Saturday, October 31, 2015

इस्लाम मे तलाक का सही तरीका


तलाक और इस्लाम
यूं तो तलाक़ कोई अच्छी चीज़ नहीं है और सभी लोग इसको ना पसंद करते हैं इस्लाम में भी यह एक बुरी बात समझी जाती है लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि तलाक़ का हक ही इंसानों से छीन लिया जाए, पति पत्नी में अगर किसी तरह भी निबाह नहीं हो पा रहा है तो अपनी ज़िदगी जहन्नम बनाने से बहतर है कि वो अलग हो कर अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अपनी मर्ज़ी से पूरा करें जो कि इंसान होने के नाते उनका हक है,

इसी लिए दुनियां भर के कानून में तलाक़ की गुंजाइश मौजूद है. और इसी लिए पैगम्बरों के दीन (धर्म) में भी तलाक़ की गुंजाइश हमेशा से रही है, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब जाहिलियत के दौर में भी तलाक़ से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक़ का कानून उनके यहाँ भी लगभग वही था जो अब इस्लाम में है लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थी. किसी जोड़े में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बन्ध गई है उसे मुमकिन हद तक टूटने से बचाया जाए, जब किसी पति पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे तो अल्लाह ने कुरआन में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायत दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें इसका तरीका कुरआन ने यह बतलाया है कि एक फैसला करने वाला शोहर के खानदान में से मुकर्रर करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों जज मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें, इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए.

अल्लाह ने कुरआन में इसे कुछ यूं बयान किया है :
और अगर तुम्हे शोहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शोहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है | (कुरआन सूरह अन- निसा 35).

इसके बावजूद भी अगर शोहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है तो शोहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इन्तिज़ार करे, और खास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानि शोहर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि "मैं तुम्हे तलाक देता हूँ" तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हज़ार तलाक बोल देते हैं यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है | अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है वो इस्लामी शर्यत और कुरआन की मज़ाक उड़ा रहा होता है.

इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानि 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने) तक शोहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शोहर ही के जुम्मे रहेगा लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरआन ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरआन ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शोहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं.

अक्ल की रौशनी ने अगर इस हुक्म पर गोर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है, हर मआशरे में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं, अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी माँ के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शोहर ही के घर गुज़ारे.

फिर अगर शोहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए तो फिरसे वो दोनों बिना कुछ किये शोहर और बीवी की हेस्यत से रह सकते हैं इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी उनको खबर करदें कि हम ने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ''रुजू'' करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है इससे ज्यादा नहीं.

अल्लाह कुरआन में फरमाता है :
"यह तलाक जिसमें पति अपनी बीवी की इद्दत के समय में "रुजू" कर सकते हैं] दो बार ही इजाज़त दी है।" (कुरआन सूरह बक्राह,-229)

शोहर रुजू ना करे तो इद्दत के पूरा होने पर शोहर बीवी का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, लिहाज़ा कुरआन ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है तो शोहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या रुखसत करना है, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए, सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है तो यह रोकना वीबी को परेशान करने के लिए हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सिर्फ भलाई के लिए ही रोका जाए.

अल्लाह कुरआन में फरमाता है :
और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुँच जाएँ तो या तो उन्हें भले तरीक़े से रोकलो या भले तरीक़े से रुखसत करदो, और उन्हें नुक्सान पहुँचाने के इरादे से ना रोको के उनपर ज़ुल्म करो, और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा वो दर हकीकत अपने ही ऊपर ज़ुल्म ढाएगा, और अल्लाह की आयातों को मज़ाक ना बनाओ और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है, और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज़ से वाकिफ है | (कुरआन सूरह अल बक्राह-231)

लेकिन अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उनका रिश्ता ख़त्म हो जाएगा, अब उन्हें जुदा होना है.

