान हैं के हर बिदअत गुमराही हैं और हर गुमराही जहन्नम मे ले जाने वाली हैं| लिहाज़ा इसको करने वाले अपने बचाव का कोई जवाब पहले ही सोच ले के उन्हे आखीरत मे अल्लाह को क्या जवाब देना हैं|

सलातुर्रगाइब

इस महीने की मशहूर बिदअतो मे एक बिदअत सलातुर्रगाइब हैं जो इस महीने के पहले जुमेरात का रोज़ा रखने के बाद पहले जुमे की रात को मगरिब और इशा की नमाज़ के बीच पढ़ी जाती हैं| इस बिदाअत को करने के लिये एक ऐसी हदीस का सहारा लिया जाता हैं जिस के मौज़ू (मनगढ़ंत) होने पर तमाम उल्मा का इत्तेफ़ाक हैं| इस बिदअत मे 12 रकात नमाज़ हैं हर रकात मे सूरह फ़ातिहा के बाद तीन बार सूरह कद्र और 12 बार सूरह इख्लास पढ़ी जाती हैं और हर 2 रकात पर सलाम फ़ेरा जाता हैं, नमाज़ से फ़ारिग होने के बाद 70 बार दरुद शरीफ़ पढ़ा जाता हैं और उसके बाद 2 सजदे किये जाते हैं और हर सजदे मे 70-70 बार “सुब्बुहुन कुद्दुसुन रब्बुल मलाईकते वर्रुहे” पढ़ी जाती हैं| इसके बाद अपनी हाजत का सवाल किया जाये तो हाजत पूरी हो जाती हैं| फ़िर इस नमाज़ की वह फ़ज़ीलत गिनाई गयी हैं जिन पर खुद इस हदीस के बातिल होने का पता चलता हैं| जैसे उस आदमी के सारे गुनाह माफ़ कर दिये जायेगे चाहे वो समुन्दर के बराबर हो, कयामत के दिन वह अपने घर वालो के साथ 700 लोगो की सिफ़ारिश करेगा, कब्र के अज़ाब से निजात पायेगा, मैदाने हश्र मे वह नमाज़ उस के सर पर साया करेगी…वगैराह| इस हदीस को अल्लामा इब्ने जौज़ी ने अपनी किताब “अल मौज़ुआत” मे ज़िक्र किया हैं|

इस नमाज़ की बिदअत की शुरुआत सबसे पहले बैतुल मुकद्दस मे 480 हिजरी के बाद ईजाद की गयी, इससे पहले किसी ने भी इस नमाज़ को नही पढ़ा| (अबू बक्र अत तरतूशी की अल हवादिस वल बिदअ)

इस नमाज़ के बिदअत और गैर इस्लामिक होने मे कोई शक नही खासकर ये नमाज़ सहाबा इकराम के बाद वजूद मे आई और न ही नबी (ﷺ) ने इसे कभी अपनी ज़िन्दगी मे पढ़ा और न सहाबा को इसे पढ़ने की तरगीब दिलाई| इसके अलावा न ही ताबाईन मे से किसी से ये साबित हैं और न तबा ताबाईन से ये नमाज़ साबित हैं|

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमियाह रह0 फ़रमाते हैं –
सलातुर्रगाइब का कोई बुनियाद नही बल्कि यह ईजाद कर ली गयी बिदअत हैं| इसलिये इसे न जमात के साथ पढ़ना मुस्तहब हैं और न अकेले बल्कि सही मुस्लिम से साबित हैं के नबी (ﷺ) ने जुमे की रात को क्याम के लिये और जुमे के दिन को रोज़ा रखने कि लिये खास करने से मना फ़रमाया हैं और इस बारे मे जिस हदीस को पेश किया जाता उसके झूठ और मनगढ़ंत होने पर उलमा का इत्तेफ़ाक हैं, सलफ़ और आइम्मा इकराम ने सिरे से इसको ब्यान ही नही किया हैं| (मजमूअ फ़तावा 23/132)
साथ ही इब्ने तैमियाह रह0 ने ये भी फ़रमाया –
अइम्मा ए दीन इस बात पर एक मत हैं कि सलातुर्रगाइब बिदअत हैं, न तो इसे नबी (ﷺ) ने मसनून करार दिया हैं और न ही आप (ﷺ) के खुलफ़ा ने और न ही अइम्मा ए दीन जैसे इमाम मालिक, शाफ़ई, हंबल, अबू हनीफ़ा, सौरी, औज़ाई और लैस वगैराह मे से किसी ने इसे मुसतहब समझा हैं और इस के बारे मे जो हदीस हैं वो मुहद्दिस के नज़दीक बिना किसी इख्तेलाफ़ के मौज़ूअ हैं| (मजमूअ फ़तावा 23/134)
इमाम इब्नुल कैयिम रह0 फ़रमाते हैं –
इसी तरह रजब के पहले जुमा की रात को सलातुर्रगाइब पढ़ने की हदीसे नबी (ﷺ) पर झूठ गढ़ी हुई हैं| (अलमनारुल मुनीफ़ पेज नं 95)

रजबी सियाम व कियाम

रजब के महीने मे ईजाद कर ली गयी बिदाअतो मे एक बिदाअत ये भी है के इस महीने मे खास तौर से रोज़ा रखना या कियामुल्लैल करना भी हैं| ऐसा करने वाले इन बिदाअतो को करने के लिये ऐसी कमज़ोर दलीलो का सहारा करते हैं जिसका कोई वजूद नही बल्कि अकसर उल्माए दीन ने इन्हे बातिल और गलत करार दिया है –
शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिया रह0 फ़रमाते हैं –
रजब और शाबान के महीने को एक साथ रोज़े या ऐतिकाफ़ के लिये खास करने के लिये नबि सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम, सहाबा या अइम्मा ए मुस्लिमीन से कोई चीज़ नही आई बल्कि सहीह बुखारी, मुस्लिम से साबित हैं के नबी (ﷺ) शाबान से ज़्यादा किसी और महीने मे नफ़्ली रोज़ा नही रखते थे अलबत्ता जहा तक रजब के रोज़े का ताल्लुक हैं तो इस की सभी हदीसे ज़ैइफ़ बल्कि मौज़ू और मनगढ़ंत हैं| उल्मा उनमे से किसी हदीस पर भरोसा नही करते हैं और यह इस तरह की ज़ैइफ़ नही हैं जो फ़ज़ायल के अन्दर ब्यान की जाती हैं बल्कि ये तो खालिस गढ़ी हुई झूठी हदीसे हैं| (मजमूअ फ़तावा 25/290, 291)
अल्लामा इब्ने रजब रह0 फ़रमाते हैं –
रजब के महीने की फ़ज़ीलत मे नबी (ﷺ) और आप के सहाबा से कोई भी पुख्ता सबूत नही हैं| (लताईफ़ुल मआरिफ़ पेज 140)
हाफ़िज़ इब्ने हजर रह0 फ़रमाते हैं –
रजब के महीने की फ़ज़ीलत या उसके रोज़े की फ़ज़ीलत या उसके किसी खास दिन के रोज़े की फ़ज़ीलत या इस महीने मे किसी खास रात का कियाम करने की फ़ज़ीलत मे कोई सही हदीस नही आई हैं जो सबूत बन सके| मुझ से पहले अबू इस्माईल अल हरवी ने भी इसी बात को साफ़ किया हैं| (तबईनुल अजब बिमा वरदा फ़ी फ़ज़ले रजब पेज 5)

रजबी उमराह

कुछ लोगो की अकसरियत इस महीने मे उमराह करने के कायल हैं और ये गुमान करते हैं कि इस महीने मे उमराह करने की फ़ज़ीलत दूसरे महीनो से ज़्यादा हैं| हालाँकि इस बारे मे भी नबी (ﷺ) की कोई सही हदीस मौजूद हैं न ही किसी उल्मा की या मुहद्दिस की इस बारे मे राये हैं कि रजब का उमराह की फ़ज़ीलत दूसरे महीनो से ज़्यादा हैं बल्कि आप (ﷺ) ने अपनी ज़िन्दगी मे सिर्फ़ 4 बार उमराह किया हैं और उन मे कोई भी रजब के महीने मे नही किया हैं|

उरवा बिन ज़ुबैर रज़ि0 से मस्जिद नबवी मे अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि0 के इस कौल कि नबी (ﷺ) ने एक उमराह रजब मे किया था के बारे हज़रत आयशा रज़ि0 से पूछा तो –

आयशा रज़ि0 ने जवाब दिया –
अल्लाह अबू अब्दुर्रहमान पर रहम करे आप (ﷺ) ने जो भी उमराह किया मै उस मे आप के साथ मौजूद थी और आप (ﷺ) ने कभी भी रजब के महीने मे उमराह नही किया| (सही बुखारी)

खास बात ये के अगर रजब के महीने मे अगर उमराह करने की फ़ज़ीलत दूसरे महीनो से ज़्यादा होती तो आप (ﷺ) इस बात को सहाबा रज़ि0 को ज़रूर बताते जैसे –

आप (ﷺ) ने ये फ़रमाया –
रमज़ान मे उमराह करना हज करने के बराबर हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

लिहाज़ा रजब के महीने मे जो लोग इन बिदाअतो को अन्जाम देते हैं उनको चाहिये के वो खालिस इस्लाम की तालिम जो नबी (ﷺ) ने सहाबा को, सहाबा ने ताबाईन को और ताबाईन तबा ताबाईन को और इनसे आइम्मा, मुहद्दिस, उलमा तक पहुची उस पर तहकीक करे और इन बिदाअतो से बचे| मत भूले के कल हमे अल्लाह के सामने इसका जवाब भी देना हैं|

Source: Islam-the truth Courtesy : www.ieroworld.net www.taqwaislamicschool.com Taqwa Islamic School Islamic Educational & Research Organization ( IERO )

Friday, April 29, 2016

मुस्लिम समाज और फिरके

मुस्लिम समाज और फिरके
भारत में इस्लाम की बरेलवी विचारधारा के सूफ़ियों और नुमाइंदों ने एक कांफ्रेंस कर कहा कि वो दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ हैं। सिर्फ़ इतना ही नहीं बरेलवी समुदाय ने इसके लिए वहाबी विचारधारा को ज़िम्मेदार ठहराया। इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच सभी की दिलचस्पी इस बात में बढ़ गई है कि आख़िर ये वहाबी विचारधारा क्या है। लोग जानना चाहते हैं कि मुस्लिम समाज कितने पंथों में बंटा है और वे किस तरह एक दूसरे से अलग हैं?

