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بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
इस्लाम क्या है?

इस्लाम अरबी ज़ुबान का लफ़्ज़ है| इस लफ़्ज़ को खोलने (सन्धि विच्छेद) पर इसका लफ़्ज़ "स ल म" जिसके माने अमन, पाकिज़गी, अपने आप को हवाले करना है| मज़हब के लिहाज़ से इस्लाम का मतलब अपने आप को पूरी तौर पर अल्लाह के हवाले कर देना है|

अल्लाह लफ़्ज़ भी अरबी ज़ुबान का ही लफ़्ज़ है जिसके माने "खुदा" या "भगवान" या "रब"के है| जिसके मतलब- एक और अकेला खुदा जिसने पुरी कायनात को बनाया, वो बडा रह्म करने वाला और रहीम(दयालु) है|

इस्लाम कोई नया दीन नही बल्कि ये तब से है जब अल्लाह ने इस दुनिया मै सबसे पहले इन्सान आदम अं (जो इस दुनिया मे अल्लाह के सब से पहले नबी थे) उन को भेजा| आदम अं के बाद जितने भी नबी या रसूल आये सबने सिर्फ़ इस्लाम की ही दावत या तालीम दी| दर हक़ीक़त इस्लाम किसी एक इन्सान या कौम या शहर या देश के लिये नही बल्कि तमाम दुनिया मे रहने वाले इन्सानो का दीन है जो इन्सान अपने आप को अल्लाह के सुपुर्द कर दे|

अमन व सलामती इस्लाम का एक बुनयादी तसव्वुर हैं जो के इस्लाम से गहरा ताल्लुक रखता हैं| इस्लाम का पूरा निज़ाम ए हयात, कानून, इस के अह्काम, इसके रस्म सब के सब इसकी तस्वीर अमन के साथ जोड्ते हैं| इस्लाम इस अज़ीम कायनात मे अज़ीम वहदत का दीन हैं| जिसका पहला कदम तौहीद ए इलाही से शुरु होता हैं| यानि इस ज़ात से जिससे ज़िन्दगी का सदूर होता हैं और इसी की तरफ़ रुजु होगा|

रब्बुल आलामीन का इर्शाद हैं :(ऐ मेरे नबी) आप कह दिजिए के वो अल्लाह एक हैं, अल्लाह बेनियाज़ हैं, इसने किसी को पैदा नही किया और ना वो किसी से पैदा किया गया हैं, और न उसका कोई शरीक हैं|
(सूरह इख्लास)

सब की ज़रुरते वही पूरी करने वाला हैं| इस के दर के सिवा कोई दर नही सब इसी के मोहताज हैं वो किसी का मोहताज नही क्योकि वो अपनी सिफ़ात मे मुकम्मल हैं| इसके इल्म मे हर चीज़ हैं| इसकी रहमत इसके गज़ब से ज़्यादा हैं| इसकी रहमत हर किसी के लिये आम हैं| इसी तरह वो अपनी इस सिफ़ात मे भी मुकम्मल हैं| उसमे कोई ऐब नही न कोई उस जैसा हैं| इसलिये सिर्फ़ वो ही इबादत के लायक हैं उसके सिवा कोई नही| इन्ही सिफ़ात के तहत वो कायनात मे इबादत के तमाम इख्तलाफ़ात को यही खत्म कर देता हैं|

अल्लाह सुब्हानो तालाह फरमाता हैं :अगर आसमान व ज़मीन मे अल्लाह के सिवा कई खुदा होते तो दोनो तबाह हो जाते|
(सूरह अम्बिया-22)

एक और जगह अल्लाह ने क़ुरान मे फ़र्माया :अल्लाह ने अपनी कोई औलाद नही पैदा करी और न ही इसके साथ कोई दूसरा माबूद हैं, वरना हर माबूद अपनी मख्लूक को लेकर अलग हो जाता और इन मे हर एक दूसरे पर चढ बैठता|
(सूरह अल मोमिनून-91)

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