इस मौके पर कुरआन ने कम से कम दो जगह
(सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत ज़ोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रूपये या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी उसका वापस लेना शोहर के लिए बिल्कुल जायज़ नहीं है वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शोहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना बिल्कुल जायज़ नहीं है|

नोट: अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी जबकि शोहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था तो महर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शोहर के लिए जायज़ है|

अब इसके बाद बीवी आज़ाद है वो चाहे जहाँ जाए और जिससे चाहे शादी करे, अब पहले शोहर का उस पर कोई हक बाकि नहीं रहा. इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी ज़िन्दगी में दोबारा शादी करना चाहें तो वो कर सकते हैं इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिरसे निकाह करना होगा और शोहर को महर देने होंगे और बीवी को महर लेने होंगे। अब फ़र्ज़ (assume) करें कि दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और उनमे फिरसे तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो मैंने ऊपर लिखा है, अब फ़र्ज़ (assume) करें कि दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें तो शरयत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाज़त है। लेकिन अब अगर उनको तलाक हुई तो यह तीसरी तलाक होगी जिस के बाद ना तो रुजू कर सकते हैं और ना ही आपस में निकाह किया जा सकता है।

अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी आज़ाद मर्ज़ी से वो औरत किसी दुसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शोहर भी उसे तलाक देदे या मर जाए तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है, इसी को कानून में "हलाला" कहते हैं|

लेकिन याद रहे यह इत्तिफ़ाक से हो तो जायज़ है जान बूझ कर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इस लिए तलाक लेना ताकि पहले शोहर से निकाह जायज़ हो सके यह साजिश सरासर नाजायज़ है और अल्लाह के रसूल (स) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।

अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शोहर से तलाक मांगना होगी, अगर शोहर नेक इंसान होगा तो ज़ाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शोहर मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शोहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे, इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान करदे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे ''खुला'' कहा जाता है.

यही तलाक का सही तरीका है लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे यहाँ इस तरीके की खिलाफ वर्जी भी होती है और कुछ लोग बिना सोचे समझे इस्लाम के खिलाफ तरीके से तलाक देते हैं जिससे खुद भी परेशानी उठाते हैं और इस्लाम की भी बदनामी होती है.

Posted by : मुशर्रफ अहमद

Friday, October 30, 2015

9 और 10 मुहर्रम का रोज़ा


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
✦ इब्न अब्बास रदी अल्लाहू अन्हु से रिवायत है की रसूल-अल्लाह सलअल्लाहू अलैही वसल्लम जब मदीना में तशरीफ़ लाए तो आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने यहूदियो को देखा की वो आशूरा के दिन (10 मुहर्रम) का रोज़ा रखते हैं, आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने उनसे इसका सबब पूछा तो उन्होने कहा की ये एक अच्छा दिन है इस दिन अल्लाह सुबहानहु ने बनी इसराईल को उनके दुश्मन ( फिरओन ) से निजात दिलवाई थी इसलिए मूसा अलैही सलाम ने उस दिन का रोज़ा रखा था तो आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने फरमाया मूसा अलैही सलाम पर तुमसे ज़्यादा हक़ हमारा है, फिर आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने भी उस दिन रोज़ा रखा और सहाबा रदी अल्लाहू अन्हुमा को भी इसका हुक्म दिया
सही बुखारी, जिल्द 3, 2004

✦ अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदी अल्लाहू अन्हु से रिवायत है की जब रोज़ा रखा रसूल-अल्लाह सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने आशुरे के दिन (10 मुहर्रम) का और हुक़म किया इस रोज़ का, तो लोगो ने अर्ज़ की या रसूल-अल्लाह सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ये दिन तो ऐसा है की इसकी ताज़ीम यहूद और नसारा करते हैं,तो आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने फरमाया की जब अगला साल आएगा तो इंशा-अल्लाह हम 9 का रोज़ा रखेगे,आख़िर अगला साल ना आने पाया की आप सलअल्लाहू अलैही वसल्लम दुनिया से वफात पा गये (इसलिए हम मुसलमान 9 मुहर्रम और 10 मुहर्रम दोनों का रोज़ा रखते हैं)
सही मुस्लिम, जिल्द 3, 2666

BLACK SEED-THE REMEDY FOR EVERYTHING BUT DEATH

Black Seed :'The Remedy For Everything But Death'
The Black Seed is scientifically known as Nigella Sativa, the herd grows about 16-24 inches in height. From it comes a small rectangular Black Seed which is also known as the Blessed Seed (Arab: Habbat ul Baraka,or Habbat ul Sauda).

The ancient Egyptians knew and used the Black Seed and described it as a panacea (cure for problems/disease). The Romans also knew this seed and called it Greek Coriander. Documented by the Greek physician of the 1st century, Dioscoredes, as an ailment for general health problems such as toothaches, headaches and was mainly used as a dietary supplement.