आइये देखते है इस्लाम में मुस्लिम समाज और फिरके की हैसियत क़ुरान और हदीस की रौशनी में किया है ?

अल्लाह का क़ुरआन में हुकुम –
और तुम सब के सब (मिलकर) अल्लाह की रस्सी मज़बूती से थामे रहो और आपस में (एक दूसरे के) फूट ना डालो। (सूरह आलि इमरान 3:103)
अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया –
जिन लोगों ने अपने धर्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और स्वयं गिरोहों में बँट गए, तुम्हारा उनसे कोई संबंध नहीं । उनका मामला तो बस अल्लाह के हवाले है । फिर वह उन्हें बता देगा, जो कुछ वे किया करते थे। (सूरह अनआम 6:159)

इस्लाम के सभी अनुयायी ख़ुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन इस्लामिक क़ानून (फ़िक़ह) और इस्लामिक इतिहास की अपनी-अपनी समझ के आधार पर मुसलमान कई पंथों में बंटे हैं। बड़े पैमाने पर या संप्रदाय के आधार पर देखा जाए तो
मुसलमानों को दो हिस्सों – सुन्नी और शिया में बांटा जा सकता है। हालांकि सुन्नी और शिया भी कई फ़िरक़ों या पंथों में बंटे हुए हैं।

बात अगर शिया-सुन्नी की करें तो दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि अल्लाह एक है, मोहम्मद (ﷺ) साहब उनके दूत हैं और क़ुरान आसमानी किताब यानी अल्लाह की भेजी हुई किताब है। लेकिन दोनों समुदाय में विश्वासों और पैग़म्बर मोहम्मद (ﷺ) की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी के मुद्दे पर गंभीर मतभेद हैं। इन दोनों के इस्लामिक क़ानून भी अलग-अलग हैं।

सुन्नी
सुन्नी या सुन्नत का मतलब उस तौर तरीक़े को अपनाना है। जिस पर पैग़म्बर मोहम्मद (ﷺ) साहब (570-632 ईसवी) ने ख़ुद अमल किया हो और इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं।

एक अनुमान के मुताबिक़, दुनिया के लगभग - 80-85% प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं। जबकि
15-20% प्रतिशत के बीच शिया हैं।

सुन्नी मुसलमानों का मानना है कि
पैग़म्बर मोहम्मद (ﷺ) के बाद उनके ससुर हज़रत अबु-बकर (632-634 ईसवी) मुसलमानों के नए नेता बने, जिन्हें ख़लीफ़ा कहा गया।
इस तरह से अबु-बकर के बाद हज़रत उमर (634-644 ईसवी),
हज़रत उस्मान (644-656 ईसवी) और
हज़रत अली (656-661 ईसवी) मुसलमानों के नेता बने।

इन चारों को ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन यानी सही दिशा में चलने वाला कहा जाता है। इसके बाद से जो लोग आए, वो राजनीतिक रूप से तो मुसलमानों के नेता कहलाए लेकिन धार्मिक एतबार से उनकी अहमियत कोई ख़ास नहीं थी।

जहां तक इस्लामिक क़ानून की व्याख्या का सवाल है।
सुन्नी मुसलमान मुख्य रूप से चार समूह में बंटे हैं। हालांकि पांचवां समूह भी है जो इन चारों से ख़ुद को अलग कहता है। इन पांचों के विश्वास और आस्था में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन इनका मानना है कि उनके इमाम या धार्मिक नेता ने इस्लाम की सही व्याख्या की है।

दरअसल सुन्नी इस्लाम में इस्लामी क़ानून के चार प्रमुख स्कूल हैं।
आठवीं और नवीं सदी में लगभग 150 साल के अंदर चार प्रमुख धार्मिक नेता पैदा हुए। उन्होंने इस्लामिक क़ानून की व्याख्या की और फिर आगे चलकर उनके मानने वाले उस फ़िरक़े के समर्थक बन गए।
ये चार इमाम थे –
  1. इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी)
  2. इमाम शाफ़ई (767-820 ईसवी)
  3. इमाम हंबल (780-855 ईसवी)
  4. इमाम मालिक (711-795 ईसवी).
इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी)
इमाम अबू हनीफ़ा के मानने वाले हनफ़ी कहलाते हैं। इस फ़िक़ह या इस्लामिक क़ानून के मानने वाले मुसलमान भी दो गुटों में बंटे हुए हैं। एक देवबंदी हैं तो दूसरे अपने आप को बरेलवी कहते हैं।

देवबंदी और बरेलवी
दोनों ही नाम उत्तर प्रदेश के दो ज़िलों, देवबंद और बरेली के नाम पर है। दरअसल 20वीं सदी के शुरू में दो धार्मिक नेता –
मौलाना अशरफ़ अली थानवी (1863-1943) और
अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी (1856-1921) ने इस्लामिक क़ानून की अलग-अलग व्याख्या की।

अशरफ़ अली थानवी का संबंध दारुल-उलूम देवबंद मदरसा से था। जबकि आला हज़रत अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी का संबंध बरेली से था।

मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही और मौलाना क़ासिम ननोतवी ने 1866 में देवबंद मदरसे की बुनियाद रखी थी।

देवबंदी विचारधारा को परवान चढ़ाने में –
  1. मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही
  2. मौलाना क़ासिम ननोतवी और
  3. मौलाना अशरफ़ अली थानवी, की अहम भूमिका रही है।
उपमहाद्वीप यानी –
  • भारत।
  • पाकिस्तान।
  • बांग्लादेश। और
  • अफ़ग़ानिस्तान। में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों का संबंध इन्हीं दो पंथों से है।
देवबंदी और बरेलवी विचारधारा के मानने वालों का दावा है कि क़ुरान और हदीस ही उनकी शरियत का मूल स्रोत है लेकिन इस पर अमल करने के लिए इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है। इसलिए शरीयत के तमाम क़ानून इमाम अबू हनीफ़ा के फ़िक़ह के अनुसार हैं।

वहीं बरेलवी विचारधारा के लोग आला हज़रत रज़ा ख़ान बरेलवी के बताए हुए तरीक़े को ज़्यादा सही मानते हैं। बरेली में आला हज़रत रज़ा ख़ान की मज़ार है जो बरेलवी विचारधारा के मानने वालों के लिए एक बड़ा केंद्र है।

दोनों में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नहीं लेकिन कुछ चीज़ों में मतभेद हैं। जैसे बरेलवी इस बात को मानते हैं कि पैग़म्बर मोहम्मद सब कुछ जानते हैं, जो दिखता है वो भी और जो नहीं दिखता है वो भी। वह हर जगह मौजूद हैं और सब कुछ देख रहे हैं।

वहीं देवबंदी इसमें विश्वास नहीं रखते। देवबंदी अल्लाह के बाद नबी को दूसरे स्थान पर रखते हैं लेकिन उन्हें इंसान मानते हैं। बरेलवी सूफ़ी इस्लाम के अनुयायी हैं और उनके यहां सूफ़ी मज़ारों को काफ़ी महत्व प्राप्त है जबकि देवबंदियों के पास इन मज़ारों की बहुत अहमियत नहीं है, बल्कि वो इसका विरोध करते हैं।

Tuesday, March 8, 2016

तलाक की छुरी और हलाले की लानत

Talaaq halala

तलाक की छुरी और हलाले की लानत

तलाक शादीशुदा ज़िन्दगी का बहुत ही तकलीफ़देह मोड़ होता हैं, जिसमे शौहर बीवी के बीच निकाह का पाकीज़ा रिश्ता टूट जाता हैं| इन्फ़िरादी ज़िन्दगी हो या परिवारिक ज़िन्दगी हो, इस्लाम बुनियादी तौर पर कानून, रज़ामन्दी, इत्तेहादी, भाईचारे और मुहब्बत और रहम का परचम बुलन्द करता हैं| लड़ाई-झगड़ा, फ़ूट-बिखराव, असामाजिक और रिश्तो की खराबी को इस्लाम ने बुरा जाना हैं| कानूनी दायरे के तहत इस्लाम ने इत्तेहाद और आपसी रज़ामन्दी को इतनी अहमियत दी हैं के रिश्तो और रिश्तेदारो के हक मे.. मुहम्मद (ﷺ) का फ़रमान हैं के –
रिश्तो को काटने वाला जन्नत मे दाखिल नही होगा| (बुखारी व मुस्लिम)
एक और जगह –
आप (ﷺ) ने फ़रमाया – रहम अल्लाह के अर्श के साथ जुड़ा हैं और कहता हैं जो मुझे मिलाये अल्लाह उसे मिलायेगा जो मुझे काटे अल्लाह उसे काटेगा| (बुखारी व मुस्लिम)
आम मुसल्मानो को यहां तक मिलजुल कर और मुहब्बत के साथ रहने का हुक्म दिया गया के –
फ़रमाने नबवी हैं के –
किसी मुसल्मान के लिये अपने मुसल्मान भाई से तीन दिन से ज़्यादा लाताल्लुक रहन जायज़ नही और जो शख्स जो तीन दिन के बाद इसी हालत मे मर गया वह आग मे जायेगा| (अहमद व अबू दाऊद)

शादीशुदा ज़िन्दगी के बारे मे तो इस्लाम का कानून ही यही हैं के ये रिश्ता (यानि निकाह) ज़िन्दगी भर साथ निभाने और एक दूसरे के साथ वफ़ा करने का रिश्ता हैं जिसके लिये अल्लाह खासकर दोनो(यानि शौहर और बीवी) के दिलो मे मुहब्बत और नर्मी का अहसास पैदा कर देता हैं| यहां तक की दोनो अफ़राद एक दूसरे के करीब से सुख महसूस करने लगते हैं| शादीशुदा ज़िन्दगी की इस छोटी सी ज़िन्दगी मे पाबन्दी, वफ़ादारी, रज़ामन्दी और भाईचारे को इस्लाम ने जितना अहमियत दी हैं इसका अन्दाज़ा दोनो के हक से इस बात से लगाया जा सकता हैं के –