In English-speaking countries with large immigrant populations, it is also variously known as kalonji in Hindi/Urdu कलौंजी kalauṃjī or كلونجى/कलोंजी kaloṃjī) or mangrail (Hindi मंगरैल maṃgarail), ketzakh (Hebrew קצח), chernushka (Russian), çörek otu (Turkish), habbat al-barakah (Arabic حبه البركة ḥabbat al-barakah, seed of blessing), siyah daneh (Persian سیاه‌دانه siyâh dâne), karim jeerakam in Malayalam.

A Prophetic Medicine as recommended 1400 years ago by the Prophet Muhammad (peace be upon him).

The Prophet (ﷺ) said : "Use the Black Seed for indeed, it is a cure for all diseases except death."
(Sahih Bukhari - 7:591)

Aisha (ra) said that : She heard the Messenger (ﷺ) say : "This black seed is a cure for every disease except death."
[Sahih Bukhari - 5687]

Khalid bin Sa'd (ra) said :"We went out and with us was Ghalib bin Abjar (ra). He fell sick along the way and when we came to al-Madinah, he was sick. Ibn Abu 'Atiq (ra) came to visit him and said to us, 'You should use this black seed. Take five or seven (seeds) and grind them then apply them to his nostrils with drops of olive oil on this side and on this side for Aisha (ra) narrated to them that she heard the Messenger (saw) say, "This black seed is a cure for every disease except death."
[Sahih Sunan Ibn Majah - 3449]

Ibn Qaiyum (may Allah have mercy upon him) said :"It has immense benefits and his statement that it is a cure for every disease except death is like the statement of Allah."

What does the hadith "In it is a cure for everything except death" mean?

There are a number of hadith pertaining to Black Seed and Hijama etc that state: "In it is a cure for everything except death." So why do these remedies not cure cancer, diabetes and all the illnesses in the world?

This is a common question for most people but what we should know is that if something does not seem right in the Quran and Sunnah, it's not the Quran or Sunnah but usually our understanding of it. I would remind our readers to be careful when things are translated from Arabic to another language, in this case English and always try to return to the original Arabic to resolve any issues. In regards to these hadith the Prophet (saw) did not say "Al Shifa" rather the Arabic word 'Shifa' (cure) came without the definite article which means that it is an indefinite word that covers most cures. This means that the Black Seed contains a benefit thatcontributes to the cure of every disease. However some people may misunderstand the translation and end up confusing themselves as well as others. From a medical point of view, these remedies contribute to the total cure - and not that they are the total cure themselves alone. For example Black Seed strengthens the immune system and so if the immune system is strengthened so will your bodies resilience against disease. Similarly, Hijama removes chemical impurities from the body and if this is done on a regular basis as recommended in the Sunnah, then it greatly reduces the likelihood of diseases gaining a permanent hold in your body. So the correct understanding of the hadith is that these remedies contain a benefit that contribute to the cure (shifa) of every disease.

Black Seed
Research has found that there is not another herb known to work with such a wide range of healing capabilities. Nigella Sativa are known by many names for example, Black Seed or Black Cumin. Habbat ul barakah in Arabic countries (the Blessed Seed) due to the saying of the Holy Prophet (saw) and habbat as-sawda. It is referred to as Schwarzkummel in Germany and Corek Otu in Turkey. It is often named Black Onion Seed because of its similarity to onion seed in appearance but they share no relation to each other.

Warning Regarding Black Seed Oil
Dear reader please note the hadith makes no mention of the word oil. The Prophet (saw) never used black seed oil! This is an important distinction as many people today are selling the oil and quoting the hadith as if it refers to the oil, which is causing confusion amongst people. In the hadith the Prophet (saw) specifies a dose of 7 seeds in each nostril for infection gives us an indication of the dose and the fact it is the seeds and not the oil. We are trying to emphasise the hadith and its meaning.

Isn't the oil is just the same as the seeds as it contains the same active ingredients?
On the face of it this may sound like a good argument but apart from going against the hadith it is also a scientifically flawed argument. No one would compare eating olives to consuming olive oil, or the derivative of a product to the whole product. The fact that the product is derived should be enough for a person to understand something is missing. To make it even simpler to understand how about comparing eating whole coconut to coconut oil or even whole fish to fish oil.

So is Black Seed oil useless?
We would advise that on balance, there have been medical studies done using the oil and some of those studies have indicated some benefits. So if one wants to use the oil form then they should follow the guidance from those studies as they have knowledge regarding the correct dosage for the conditions treated with the oil and can provide the statistics for the level of success. However the oil tends to be a very strong product and anyone who has tasted it can attest that it has a sharp and bitter taste. And for many people the oil causes stomach upsets etc, so we advise it should not be consumed on a long term basis without a compelling medical basis for doing so.

Black Seed Medical benefits For thousands of years, people around the world have recognized the tremendous healing properties of this Legendary Herb: "Nigella Sativa or Black Seed."

Another profound discovery is that the ingredients (Polyunsaturated Fatty Acids) of the oil lead to increased production of the messenger substance Prostaglandin E1, a hormone-like substance, that functions as a general regulator on several body functions such as:
  1. Brain function
  2. Nerve function
  3. Lowering blood pressure
  4. Activation of the immune system.
Rich in Nutritional Values.
Monosaccharides (Single Molecule Sugars) in the form of Glucose, Rhamnose, Xylose, and Arabinose are found in the Black Seed. The Black Seed contains a non-starch Polysaccharide component which is a useful source of dietary fiber. It is rich in fatty acids, particularly the unsaturated and essential fatty acids (Linoleic and Linoleic Acid). Essential fatty acids cannot be manufactured by the body alone, and therefore we acquire these from food.

Fifteen amino acids make up the protein content of the Black Seed, including eight of the nine essential amino acids. Essential amino acids cannot be synthesized within our body in sufficient quantities and are thus required from our diet.

Black Seed contains Arginine which is essential for infant growth.
Chemical analysis has further revealed that the Black Seed contains Carotene, which is converted by the liver into Vitamin A, the Vitamin known for its Anti-Cancer activity.

The Black Seed is also a source of Calcium, Iron, Sodium, and Potassium. Required only in small amounts by the body, these elements' main function is to act as essential co-factors in various enzyme functions.

Immune System Strengthening.
Studies begun just over a decade ago suggest that if used on an ongoing basis, Black Seed can play an important role to enhance human immunity, particularly in immunocompromise patients.

In 1986, Drs. El-Kadi and Kandil conducted a study with human volunteers to test the efficiency of Black Seed as a natural immune enhancer. The first group of volunteers received Black Seed capsules (1 gram twice daily) for four weeks and the second group were given a placebo. A complete lymphocyte count carried out in all volunteers before and four weeks after administration of Black Seed and the placebo revealed that the majority of subjects who took Black Seed displayed a 72% increase in helper to suppresser T-cells ratio, as well as an increase in natural killer cell functional activity. The control group who received the placebo experienced a net decline in ratio of 7%. They reported, "These findings may be of great practical significance since a natural immune enhancer like the Black Seed could play an important role in the treatment of Cancer, AIDS, and other disease conditions associated with Immune Deficiency states."

These results were confirmed by a study published in the Saudi Pharmaceutical Journal in 1993 by Dr. Basil Ali and his colleagues from the College of Medicine at Kin Faisal University.

In the field of AIDS research specifically, tests carried out by Dr. Haq on human volunteers at the Department of Biological and Medical Research Center in Riyadh, Saudi Arabia (1997) showed that Black Seed enhanced the ratio between helper T-cells and suppresser T-cells by 55% with a 30% average enhancement of the natural killer (NK) cell activity.

Anti-Histamine Activity.
Histamine is a substance released by bodily tissues, sometimes creating allergic reactions and is associated with conditions such as Bronchial Asthma.

In 1960, scientists Badr-El-Din and Mahfouz found that dimer dithymoquinone isolated from Black Seed's volatile oil, under the name of "Nigellone," and given by mouth to some patients suffering from Bronchial Asthma, suppressed the symptoms of the condition in the majority of patients.

Following the results of this early study, Crystalline Nigellone was administered to children and adults in the treatment of Bronchial Asthma with effective results and no sign of toxicity. It was observed, however, that although effective, Crystalline Nigellone displayed a delayed reaction.

In 1993, Nirmal Chakravarty, M.D., conducted a study to see if this delay could be attributed to the possibility of Crystalline Nigellone being an inhibitory agent on Histamine.