नबी (ﷺ) ने फ़रमाया –
अगर मैं अल्लाह के सिवा किसी दूसरे को सजदा करने का हुक्म देता तो औरतो को हुक्म देता के अपने शौहर को सजदा करे| (तिर्मिज़ी)
एक दूसरी हदीस मे – आप (ﷺ) ने फ़रमाया –
उस ज़ात की कसम जिसके हाथ मे मेरी जान हैं जब शौहर बीवी को अपने बिस्तर पर बुलाये और बीवी इन्कार कर दे तो वो ज़ात जो आसमानो मे हैं नाराज़ रहती हैं| यहा तक कि उसका शौहर उससे राज़ी हो जाये| (मुस्लिम)
इसके अलावा आप (ﷺ) ने और भी जगह लोगो को वाज़ और नसीहत की –
बीवी को गाली न दो| –(मुस्लिम)
बीवी को लौंडी की तरह न मारो| –(बुखारी)
और सबसे अहम जो बात इस रिश्ते मे मर्दो को ताकीद के साथ बताई वो ये के –
तुममे सबसे बेहतर वो हैं जो अपनी बीवी के हक मे बेहतर हैं| (तिर्मिज़ी)

ज़रा गौर फ़िक्र कीजिये! अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) पर ईमान रखने वाला कोई भी मर्द या औरत अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी मे उपर बताई गयी तालीमात का इन्कार करके इस्लाम की अज़मत को बिना किसी उज्र के रुसवा करने का ख्याल भी कर सकता हैं| अकसरियत का जवाब नही मे होगा| लेकिन फ़ितरते इन्सानी और आदतो मे इख्तेलाफ़ की वजह से उतार चढ़ाव इन्सानी ज़िन्दगी के ज़रूरी हिस्से हैं जिसमे शादीशुदा ज़िन्दगी मे दूसरे हिस्सो के मुकाबले ज़्यादा दुख और आजमाइश नज़र आती हैं| इब्लीस के चेले हर जगह और हर वक्त शादीशुदा ज़िन्दगी को बरबाद करने के लिये तैयार रहते हैं|

नबी (ﷺ) का इरशाद हैं –
इब्लीस का तख्त पानी पर र्हैं जहा से वो पूरी दुनिया मे अपने लश्कर को रवाना करता हैं और उसे सबसे ज़्यादा चहेता वो शैतान होता हैं जो सबसे ज़्यादा फ़ितना फ़ैलाये| (वापस आकर) एक कहता हैं मैने फ़लां फ़लां कारनामा अंजाम दिया| इब्लीस कहता हैं – तूने कुछ भी नही किया|
फ़िर दूसरा आता हैं वो कहता हैं – मैं फ़लां-फ़लां मर्द और औरत के पीछे पड़ा रहा यहा तक के दोनो को एक दूसरे से अलग करके छोड़ा| इब्लीस उसे अपने पास तख्त पर बिठा लेता हैं और कहता हैं – तूने बड़ा अच्छा काम किया|
(मुस्लिम)

इन इब्लीसी कारनामो के तहत कभी-कभी फ़ितने ऐसा सर उठाते हैं कि पीछा ही नही छूटता और इन्सान की सारी की सारी सूझ-बूझ और अकल्मन्दी धरी की धरी रह जाती हैं और कुछ समझ नही आता के क्या करे| प्यार मुहब्बत के नाज़ुक रिश्ते मे दरार आ जाती हैं और जज़्बात ज़ख्मी हो जाते हैं| ऐसे मुश्किल हालात मे भी इस्लाम हर हाल मे यही रास्ता दिखाता हैं के रिश्ता ऐसे मुश्किल वक्त मे भी किसी तरह बरकरार रहे| लिहाज़ा अगर किसी शौहर की बीवी अगर बदइख्लाक, बदतमीज़ और नाफ़रमान हैं तो शौहर को फ़ौरन ही तलाक का फ़ैसला नही करना चाहिये अगर उसमे नाकामी हो तो दूसरे मौके पर चेतावनी के साथ घर के अन्दर उसका बिस्तर अलग कर देना चाहिये अगर इस मे भी नाकामयाबी और बीवी अपना रवैया ना बदले तो उसे डांट-डपट कर हल्की मार मारने की इजाज़त भी दी गयी हैं|

Wednesday, November 4, 2015

कुरान में Orbits, Nebula aur Big Bang theory का ज़िक्र

कुरान में Orbits, Nebula aur Big Bang theory का ज़िक्र

कुरान से :
“सूर्य चन्द्रमा को अपनी ओर खींच नहीं सकता और ना दिन, रात से आगे निकल सकता है. ये सब एक कक्षा (orbit) में अपनी गति के साथ चल रहे है.” ( अल-कुरान 36:40 )

दिन के रात से आगे निकलने के शब्द देखिये, पृथ्वी से ऊंचाई पर जाकर देखा जाये तो इस दृश्य का इन्ही शब्दों में उल्लेख किया जा सकता है की दोनों एक दुसरे का पीछा कर रहे है. इसके अतरिक्त आयत में “यसबाहून” शब्द है जिसका अर्थ है की वो अपनी गति के साथ चल रहे हैं अर्थात आयत में बता दिया गया है की सूर्ये चन्द्रमा और पृथ्वी अपनी-अपनी धुरी (Axis) पर घूम रहे है और इस गति के साथ-साथ अपनी-अपनी कक्षों (Orbits) में भी घूम रहे है.

बीसवी शताब्दी में आकर विज्ञान (Science) ने बताया की सूर्य अपनी धुरी (Axis) पर एक चक्कर 25 दिन में पूरा करता है और अपनी कक्षा (Orbits) में 125 मील प्रति सेकंड (7,20,000 प्रति किलोमीटर प्रति घंटे) की गति से चलते हुए एक चक्कर 25 करोड़ वर्ष में पूरा करता है. आधुनिक विज्ञानिक शोध ने अब यह बताया हैं की सूर्य व चन्द्रमा की जीवन अवधि एक दिन समाप्त हो जाएगी और यह की सूर्य एक विशेष दिशा में भी बहा चला जा रहा है |

आज विज्ञान ने उस स्थान को निश्चित भी कर दिया है जहा सूर्य जाकर समाप्त होगा. उसे Solar Apex का नाम दिया गया हैं और सूर्य उसकी ओर 12 मील प्रति सेकंड की गति से बढ़ रहा है |

अब ज़रा बीसवी सदी के इन अनुसंधानों को कुरान की दो आयतों में देखे :

अल्लाह ने कुरान में फ़रमाया है :
“ क्या तुमने इस पर दृष्टि नहीं डाली की अल्लाह रात को दिन में और दिन को रात में प्रवेश करता है. सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगा रखा है. हर एक निश्चित काल तक ही चलेगा (और अल्लाह जब ऐसा सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी है तो) अल्लाह तुम्हारे सारे कर्मो की जानकारी भी रखता है |” ( अल-कुरान 31:29 )

इस आयत में एक निश्चित समय तक सूर्य और चन्द्रमा की जीवन का उल्लेख किया गया है और अब सूर्य के एक विशिष्ट स्थान की ओर खिसकने का वर्णन |

कुरान बताता है :
“ और एक निशानी यह भी है की सूर्य अपने लक्ष्य की और चला जा रहा है. यह एक अथाह ज्ञान वाले (अल्लाह) का निश्चित किया हुआ हिसाब है |” ( अल-कुरान 36:38 )

यह आकाशगंगा, सर मंडल, तथा पृथ्वी व आकाश कैसे उत्पन्न हुए इस सम्बन्ध में कुरान ने संकेत दिया था |

कुरान :
“ फिर उसने (अल्लाह ने) ध्यान किया और वो पहले धुंआ (Gasseous Mass) था |” ( अल-कुरान 41:41 )
अल्लाह ने कुरान में फ़रमाया है |
“ क्या इनकार करने वाले नहीं देखते की आकाश और पृथ्वी प्रारंभ में एक थे फिर हमने उन्हें अलग-अलग किया और हर जीव की उत्पत्ति का आधार पानी को बनाया? क्या अब भी वो ईमान नहीं लायेंगे ?” ( अल-कुरान 21:30 )

उपरोक्त दोनों आयते Nebula और विशाल विस्फोट सिध्धांत (big-bang theory) की ओर संकेत करती है. यह भी विशिष्ट रूप से नोट कर लें की इन सब आयतों में ईश्वर ने इनकार करने वालो को ईमान लाने का निर्देश ये कहते हुए दिया हैं की हमारे इन चमत्कारों को देख कर भी तुम क्यों ईमान नहीं लाते. 1400 साल पहले कोई व्यक्ति अपने सामान्य जीवन के अनुभवों पर आधारित साधारण सी कविता के रूप में लोगो के समक्ष प्रस्तुत करता तो उसमे चुनोती न होती की यह साधारण बाते नहीं, वरना ईश्वर का वो महान चमत्कार हैं जिन्हें देख कर तुम्हे ईमान लाना ही चाहिए.

अल्लाह ने कुरान में फ़रमाया है :
“ आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, उसे हमने तुम्हारे अधीन कर दिया है और इस तथ्य में उन लोगो के लिए निशानियाँ हैं जो चिंतन करते हैं |” (( अल-कुरान 45:13 )

Posted by : Indian Muslim Ekta

Tuesday, November 3, 2015

आदम : पैदाइश से ज़मीन तक उतारे जाने तक

पैदाइश से ज़मीन तक उतारे जाने तक
सब से पहले आदम (عليه السلام) को दुनिया में भेजा गया। हज़रत आदम (عليه السلام) को अबुलबशर यानि सब इन्सानों का बाप कहा जाता है। दुनिया में जितने भी इन्सान शुरू से आख़िर तक आ चुके हैं या आयेंगे सब हज़रत आदम (عليه السلام) की ही औलाद हैं इसी लिये इन्हें “आदमी” कहा जाता है। जब अल्लाह तआला ने हज़रत आदम (عليه السلام) की पैदाइश का इरादा फ़रमाया और फ़रिश्तों से अर्ज़ किया कि मैं ज़मीन में अपना ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ उस वक़्त ज़मीन में जिन्नात रहते थे और “ इब्लीस” की बादशाहत थी लिहाज़ा आपके बारे में कुछ बताने से पहले शैतान इब्लीस का ज़िक्र करना ज़रूरी है क्योंकि इस वाक़िये का शैतान से गहरा ताल्लुक़ है।

इब्लीस-ए-लईन
अल्लाह तआला ने इस मख़लूक़ को बहुत ख़ूबसूरत बनाया था और शराफ़त व बुज़र्गी से भी नवाज़ा था। ज़मीन और दुनिया के आसमान की बादशाहत दी थी। इसके अलावा उसे जन्नत की पहरेदारी के इनाम से भी नवाज़ा था। लेकिन उसने अल्लाह के सामने घमण्ड किया और ख़ुदाई का दावा कर बैठा जिसकी वजह से अल्लाह तआला ने उसे अपनी बारगाह से निकाल दिया और उसे शैतान में बदल दिया। उसकी शक्ल बिगाड़ दी और सारे रुतबे जो अल्लाह तआला ने उसे अता किये थे छीन लिये। उस पर अपनी लानत फ़रमाई, उसको अपने आसमानों से निकाल दिया और आख़िरत में उसको और उसकी पैरवी करने वालों का ठिकाना जहन्नुम क़रार दिया।