His hypothesis proved correct. Dr. Chakravarty's study found that the actual mechanism behind the suppressive effect of Crystalline Nigellone on Histamine is that Crystalline Nigellone inhibits Protein Kinase C, a substance known to trigger the release of Histamine. In addition, his study showed that Crystalline Nigellone decreased the uptake of Calcium in mast cells, which also inhibits Histamine release.

The importance of these results are that people who suffer from Bronchial Asthma and other Allergic Diseases may benefit from taking Crystalline Nigellone.

Anti-Tumor Principles.
A study of Black Seed's potential anti-tumor principles by the Amala Research Center in Amala Nagar, Kerala (India) in 1991 lent further impetus to Dr. Chakravarty's suggestion for the possible use of Black Seed in the treatment of Cancer.

Using an active principle of fatty acids derived from Black Seed, studies with Swiss Albino Mice showed that this active principle could completely inhibit the development of a common type of cancer cells called Ehrlich ascites carcinoma (EAC). A second common type of cancer cells, Dalton's lymphoma ascites (DLA) cells were also used. Mice which had received the EAC cells and Black Seed remained normal without any tumor formation, illustrating that the active principle was 100% effective in preventing EAC tumor development.

Results in mice who received DLA cells and Black Seed showed that the active principle had inhibited tumor development by 50% less compared to mice not given the active principle.

The study concluded, "It is evident that the active principle isolated from Nigella Sativa Seeds is a potent anti-tumor agent, and the constituent long chain fatty acid may be the main active component."

Anti-Bacterial.
In 1989, a report appeared in the Pakistan Journal of Pharmacy about Anti-Fungal Properties of the volatile oil of Black Seed. 1992 saw researchers at the Department of Pharmacy, University of Dhaka, Bangladesh, conducting a study in which the antibacterial activity of the volatile oil of Black Seed was compared with five antibiotics: Ampicillin, Tetracycline, Cotrimoxazole, Gentamicin, and Nalidixic Acid.

The Black Seed Oil proved to be more effective against many strains of bacteria, including those known to be highly resistant to drugs: V.Cholera, E. Coli (a common infectious agent found in undercooked meats), and all strains of Shigella spp., except Shigella Dysentriae. Most strains of Shigella have been shown to rapidly become resistant to commonly used antibiotics and chemotheraputic agents.

In light of the above research findings, it is of interest that homeopaths have long been known to make a tincture from the Black Seed for digestive and bowel complaints. Traditionally, the Black Seed is still used to help relieve vomiting and diarrhea, as well as flatulent colic, and to help counteract the griping action of purgatives (e.g. certain laxatives, fruits such as apricots when over consumed).Anti-Inflammatory

As early as 1960, Professor El-Dakhakny reported that Black Seed Oil has an anti-inflammatory effect and that it could be useful for relieving the effects of Arthritis.

In 1995, a group of scientists at the Pharmacology Research Laboratories, Department of Pharmacy, Kings College, Lond, decided to test the effectiveness of the fixed Oil of Nigella Sativa and its derivative, thymoquinine, as an anti-inflammatory agent. Their study found that the oil inhibited eicosanoid generation and demonstrated anti-oxidant activity in cells.

The inhibition of Eicasanoid generation, however, was higher than could be expected from Thymoquinone alone. Their study suggested that other compounds within the oil might also be responsible for the enhanced anti-inflammatory reactions in cells. The scientists speculated that the unusual C20:2 unsaturated fatty acids contained in Black Seed were possibly responsible for boosting the oil's effectiveness.

In 1997, studies conducted at the Microbiological Unit of the Research Center, College of Pharmacy, King Saud University, Riyadh, Saudi Arabia, found that externally in an ointment form, the anti-inflammatory activity of the Black Seed was found to be in the same range as that of other similar commercial products. The tests also demonstrated that the Black Seed is non-allergenic. Promotes Lactation

A study by Agarwhal (1979) showed that Black Seed Oil increases the milk output of breastfeeding mothers. A literature search by the University of Potchefstroom (1989), including biological abstracts, revealed that Black Seed's capacity to increase the milk flow of nursing mothers could be attributed to a combination of lipid portion and hormonal structures found in the Black Seed.