शैतान इब्लीस कौन था ?
इब्लीस फ़रिश्तों का सरदार था और जन्नत के बाग़ों की देखभाल करता था। उसको दुनिया और आसमान दोनों की बादशाहत मिली हुई थी।

(इब्ने जरीह रहमातुल्लाह अलैह से रिवायत, इब्ने अब्बास (र.अन्हु) के हवाले से)
फ़रिश्तों का एक क़बीला जिन्नात से ताल्लुक़ रखता था इब्लीस उन्हीं में से था। इस क़बीले के फ़रिश्तों को आग की गर्म लौ से पैदा किया गया था यह लौ शोले की तरह नज़र नहीं आती लेकिन सिर्फ़ महसूस की जा सकती है और सारी गर्मी इसी में होती है। इस क़बीले के अलावा बाक़ी सब फ़रिश्तों को नूर से पैदा फ़रमाया था। इब्लीस का नाम हारिस था दूसरी रिवायत में अज़ाज़ील भी आया है और यह जन्नत के पहरेदारों में से था।

Friday, October 30, 2015

9 और 10 मुहर्रम का रोज़ा


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
✦ इब्न अब्बास रदी अल्लाहू अन्हु से रिवायत है की रसूल-अल्लाह सलअल्लाहू अलैही वसल्लम जब मदीना में तशरीफ़ लाए तो आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने यहूदियो को देखा की वो आशूरा के दिन (10 मुहर्रम) का रोज़ा रखते हैं, आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने उनसे इसका सबब पूछा तो उन्होने कहा की ये एक अच्छा दिन है इस दिन अल्लाह सुबहानहु ने बनी इसराईल को उनके दुश्मन ( फिरओन ) से निजात दिलवाई थी इसलिए मूसा अलैही सलाम ने उस दिन का रोज़ा रखा था तो आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने फरमाया मूसा अलैही सलाम पर तुमसे ज़्यादा हक़ हमारा है, फिर आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने भी उस दिन रोज़ा रखा और सहाबा रदी अल्लाहू अन्हुमा को भी इसका हुक्म दिया
सही बुखारी, जिल्द 3, 2004

✦ अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदी अल्लाहू अन्हु से रिवायत है की जब रोज़ा रखा रसूल-अल्लाह सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने आशुरे के दिन (10 मुहर्रम) का और हुक़म किया इस रोज़ का, तो लोगो ने अर्ज़ की या रसूल-अल्लाह सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ये दिन तो ऐसा है की इसकी ताज़ीम यहूद और नसारा करते हैं,तो आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने फरमाया की जब अगला साल आएगा तो इंशा-अल्लाह हम 9 का रोज़ा रखेगे,आख़िर अगला साल ना आने पाया की आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम दुनिया से वफात पा गये (इसलिए हम मुसलमान 9 मुहर्रम और 10 मुहर्रम दोनों का रोज़ा रखते हैं)
सही मुस्लिम, जिल्द 3, 2666

कलौंजी - मौत को छोड कर हर मर्ज की दवाई है


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم

“मौत को छोड कर हर मर्ज की दवाई है कलौंजी"

हजरत अबू हुरेरा र॰ अ॰ से रिवायत है के
नबी ए करीम (ﷺ) से सुना की कलोंजी में मौत के अलावा हर बीमारी की शिफ़ा है.|

[सहीह मुस्लिम , जिल्द:03, किताब:तिब्बी, पेज:176, बाब:29, हदीस:5728-29].

कलौंजी : बड़ी से बड़ी बीमारी का एक इलाज : कलयुग में धरती पर संजीवनी है कलौंजी, अनगिनत रोगों को चुटकियों में ठीक करता है।

कैसे करें इसका सेवन
कलयुग में धरती पर संजीवनी है कलौंजी, अनगिनत रोगों को चुटकियों में ठीक करता है।
कलौंजी के बीजों का सीधा सेवन किया जा सकता है।
एक छोटा चम्मच कलौंजी को शहद में मिश्रित करके इसका सेवन करें।
पानी में कलौंजी उबालकर छान लें और इसे पीएं।
दूध में कलौंजी उबालें। ठंडा होने दें फिर इस मिश्रण को पीएं।
कलौंजी को ग्राइंड करें तथा पानी तथा दूध के साथ इसका सेवन करें।
कलौंजी को ब्रैड, पनीर तथा पेस्ट्रियों पर छिड़क कर इसका सेवन करें।

ये किन -किन रोगों में सहायक है :

टाइप-2 डायबिटीज : प्रतिदिन 2 ग्राम कलौंजी के सेवन के परिणामस्वरूप तेज हो रहा ग्लूकोज कम होता है। इंसुलिन रैजिस्टैंस घटती है,बीटा सैल की कार्यप्रणाली में वृद्धि होती है तथा ग्लाइकोसिलेटिड हीमोग्लोबिन में कमी आती है।

मिर्गी : 2007 में हुए एक अध्ययन के अनुसार मिर्गी से पीड़ित बच्चों में कलौंजी के सत्व का सेवन दौरे को कम करता है।

उच्च रक्तचाप : 100 या 200 मिलीग्राम कलौंजी के सत्व के दिन में दो बार सेवन से हाइपरटैंशन के मरीजों में ब्लड प्रैशर कम होता है।

दमा : कलौंजी को पानी में उबालकर इसका सत्व पीने से अस्थमा में काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) : रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) में एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार पीने से रक्तचाप सामान्य बना रहता है। तथा 28 मिलीलीटर जैतुन का तेल और एक चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर पूर शरीर पर मालिश आधे घंटे तक धूप में रहने से रक्तचाप में लाभ मिलता है। यह क्रिया हर तीसरे दिन एक महीने तक करना चाहिए।

गंजापन : जली हुई कलौंजी को हेयर ऑइल में मिलाकर नियमित रूप से सिर पर मालिश करने से गंजापन दूर होकर बाल उग आते हैं।

त्वचा के विकार : कलौंजी के चूर्ण को नारियल के तेल में मिलाकर त्वचा पर मालिश करने से त्वचा के विकार नष्ट होते हैं।
लकवा : कलौंजी का तेल एक चौथाई चम्मच की मात्रा में एक कप दूध के साथ कुछ महीने तक प्रतिदिन पीने और रोगग्रस्त अंगों पर कलौंजी के तेल से मालिश करने से लकवा रोग ठीक होता है।

कान की सूजन, बहरापन : कलौंजी का तेल कान में डालने से कान की सूजन दूर होती है। इससे बहरापन में भी लाभ होता है।

सर्दी-जुकाम : कलौंजी के बीजों को सेंककर और कपड़े में लपेटकर सूंघने से और कलौंजी का तेल और जैतून का तेल बराबर की मात्रा में नाक में टपकाने से सर्दी-जुकाम समाप्त होता है। आधा कप पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल व चौथाई चम्मच जैतून का तेल मिलाकर इतना उबालें कि पानी खत्म हो जाएं और केवल तेल ही रह जाएं। इसके बाद इसे छानकर 2 बूंद नाक में डालें। इससे सर्दी-जुकाम ठीक होता है। यह पुराने जुकाम भी लाभकारी होता है।

पेट के कीडे़ : 10 ग्राम कलौंजी को पीसकर 3 चम्मच शहद के साथ रात सोते समय कुछ दिन तक नियमित रूप से सेवन करने से पेट के कीडे़ नष्ट हो जाते हैं।

प्रसव की पीड़ा : कलौंजी का काढ़ा बनाकर सेवन करने से प्रसव की पीड़ा दूर होती है।

पोलियों का रोग : आधे कप गर्म पानी में एक चम्मच शहद व आधे चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय लें। इससे पोलियों का रोग ठीक होता है।

मुंहासे : सिरके में कलौंजी को पीसकर रात को सोते समय पूरे चेहरे पर लगाएं और सुबह पानी से चेहरे को साफ करने से मुंहासे कुछ दिनों में ही ठीक हो जाते हैं।

स्फूर्ति : स्फूर्ति (रीवायटल) के लिए नांरगी के रस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सेवन करने से आलस्य और थकान दूर होती है।

गठिया : कलौंजी को रीठा के पत्तों के साथ काढ़ा बनाकर पीने से गठिया रोग समाप्त होता है।

जोड़ों का दर्द : एक चम्मच सिरका, आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय पीने से जोड़ों का दर्द ठीक होता है।

आंखों के सभी रोग : आंखों की लाली, मोतियाबिन्द, आंखों से पानी का आना, आंखों की रोशनी कम होना आदि। इस तरह के आंखों के रोगों में एक कप गाजर का रस, आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर दिन में 2बार सेवन करें। इससे आंखों के सभी रोग ठीक होते हैं। आंखों के चारों और तथा पलकों पर कलौंजी का तेल रात को सोते समय लगाएं। इससे आंखों के रोग समाप्त होते हैं। रोगी को अचार, बैंगन, अंडा व मछली नहीं खाना चाहिए।

स्नायुविक व मानसिक तनाव : एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल डालकर रात को सोते समय पीने से स्नायुविक व मानसिक तनाव दूर होता है।

गांठ : कलौंजी के तेल को गांठो पर लगाने और एक चम्मच कलौंजी का तेल गर्म दूध में डालकर पीने से गांठ नष्ट होती है।

मलेरिया का बुखार : पिसी हुई कलौंजी आधा चम्मच और एक चम्मच शहद मिलाकर चाटने से मलेरिया का बुखार ठीक होता है।

स्वप्नदोष : यदि रात को नींद में वीर्य अपने आप निकल जाता हो तो एक कप सेब के रस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करें। इससे स्वप्नदोष दूर होता है। प्रतिदिन कलौंजी के तेल की चार बूंद एक चम्मच नारियल तेल में मिलाकर सोते समय सिर में लगाने स्वप्न दोष का रोग ठीक होता है। उपचार करते समय नींबू का सेवन न करें।

कब्ज : चीनी 5 ग्राम, सोनामुखी 4 ग्राम, 1 गिलास हल्का गर्म दूध और आधा चम्मच कलौंजी का तेल। इन सभी को एक साथ मिलाकर रात को सोते समय पीने से कब्ज नष्ट होती है।

खून की कमी : एक कप पानी में 50 ग्राम हरा पुदीना उबाल लें और इस पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह खाली पेट एवं रात को सोते समय सेवन करें। इससे 21 दिनों में खून की कमी दूर होती है। रोगी को खाने में खट्टी वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए।

पेट दर्द : किसी भी कारण से पेट दर्द हो एक गिलास नींबू पानी में 2 चम्मच शहद और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार पीएं। उपचार करते समय रोगी को बेसन की चीजे नहीं खानी चाहिए। या चुटकी भर नमक और आधे चम्मच कलौंजी के तेल को आधा गिलास हल्का गर्म पानी मिलाकर पीने से पेट का दर्द ठीक होता है। या फिर 1 गिलास मौसमी के रस में 2 चम्मच शहद और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार पीने से पेट का दर्द समाप्त होता है।

सिर दर्द : कलौंजी के तेल को ललाट से कानों तक अच्छी तरह मलनें और आधा चम्मच कलौंजी के तेल को 1 चम्मच शहद में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से सिर दर्द ठीक होता है। कलौंजी खाने के साथ सिर पर कलौंजी का तेल और जैतून का तेल मिलाकर मालिश करें। इससे सिर दर्द में आराम मिलता है और सिर से सम्बंधित अन्य रोगों भी दूर होते हैं।

कलौंजी के बीजों को गर्म करके पीस लें और कपड़े में बांधकर सूंघें। इससे सिर का दर्द दूर होता है। कलौंजी और काला जीरा बराबर मात्रा में लेकर पानी में पीस लें और माथे पर लेप करें। इससे सर्दी के कारण होने वाला सिर का दर्द दूर होता है।

उल्टी : आधा चम्मच कलौंजी का तेल और आधा चम्मच अदरक का रस मिलाकर सुबह-शाम पीने से उल्टी बंद होती है।

हार्निया : 3 चम्मच करेले का रस और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह खाली पेट एवं रात को सोते समय पीने से हार्निया रोग ठीक होता है।

मिर्गी के दौरें : एक कप गर्म पानी में 2 चम्मच शहद और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से मिर्गी के दौरें ठीक होते हैं। मिर्गी के रोगी को ठंडी चीजे जैसे- अमरूद, केला, सीताफल आदि नहीं देना चाहिए।

पीलिया : एक कप दूध में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर प्रतिदिन 2 बार सुबह खाली पेट और रात को सोते समय 1 सप्ताह तक लेने से पीलिया रोग समाप्त होता है। पीलिया से पीड़ित रोगी को खाने में मसालेदार व खट्टी वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए।

कैंसर का रोग : एक गिलास अंगूर के रस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 3 बार पीने से कैंसर का रोग ठीक होता है। इससे आंतों का कैंसर, ब्लड कैंसर व गले का कैंसर आदि में भी लाभ मिलता है। इस रोग में रोगी को औषधि देने के साथ ही एक किलो जौ के आटे में 2 किलो गेहूं का आटा मिलाकर इसकी रोटी, दलिया बनाकर रोगी को देना चाहिए। इस रोग में आलू, अरबी और बैंगन का सेवन नहीं करना चाहिए। कैंसर के रोगी को कलौंजी डालकर हलवा बनाकर खाना चाहिए।

दांत : कलौंजी का तेल और लौंग का तेल 1-1 बूंद मिलाकर दांत व मसूढ़ों पर लगाने से दर्द ठीक होता है। आग में सेंधानमक जलाकर बारीक पीस लें और इसमें 2-4 बूंदे कलौंजी का तेल डालकर दांत साफ करें। इससे साफ व स्वस्थ रहते हैं।

दांतों में कीड़े लगना व खोखलापन: रात को सोते समय कलौंजी के तेल में रुई को भिगोकर खोखले दांतों में रखने से कीड़े नष्ट होते हैं।

नींद : रात में सोने से पहले आधा चम्मच कलौंजी का तेल और एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से नींद अच्छी आती है।

मासिकधर्म : कलौंजी आधा से एक ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से मासिकधर्म शुरू होता है। इससे गर्भपात होने की संभावना नहीं रहती है।

जिन माताओं बहनों को मासिकधर्म कष्ट से आता है उनके लिए कलौंजी आधा से एक ग्राम की मात्रा में सेवन करने से मासिकस्राव का कष्ट दूर होता है और बंद मासिकस्राव शुरू हो जाता है।

कलौंजी का चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में शहद मिलाकर चाटने से ऋतुस्राव की पीड़ा नष्ट होती है।

मासिकधर्म की अनियमितता में लगभग आधा से डेढ़ ग्राम की मात्रा में कलौंजी के चूर्ण का सेवन करने से मासिकधर्म नियमित समय पर आने लगता है।

यदि मासिकस्राव बंद हो गया हो और पेट में दर्द रहता हो तो एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम पीना चाहिए। इससे बंद मासिकस्राव शुरू हो जाता है।

गर्भवती महिलाओं : कलौंजी आधा से एक ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन 2-3 बार सेवन करने से मासिकस्राव शुरू होता है।

गर्भवती महिलाओं को इसका सेवन नहीं कराना चाहिए क्योंकि इससे गर्भपात हो सकता है। :

स्तनों का आकार : कलौंजी आधे से एक ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से स्तनों का आकार बढ़ता है और स्तन सुडौल बनता है।

स्तनों में दुध : कलौंजी को आधे से 1 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम खाने से स्तनों में दुध बढ़ता है।

स्त्रियों के चेहरे व हाथ-पैरों की सूजन : कलौंजी पीसकर लेप करने से हाथ पैरों की सूजन दूर होती है।

बाल लम्बे व घने : 50 ग्राम कलौंजी 1 लीटर पानी में उबाल लें और इस पानी से बालों को धोएं। इससे बाल लम्बे व घने होते हैं।
बेरी-बेरी रोग : बेरी-बेरी रोग में कलौंजी को पीसकर हाथ-पैरों की सूजन पर लगाने से सूजन मिटती है।

भूख का अधिक लगना : 50 ग्राम कलौंजी को सिरके में रात को भिगो दें और सूबह पीसकर शहद में मिलाकर 4-5 ग्राम की मात्रा सेवन करें। इससे भूख का अधिक लगना कम होता है।

नपुंसकता : कलौंजी का तेल और जैतून का तेल मिलाकर पीने से नपुंसकता दूर होती है।

खाज-खुजली : 50 ग्राम कलौंजी के बीजों को पीस लें और इसमें 10 ग्राम बिल्व के पत्तों का रस व 10 ग्राम हल्दी मिलाकर लेप बना लें। यह लेप खाज-खुजली में प्रतिदिन लगाने से रोग ठीक होता है।

नाड़ी का छूटना : नाड़ी का छूटना के लिए आधे से 1 ग्राम कालौंजी को पीसकर रोगी को देने से शरीर का ठंडापन दूर होता है और नाड़ी की गति भी तेज होती है। इस रोग में आधे से 1ग्राम कालौंजी हर 6 घंटे पर लें और ठीक होने पर इसका प्रयोग बंद कर दें।

कलौंजी को पीसकर लेप करने से नाड़ी की जलन व सूजन दूर होती है।

हिचकी : एक ग्राम पिसी कलौंजी शहद में मिलाकर चाटने से हिचकी आनी बंद हो जाती है। तथा कलौंजी आधा से एक ग्राम की मात्रा में मठ्ठे के साथ प्रतिदिन 3-4 बार सेवन से हिचकी दूर होती है। या फिर कलौंजी का चूर्ण 3 ग्राम मक्खन के साथ खाने से हिचकी दूर होती है। और यदि आप काले उड़द चिलम में रखकर तम्बाकू के साथ पीने से हिचकी में लाभ होता है।

3 ग्राम कलौंजी पीसकर दही के पानी में मिलाकर खाने से हिचकी ठीक होती है।

स्मरण शक्ति : लगभग 2 ग्राम की मात्रा में कलौंजी को पीसकर 2 ग्राम शहद में मिलाकर सुबह-शाम खाने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

छींके : कलौंजी और सूखे चने को एक साथ अच्छी तरह मसलकर किसी कपड़े में बांधकर सूंघने से छींके आनी बंद हो जाती है।

पेट की गैस : कलौंजी, जीरा और अजवाइन को बराबर मात्रा में पीसकर एक चम्मच की मात्रा में खाना खाने के बाद लेने से पेट की गैस नष्ट होता है।

पेशाब की जलन : 250 मिलीलीटर दूध में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से पेशाब की जलन दूर होती है।

दमा रोग (ASTHMA): एक चुटकी नमक, आधा चम्मच कलौंजी का तेल और एक चम्मच घी मिलाकर छाती और गले पर मालिश करें और साथ ही आधा चम्मच कलौंजी का तेल 2 चम्मच शहद के साथ मिलाकर सेवन करें। इससे दमा रोग में आराम मिलता है।

पथरी : 250 ग्राम कलौंजी पीसकर 125 ग्राम शहद में मिला लें और फिर इसमें आधा कप पानी और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर प्रतिदिन 2 बार खाली पेट सेवन करें। इस तरह 21 दिन तक पीने से पथरी गलकर निकल जाती है।

सूजन : यदि चोट या मोच आने के कारण शरीर के किसी भी स्थान पर सूजन आ गई हो तो उसे दूर करने के लिए कलौंजी को पानी में पीसकर लगाएं। इससे सूजन दूर होती है और दर्द ठीक होता है। कलौंजी को पीसकर हाथ पैरों पर लेप करने से हाथ-पैरों की सूजन दूर होती है।

स्नायु की पीड़ा : दही में कलौंजी को पीसकर बने लेप को पीड़ित अंग पर लगाने से स्नायु की पीड़ा समाप्त होती है।

जुकाम : 20 ग्राम कलौंजी को अच्छी तरह से पकाकर किसी कपड़े में बांधकर नाक से सूंघने से बंद नाक खुल जाती है और जुकाम ठीक होता है।

जैतून के तेल में कलौंजी का बारीक चूर्ण मिलाकर कपड़े में छानकर बूंद-बूंद करके नाक में डालने से बार-बार जुकाम में छींक आनी बंद हो जाती हैं और जुकाम ठीक होता है। कलौंजी को सूंघने से जुकाम में आराम मिलता है।

यदि बार-बार छींके आती हो तो कलौंजी के बीजों को पीसकर सूंघें।

बवासीर के मस्से : कलौंजी की भस्म को मस्सों पर नियमित रूप से लगाने से बवासीर का रोग समाप्त होता है।

वात रोग : वात रोग में कलौंजी के तेल से रोगग्रस्त अंगों पर मालिश करने से वात की बीमारी दूर होती है।

नोट: ध्यान रखें कि इस दवा का प्रयोग गर्भावस्था में नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे गर्भ नष्ट हो सकता है।
Posted by : oldveda.com

Wednesday, October 28, 2015

इस्लाम क्या है?


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
इस्लाम क्या है?

इस्लाम अरबी ज़ुबान का लफ़्ज़ है| इस लफ़्ज़ को खोलने (सन्धि विच्छेद) पर इसका लफ़्ज़ "स ल म" जिसके माने अमन, पाकिज़गी, अपने आप को हवाले करना है| मज़हब के लिहाज़ से इस्लाम का मतलब अपने आप को पूरी तौर पर अल्लाह के हवाले कर देना है|

अल्लाह लफ़्ज़ भी अरबी ज़ुबान का ही लफ़्ज़ है जिसके माने "खुदा" या "भगवान" या "रब"के है| जिसके मतलब- एक और अकेला खुदा जिसने पुरी कायनात को बनाया, वो बडा रह्म करने वाला और रहीम(दयालु) है|

इस्लाम कोई नया दीन नही बल्कि ये तब से है जब अल्लाह ने इस दुनिया मै सबसे पहले इन्सान आदम अं (जो इस दुनिया मे अल्लाह के सब से पहले नबी थे) उन को भेजा| आदम अं के बाद जितने भी नबी या रसूल आये सबने सिर्फ़ इस्लाम की ही दावत या तालीम दी| दर हक़ीक़त इस्लाम किसी एक इन्सान या कौम या शहर या देश के लिये नही बल्कि तमाम दुनिया मे रहने वाले इन्सानो का दीन है जो इन्सान अपने आप को अल्लाह के सुपुर्द कर दे|

अमन व सलामती इस्लाम का एक बुनयादी तसव्वुर हैं जो के इस्लाम से गहरा ताल्लुक रखता हैं| इस्लाम का पूरा निज़ाम ए हयात, कानून, इस के अह्काम, इसके रस्म सब के सब इसकी तस्वीर अमन के साथ जोड्ते हैं| इस्लाम इस अज़ीम कायनात मे अज़ीम वहदत का दीन हैं| जिसका पहला कदम तौहीद ए इलाही से शुरु होता हैं| यानि इस ज़ात से जिससे ज़िन्दगी का सदूर होता हैं और इसी की तरफ़ रुजु होगा|

रब्बुल आलामीन का इर्शाद हैं :(ऐ मेरे नबी) आप कह दिजिए के वो अल्लाह एक हैं, अल्लाह बेनियाज़ हैं, इसने किसी को पैदा नही किया और ना वो किसी से पैदा किया गया हैं, और न उसका कोई शरीक हैं|
(सूरह इख्लास)

सब की ज़रुरते वही पूरी करने वाला हैं| इस के दर के सिवा कोई दर नही सब इसी के मोहताज हैं वो किसी का मोहताज नही क्योकि वो अपनी सिफ़ात मे मुकम्मल हैं| इसके इल्म मे हर चीज़ हैं| इसकी रहमत इसके गज़ब से ज़्यादा हैं| इसकी रहमत हर किसी के लिये आम हैं| इसी तरह वो अपनी इस सिफ़ात मे भी मुकम्मल हैं| उसमे कोई ऐब नही न कोई उस जैसा हैं| इसलिये सिर्फ़ वो ही इबादत के लायक हैं उसके सिवा कोई नही| इन्ही सिफ़ात के तहत वो कायनात मे इबादत के तमाम इख्तलाफ़ात को यही खत्म कर देता हैं|

अल्लाह सुब्हानो तालाह फरमाता हैं :अगर आसमान व ज़मीन मे अल्लाह के सिवा कई खुदा होते तो दोनो तबाह हो जाते|
(सूरह अम्बिया-22)

एक और जगह अल्लाह ने क़ुरान मे फ़र्माया :अल्लाह ने अपनी कोई औलाद नही पैदा करी और न ही इसके साथ कोई दूसरा माबूद हैं, वरना हर माबूद अपनी मख्लूक को लेकर अलग हो जाता और इन मे हर एक दूसरे पर चढ बैठता|
(सूरह अल मोमिनून-91)

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इस्लाम के बुनयादी अकायद


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
इस्लाम के बुनयादी अकायद

इस्लाम की बुनियाद जिन चीज़ो पर हैं उसके मुताबिक इन्सान को इन तमाम अकीदो पर अमल करना लाज़िमी हैं बिना इन बुनियादी अकीदो पर अमल किये और ईमान लाये एक इन्सान कतई मुसल्मान नही हो सकता| इस्लाम के बुनयादी अकीदे के मुताबिक जिन चीज़ो पर बन्दो को अमल करना और ईमान लाना हैं वो इस तरह हैं-

1.अल्लाह पर ईमान लाना अल्लाह पर ईमान लाना इस्लाम का पहला बुनयादी उसूल हैं| ईमान लाने से मतलब इस बात से हैं अल्लाह मौजूद हैं और वही हर चीज़ का मालिक हैं, वही सबका पालनेवाला हैं, वही हर चीज़ को अकेला पैदा करने वाला हैं, वो अकेला हैं और सारी कायनात को वही चला रहा हैं| इबादत का खालिस हकदार सिर्फ़ अल्लाह हैं न उसका कोई शरीक हैं न ही उसकी इबादत मे कोई शरीक हैं| उसका कोई शरीक और हिस्सेदार नही| और उसमे हर तरह की सिफ़ात हैं और वो हर ऐब से पाक और बरी हैं| इस्लाम का ये पहला बुनयादी अकायद हर इन्सान की फ़ितरत मे मौजूद हैं और अल्लाह ने हर इन्सान को इसी फ़ितरत पर पैदा किया हैं और इन्सान की ये फ़ितरत तब बदलती हैं जब उसके अकिदे को बदलने वाले दुनयावी मामलात उसके सामने होते हैं| इन्सान चाहे कैसा भी क्यो न हो लेकिन जब वो किसी परेशानी मे घिरता हैं तो सिर्फ़ अपने रब को को याद करता हैं और उसी की तरफ़ पलटता हैं ताकि उसका रब उसकी इस परेशानी को दूर कर दें|

नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम का इरशाद हैं : हर बच्चा फ़ितरते इस्लाम पर पैदा होता हैं और उसके मां-बाप या उसके अपने उसे बाद मे यहूदी या ईसाई या दूसरे दीन की तरफ़ फ़ेर देते हैं|

इन्सान की अक्ल इस बात की तरफ़ इशारा करती हैं और उसे अल्लाह पर ईमान लाने की रहनुमाई करती हैं लिहाज़ा अगर कोई इन्सान इस दुनिया और इसके अन्दर आसमान, ज़मीन, पहाड़, दरिया, जानवर और दिगर चीज़ो पर गौर करे तो उसे इस बात पर यकीन होगा की इस कायनात को पैदा करने वाला कोई अकेली ही कोई ज़ात हैं जिसने इस तमाम चीज़ो को बनाया और उसी के हाथ मे सब कुछ हैं|

इस ताल्लुक से अल्लाह ही सारी कायनात का पैदा करने वाला हैं इन्कार करने वालो की अक्ल से अगर ये सवाल किया जाये-
या तो ये कायनात किसी पैदा करने वाले के बिना ही वजूद मे आ गयी ?
इस सवाल पर अगर गौर किया जाये तो ये बात नामुमकिन सी लगती हैं और अक्ल भी हर ऐतबार से नकारती हैं क्योकि हर अक्ल वाला चाहे वो अल्लाह का इन्कार करे या न करे ये समझता हैं के कोई चीज़ बिना किसी पैदा करने वाले के बिना नही बन सकती|

या फ़िर इन्सानो और दूसरी मख्लूक ने खुद को पैदा कर लिया ?
ये बात भी काबिले गौर हैं अक्ल के ऐतबार से नामुमकिन हैं और कोई भी इन्सान इस पर यकीन नही करेगा के कोई चीज़ ने खुद को पैदा कर लिया क्योकि जब किसी चीज़ का वजूद ही नही तो वो खुद को कैसे पैदा कर सकती हैं और जब ये नही हैं तो आखिर इन्सान कैसे पैदा हुआ ?

इन सवालो से ये बात समझ आती हैं के कोई चीज़ बिना किसी के पैदा किया खुद नही हो सकती और न ही किसी मखलूक को ये ताकत के उसने खुद को पैदा कर लिया लिहाज़ा ये बात गौर करने वाली हैं के इन तमाम चीज़ो का कोई पैदा करने वाला हैं, जिसने इन्हे पैदा किया और ये सब चीज़े वजूद मे आई| और ये बात सिर्फ़ खालिस एक खुदा की तरफ़ इशारा करती हैं वही अल्लाह हैं जो हमेशा से हैं और हमेशा रहेगा|

ब्रिटिश किंग इन्स्टिटयूट और अमेरिकन इन्स्टीटयूट न्यूयार्क के प्रेसिडेंट क्रेसी मोरेसन ने अपनी किताब मे लिखा –पैदायशी रूप से इन्सान की बढ़ोत्तरी और जिम्मेदारी का अहसास अल्लाह पर ईमान लाने की निशानियो मे से एक निशानी हैं|

दूसरी जगह लिखते हैं– इन्सान की दीनदारी उसकी रूह का पता देती हैं और उसे धीरे-धीरे बुलन्द करती हैं यहा तक कि इन्सान अल्लाह से रिश्ते और जुड़ने का अहसास करने लगता हैं और अल्लाह से इन्सान की दुआ “के अल्लाह उसकी मदद करे एक फ़ितरती चीज़ हैं|

आगे लिखते हैं – इन्सान को रुतबा, इज़्ज़त, इन्सानियत किसी इन्सान को अल्लाह के इन्कार करने से नही मिलता| हमारी अक्ल और दायरे की हद हैं लिहाज़ा हम अक्ल की हद के आगे की सच्चाई तन नही जा सकते ना जान सकते और इसी बुनियाद पर हमारे लिये उस अल्लाह जिसने तमाम कायनात, हर चीज़, ज़र्रे, सितारो, सूरज और इन्सानो को पैदा किया ईमान लाना लाज़िमी हैं|

अल्लाह के अकेला होने की अक्ली दलील
इस बारे मे अनगिनत अक्ली दलीले मौजूद हैं जिनमे से एक दलील दुआओ का कबूल होना हैं| इस दुनिया मे हर ज़रुरतमंद अल्लाह से दुआ करता हैं तो अल्लाह उनकी दुआ को कबूल करता हैं उनकी मुसीबत और परेशानी कू उनसे दूर करता हैं|

अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया :
मुझे पुकारो मैं तुम्हारी दुआ करता हूं| (अल कुरान)
और वो कौन हैं जो परेशानी और मुसीबत के मारे की दुआ कबूल करता हैं और उसकी परेशानी दूर करता हैं| (अल कुरान)
और नूह को हमने निजात दी जब उसने हमको पुकारा तो हमने उसकी दुआ कबूल कर ली| (अल कुरान)

अक्ल की दलिलो मे नबीयो के वे निशानिया हैं जिनको चमत्कार कहा जाता हैं और ये वो चीज़े हैं जो इन्सान की आदत से अलग और उसकी ताकत से बाहर होती हैं जिसे अल्लाह नबियो के हाथो कराता हैं ताकि लोग नबी के ज़रिये बताये गये हक़ को पहचाने| लिहाज़ा ये मोजज़े (चमत्कार) रसूलो के भेजने वाले के वजूद की दलील हैं| इसकी मिसाल के तौर पे ये के जब मूसा अलै0 अपने मानने वालो को लेकर चले तो फ़िरऔन और उसके लश्कर ने उनका पीछा किया और जब मूसा और उनके मानने वाले दरिया नील के करीब पहुंचे तो अल्लाह के हुक्म से मूसा अलै0 ने दरिया मे अपनी लाठी मारी तो दरिया नील मे बीच से पैदल चलने के लिया रास्ता बन गया| (पूरा वाकिया कुरान मे देखे) और मूसा अलै0 और उनकी कौम ने दरिया पार कर ली लेकिन जब फ़िरऔन और उसके लश्कर ने दरिया के बीच मे पहुचा तो दरिया वापस मिल गयी और फ़िरऔन और उसका लश्कर उसमे डूब गया| इसी तरह ईसा अलै0 भी अल्लाह के हुक्म पर मुर्दो को ज़िन्दा करते थे| इसी तरह नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अल्लाह के हुक्म पर अपनी ऊंगली के इशारे से चांद के दो टुकड़े कर दियए और फ़िर से मिला दिये| ये वो मोजज़े(चमत्कार) हैं जो अल्लाह नबीयो के ज़रिये इस लिये कराता हैं के लोग अल्लाह को पहचान ले के उसके सिवा कोई दूसरा खुदा नही| क्योकि नबी भी इन्सानो मे से होता हैं और किसी इन्सान के बस मे नही के वो ऐसे मोजज़े अपनी ताकत से दिखाये| इसके अलावा किसी पैदा हुए बच्चे का मां की छाती से दूध पीना भी इस बात की दलील हैं के कोई ताकत उस बच्चे दूध पीने के लिये रहनुमाई कर रही हैं क्योकी किसी पैदा हुए बच्चे से बात कर उसे ये समझा पाना नामुम्किन हैं के उसे ये बताया जाये के उसकी भूख के लिये उसकी मां की छाती मे उसके लिये दूध का इन्तेज़ाम हैं| ये और इस तरह बहुत सी अक्ल की निशानिया इस दुनिया मे मौजूद हैं जो अकेले अल्लाह के होना का सबूत हैं|

2. फ़रिश्तो पर ईमान लाना

फ़रिश्ते अल्लाह की मख्लूक हैं जिन्हे अल्लाह ने खालिस अपनी इबादत के लिये पैदा किया हैं| फ़रिश्तो पर ईमान लाना हर मुसलमान के लिये लाज़िमी हैं और अल्लाह की इस मख्लूक से इन्कार करने वाला कतई मुसल्मान नही हो सकता| जैसा के

अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया : हमारे नबी (मुहम्मद सल्लललाहो अलैहे वसल्लम) जो कुछ उनपर उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया हैं उस पर ईमान लाये और उनके (साथ) मुसलमान भी और सब अल्लाह और उसके फ़रिश्तो और किताबो और रसूलो पर ईमान लाये|
(सूरह अल बकरा 2/285)

इसके अलावा हर फ़रीश्ते के ज़िम्मे अल्लाह ने अलग-अलग कामो को तय होना किया हैं जैसे जिब्रील अलै0 के ज़रिये अल्लाह अपने नबियो से कलाम करता हैं और अपने अहकाम बताता हैं| फ़रिश्तो की तादाद कितनी हैं इसका कोई इल्म किसी इन्सान को नही सिवाये अल्लाह के अलबत्ता हर फ़रिश्ता अल्लाह के हुक्म पर किसी न किसी काम को अन्जाम दे रहा हैं|

अल्लाह की इस मख्लूक पर ईमान लाने के लिये जिन बातो को जानना ज़रुरी हैं वो ये है-
फ़रिश्तो का वजूद हैं बल्कि फ़रिश्तो को अल्लाह ने फ़रिश्तो को इन्सान से पहले पैदा किया|

जैसा के कुरान से साबित हैं : और जब हमने फ़रिश्तो को हुक्म दिया के आदम को सजदा करो तो इब्लीस के सिवा सबने सजदा किया वो जिन्नात मे से था|
(सूरह कहफ़ 18/50)

इस आयत से साबित हैं के फ़रिश्ते का वजूद इन्सान की पैदाईश से पहले था|
जिन फ़रिश्तो का नाम मालूम हैं उनके नाम पर पर भी यकीन करना जैसे के जिब्रील अलै0 फ़रिश्तो के खसलत पर यकीन करना जैसे के

अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया : हज़रत ज़र बिन हबीश रज़ि0 से रिवायत हैं के हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद ने फ़रमाया के नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम ने जिब्रील अलै0 को देखा इनके छै सौ पंख हैं|
(बुखारी)

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत हैं के
नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया : मुझे कहा गया के मैं तुम्हे हामीलीन अर्श के एक फ़रिश्ते के बारे मे बताऊँ| बिलाशक व शुबहा इसके एक कानो से दूसरे कानो की दूरी सात सौ साल के बराबर हैं|
(अबू दाऊद)

फ़रिश्तो के काम और इबादत पर यकीन करना जैसे तमाम फ़रिश्तो को अल्लाह ने सिर्फ़ अपनी इबादत के लिये पैदा किया और हर फ़रिश्ता इस काम को बिना रुके, थके कर रहा हैं जैसे के

अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया : "आसमान और ज़मीन मे जो हैं वो इस अल्लाह का हैं और जो इसके पास हैं वह इसकी इबादत से न सरकशी करते हैं और न थकते हैं| रात दिन उसकी तस्बीह करते हैं कभी काहिली नही करते|
(सूरह अंबिया 21/,20)

फ़रिश्तो को देख पाना किसी इन्सान के बस की बात नही सिवाये नबियो को अल्लाह के हुक्म से जैसा के उपर हदीस गुज़री के नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम ने जिब्रील अलै0 को उनकी असल शक्ल मे देखा और उनके छ सौ पंख थे इसके अलावा जिब्रील अलै0 जब भी अल्लाह के हुक्म से अल्लाह का अहकाम लेकर नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम के पास आते तो इन्सानी शक्ल मे आते हैं जैसा के

अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया : "फ़िर हमने इस के पास अपनी रूह(जिब्रील अलै0) को भेजा| पस वो इसके सामने पूरा आदमी बन कर ज़ाहिर हुआ|
(सूरह मरियम 19/17)

इसके अलावा जिब्रील अलै0 जब भी अल्लाह का अहकाम नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम के पास लेकर आते तो इन्सान की ही शक्ल मे लेकर आते जैसा के कई हदीसो से साबित हैं|

3. रसूलो पर ईमान लाना

रसूल हर उस इन्सान को कहा जाता हैं जिसे कोई शरीयत अल्लाह की तरफ़ से दी जाती हैं और उसे उस शरीयत की (तब्लीग) प्रचार का हुक्म भी मिलता हैं| इसके उल्टे नबी हर उस इन्सान को कहते हैं जो पहले किसी और नबी की लाई हुई शरीयत को जारी रखता हैं या मुर्दा हो चुकी हुई शरीयत को ज़िन्दा करने के लिये भेजा जाता हैं|

अल्लाह ने हर कौम मे अपना रसूल भेजा जैसा के कुरान से साबित हैं| : " और ऐसी कोई उम्मत नही गुज़री जिसमे हमारा डराने वाला नबी न आया हो|
(सूरह फ़ातिर 35/24)

रसूल इन्सानो से कोई अलग नही होता बल्कि इन्सानो मे से ही होता हैं ताकि वो शरीयत को सबसे पहले अपने ऊपर अमल करके दिखाये और आम इन्सान उसे अपने लिये नामुमकिन न समझे| रसूल भी आम इन्सानो की तरह होता हैं और उसे भी हर तरह से दुख बीमारी परेशानी का सामना करना पड़ता हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना हैं किसी रसूल का इन्तेखाब अल्लाह के ज़रिये होता हैं इन्सानो के ज़रिये नही क्योकि रिसालत का इन्तेखाब अल्लाह का हक हैं न के इन्सानो का| रसूल इन्सानो मे सबसे बेहतर होता हैं और हर गुनाह से पाक होता हैं|

इन्सानो पर इस बात की पाबन्दी लाज़िम हैं के तमाम रसूलो पर जिसके बारे मे कुरान और हदीस से जानकारी मिलती हैं उस पर ईमान लाये| जिस किसी ने किसी रसूल का इन्कार किया उसका ईमान मुकम्मल नही अल्बत्ता नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के बाद से कयामत तक जो सिर्फ़ नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की लाई हुई शरियत की ही पाबन्दी हर इन्सान के लिये हैं लेकिन इस शरियत मे अल्लाह के तमाम रसूलो का इकरार लाज़िम हैं| लिहाज़ा किसी इन्सान ने अगर किसी रसूल को जानने के बाद भी उसका इन्कार किया तो वो मुसल्मान नही हो सकता| इन्सानो को जिन रसूलो के नाम मालूम हैं उन रसूलो के नाम के साथ उनकी रिसालत का यकीन करना लाज़िम हैं जिनका नाम नही मालूम उनके बारे मे बस इतना ही काफ़ी हैं के अल्लाह ने हर कौम मे अपना नबी भेजा हैं और कोई कौम बिना नबी के नही गुज़री| इसके साथ ही ये भी लाज़िम हैं के हर नबी ने सिर्फ़ अल्लाह ही की बात को लोगो तक पहुँचाया और उनकी ये खबर सच्ची हैं|

अल्लाह ने अपने आखरी रसूल जनाब मुहम्मद सल्लललाहो अलेहे वसल्लम को दुनिया मे भेज कर अपनी रिसालत के सिलसिले को खत्म कर दिया लिहाज़ा अब हर इन्सान के लिये ये लाज़िम हैं के वो मुहम्मद सल्लललाहो अलेहे वसल्लम और उनकी लाई हुई शरीयत यानि दीन ए इस्लाम को अपनाये क्योकि मुहम्मद सल्लललाहो अलेहे वसल्लम तमाम दुनिया के लिये नबी बना कर भेजे गये न के किसी एक मुल्क या बस्ती के लिये|

रसूल पर ईमान लाने का सबसे बड़ा फ़ायदा ये हैं के बन्दे को अल्लाह से कुरबत और उसकी रहमत और उसके डर का अहसास होता हैं साथ ही अल्लाह को किस तरह जानना हैं और पूजना हैं इसका इल्म होता हैं|

4. आखिरत पर ईमान लाना

आखिरत का दिन कयामत का दिन हैं जिस दिन दुनिया खत्म कर दी जायेगी और शुरु दुनिया से लेअक्र कयामत तक पैदा होने वाले तमाम लोग दुबारा ज़िन्दा करके उठाये जायेगे| उसे आखिरत का दिन इसलिये कहा जाता हैं के क्योकि सिर्फ़ उसी दिन हर इन्सान के दुनिया मे किये गये अमल का हिसाब होगा और उसके अमल के मुताबिक उसे जहन्नम या जन्नत मे रहने को दिया जायेगा| आखिरत के दिन पर ईमान लाने से मुराद इस बात से हैं के हर इन्सान जान ले के एक दिन उसे अल्लाह के सामने पेश होना हैं और उसके दुनिया मे किये गये अमल-दखल का हिसाब देना होगा| लिहाज़ा हर इन्सान ये जान ले के उसे उसके किये के मुताबिक ही बदला दिया जायेगा जहन्नम या जन्नत के तौर पर लिहाज़ा हर इन्सान को चाहिये के दुनिया मे रहते हुए अल्लाह के हुक्म पर चले ताकि उसे आखिरत मे अच्छा सिला मिले| आखिरत पर ईमान रखने के साथ तमाम इन्सान को इस बात पर भी गौर करना हैं जिसका बिना यकीन के आखिरत का ईमान मुकम्मल नही हो सकता|

दुबारा कब्र से उठाये जाने पर ईमान : "हर इन्सान जो कयामत होने से पहले दुनिया मे पैदा होगा उसे अल्लाह दुबारा ज़िन्दा करेगा| जब फ़रिश्ता सूर फ़ूकेगा और तब सारे लोग अल्लाह के सामने बिना कपड़ो के पेश होगे| सबसे पहले नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की कब्र फ़टेगी इसके बाद दूसरे लोगो कि|"

बदला और हिसाब पर ईमान : "हर इन्सान जो इस दुनिया मे भेजा गया उसका हर अमल जो दुनिया मे किया चाहे अच्छा या बुरा उसका हिसाब होगा और उसके अमाल के मुताबिक उसे जन्नत और जहन्नम मे जगह दी जायेगी| किसी पर भी ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म न होगा| इसके बाद जन्नती जन्नत मे जहन्नमी जहन्नम मे हमेशा हमेशा रहेगे फ़िर न किसी को मौत आयेगी न किसी को दुबारा दुनिया मे वापस आकर नेक काम करके अपनी आखिरत सवारने का मौका दिया जायेगा|"

जन्नत और जहन्नम पर ईमान लाना : "जन्नत और जहन्नम इन्सान का आखिरी ठिकाना हैं जिसे अल्लान ने अपने बन्दो के लिये तैयार किया हैं| जन्नत मोमिन और अल्लह से डरने वाले नेक बन्दो के लिये और जहन्नम काफ़िर और सरकश बन्दो के लिए जिन्होने अल्लाह के साथ शिर्क किया और हमेशा अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी करी| ये दोनो जगहे ऐसी हैं जिसे ना किसी इन्सान ने अभी तक देखा ना किसी इन्सान ने इसके बारे अभी तक अहसास किया| जन्नत मे लोग अपने दुनिया मे किये गये अमल के मुताबिक अलग-अलग दर्जो के हिसाब से जगह पायेगे|"

अकसर लोग ये गुमान करते हैं के वो दुबारा कैसे ज़िन्दा किये जायेगे| इस बारे मे कुरान एक खुली चुनौती देता हैं उन इन्कार करने वालो के लिये जो दुबारा जी उठने पर यकीन नही करते| कुरान मे अल्लाह ने अलग-अलग कई जगहो इन्सान के दुबारा जी उठने के बारे मे बताया हैं ताकि इन्सान इस बात पर गौर फ़िक्र करले के इन्सान को जिस तरह अल्लाह ने अभी पैदा किया ठीक उसी तरह दुबारा पैदा करना अल्लाह के लिये कोई मुश्किल काम नही|

5. आसमानी किताब(अल्लाह की किताब) पर ईमान लाना

किताबो पर लाने से मतलब वो किताबे हैं जिसे अल्लाह ने अपने रसूलो को दिया ताकि वो अल्लाह के बन्दो को एक कानून के तहत जोड़ सके और उस किताब मे लिखे अल्लाह के कानून पर अमल कर अपनी ज़िन्दगी को अल्लाह के बताये तरीके पर गुज़ार सके जिससे बन्दे कि दुनिया और आखिरत संवर सके|

किताबो को उतारने का मकसद सिर्फ़ ये के इन्सान को जब भी कोई परेशानी हो या किसे मसले का हल तलाशना हो तो वो सीधे अल्लाह की तरफ़ रुजू करे और अपने मसले को हल करे न के अपने आप से ही बिना सोचे समझे किसी मसले पर खुद का मालिक बन के फ़ैसला करे| हकीकतन मालिक सिर्फ़ एक हैं और वो हैं अल्लाह लिहाज़ा बन्दो के तमाम ज़िन्दगी के आने वालो मसले का हल सिर्फ़ अल्लाह की किताब मे हैं| किताबो पर ईमान लाने से मतलब ये भी हैं के जो किताबे अल्लाह ने अपने रसूलो को दी हैं उन्हे अल्लाह की ही बात समझा जाये क्योकि अल्लाह ने खुद किताब नही लिखी बल्कि अपने रसूल को दी जिसके ज़रिये अल्लाह की बात एक से दूसरे इन्सान तक पहुची| इसलिये किताबो पर बिना चू-चरा के इस बात पर यकीन करना ईमान का हिस्सा हैं|

जिस तरह अल्लाह ने मुहमम्द सल्लललाहो अलेहे वसल्लम को कुरान मजीद दी उसी तरह पिछली कौमो मे भी अपने रसूल के ज़रिये किताबे(शरियत या कानून) भेजी जैसे ईसा अलै0 को इंजील, मूसा अलै0 को तौरेत और दाऊद अलै0 को ज़बूर दी| आज ये किताबे अपनी असल हालत मे मौजूद नही और न ही इन किताबो की शरियत पर अमल करना हैं लेकिन फ़िर भी मुसलमान के लिये ये लाज़िम हैं बल्कि ईमान क एक हिस्सा हैं के इन किताबो पर ईमान लाये के ये अल्लाह की ही किताब हैं| इसके अलावा पिछली किताबे जैसे इंजील, तौरेत और ज़बूर इस बात की शहादत देती हैं के कुरान अल्लाह की आखिरी किताब हैं जो के मुहम्मद सल्लललाहो अलेहे वसल्लम पर उतारी गयी और यही आखिरी शरियत हैं जिसे अल्लाह ने कयामत तक के लिये बाकि छोड़ा लिहाज़ा हर इन्सान चाहे वो किसी मुल्क का हो या किसी कौम का सबके लिये लाज़िम हैं के वो कुरान पर ईमान लाये और मुसलमान हो जाये|

पिछ्ली शरियत मे अल्लाह की किताबे आज अपनी असल हालत मे मौजूद नही न ही अब वो शरियत मक्बूल हैं इसमे सबसे अहम बात ये हैं के पिछ्ली किताबे किसी को याद नही लेकिन कुरान की खासियत ये हैं के अल्लाह ने इसे इतना आसान कर दिया के 1400 सालो से आज तक लातादाद ऐसे लोग गुज़रे जिन्होने कुरान को याद(हिफ़्ज़) किया उसके अलावा खुद अल्लाह ने कुरान की ज़िम्मेदारी ली के इसे कयामत तक कोई नही बदल पायेगा बल्कि कुरान खुद इस बात का खुला चैलेन्ज करती हैं| 1400 सालो से आज तक कुरान वैसा ही मौजूद हैं जैसा अल्लाह ने इसे नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम पर उतारा था|

6. अच्छी बुरी तकदीर पर ईमान लाना

तकदीर पर ईमान लाने से मतलब ये के जो कुछ ह चुका या जो कुछ हो रहा हैं या जो कुछ होगा सब अल्लाह के इल्म मे हैं| अल्लाह ने हर इन्सान की तकदीर उसके पैदा होने से पहले लिख दी| क्योकि अल्लाह को हर चीज़ का इल्म हैं और कोई चीज़ उसके इल्म से बाहर नही| न कोई चीज़ उसकी मर्ज़ी के बिना हो सकती हैं न कोई अल्लाह की मर्ज़ी के बिना कुछ कर सकता हैं|

तकदीर पर ईमान लाना इन्सान को कल्बी सुकून व आराम देता हैं और न मिलने वाली चीज़े या न हो पाने वाले काम पर वो सब्र करता हैं और ये कहता हैं कि ये उसके रब की मर्ज़ी थी जबकि तकदीर पर ईमान न ला पाने के सबब इन्सान दुखी और परेशान रहता और और न मिलने वाली चीज़ो पर सब्र नही कर पाता| तकदीर पर ईमान लाना इन्सान के अन्दर बहादुरी और सब्र की ताकत पैदा करता हैं और बन्दा अपने आप को अपने रब यानि अल्लाह के हवाले कर देता हैं| तकदीर पर ईमान न लाने की ज़िन्दा मिसाल इन्सान का खुदकुशी करना हैं जो पशचमी देशो मे बहुत ज़्यादा हैं जहा गैर मुस्लिम कसरत से खुदकुशी करते हैं और इसका आकड़ा पूर्वी मुस्लिम देशो से बहुत ज़्यादा हैं|

Posted by : ISLAM THE TRUTH