Black Seed - Summary of Actions:

Analgesic: Relieves or dampens sensation of pain.
Anthelmintic: (Also know as vermicide or vermifuge) destroys and expels intestinal worms.
Anti-bacterial: Destroys or inhibits the growth of destructive bacteria.
Anti-Inflammatory: Reduces inflammation.
Anti-Microbial: Destroys or inhibits the growth of destructive microorganisms.
Antioxidant: Prevents or delays the damaging oxidisation of the body's cells - particularly useful against free radicals.
Anti-Pyretic: (Also known as ferbrifuge) - exhibits a 'cooling action', useful in fever reduction.
Anti-spasmodic: Prevents or eases muscle spasms and cramps.
Anti-tumour: Counteracts or prevents the formation of malignant tumours*
Carminative: Stimulates digestion and induces the expulsion of gas from the stomach and the intestines.
Diaphoretic: Induces perspiration during fever to cool and stimulate the release of toxins.
Diuretic: Stimulates urination to relieve bloating and rid the body of any excess water.
Digestive: Stimulates bile and aids in the digestive process.
Emmenagogue: Stimulates menstrual flow and activity.
Galactogogue: Stimulates the action of milk in new mothers.
Hypotensive: Reduces excess blood pressure.
Immunomodulator: Suppresses or strengthens immune system activity as needed for optimum balance.
Laxative: Causes looseness or relaxation of the bowels.

KALONJI MOUT KE ALAWA HAR BIMARI KI SHIFA

KALONJI mein MAUT k alawa har bimari ki shifa hai HAZRAT ABU HURAIRA RADIYALLAHU ANHU bayan karte hain Ke
Nabi ( ﷺ ) se ye suna ki KALONJI mein MAUT k alawa har bimari ki shifa hai. ( Sahih Muslim, Jild 03, Kitab: Tibbi, Page 176, Baab 29, Hadith No. 5728-29 )
Aisha (ra) ne kaha ke
Aapne Nabi ( ﷺ ) se ye suna ki KALONJI mein MAUT k alawa har bimari ki shifa hai. ( Sahih Bukhari - 5687 )
Khalid bin Sa'd (ra) ne Kaha ke
Aisha (ra) bayan karti hai ke aapne Nabi ( ﷺ ) se suna ki KALONJI mein MAUT k alawa har bimari ki shifa hai. ( Sahih Sunan Ibn Majah - 3449 )
Kalonji k Fawayed: Kalonji ko jala kar khana Bawasir ko door karta hai.
Kalonji khane se pet k kide mar jate hain.
Kalonji ko pani mein josh de kar gharary karne se daanto ka dard door hota hai.
Peshab na aane ki surat mein Kalonji khane se peshab khul kar aata hai.
Kalonji Haiz ki rukawat ko door karti hai.
Ghar mein Kalonji ki dhuni se Khatmal aur Machcharo ka khatma hota hai.
Kalonji Shahed k saath khane se Pathri nikal jati hai. The Prophet (ﷺ) said :
Use the Black Seed for indeed, it is a cure for all diseases except death." ( Sahih Bukhari - 7:591 )
Aisha (ra) said that :
She heard the Messenger (ﷺ) say : "This black seed is a cure for every disease except death." ( Sahih Bukhari - 5687 )
Khalid bin Sa'd (ra) said :
We went out and with us was Ghalib bin Abjar (ra). He fell sick along the way and when we came to al-Madinah, he was sick. Ibn Abu 'Atiq (ra) came to visit him and said to us, 'You should use this black seed. Take five or seven (seeds) and grind them then apply them to his nostrils with drops of olive oil on this side and on this side for Aisha (ra) narrated to them that she heard the Messenger (saw) say, "This black seed is a cure for every disease except death." ( Sahih Sunan Ibn Majah - 3449 )
Ibn Qaiyum (may Allah have mercy upon him) said :"It has immense benefits and his statement that it is a cure for every disease except death is like the statement of Allah."

Hazrat Abu Hurairah (radiyallâhu ‘anhu) States- “ I have heard from Rasoollallah ﷺ that there is cure for every disease in black seeds except death and black seeds are shooneez.

KALONJI MEANS = black cumin seed (Nigella sativa seed) Studies have shown that kalonji oil is an effective anti-oxidant, anti-bacterial, and anti-inflammatory remedy. As a result, it is often used to fight infections and strengthen the immune system. It contains over 100 valuable nutrients. It is comprised of approximately 21% protein, 38% carbohydrates, and 35% plant fats and oils. Kalonji oil provides a rich supply of polyunsaturated fatty acids. These ingredients play a key role in daily health and wellness. Kalonji oil has over 1400 years history of use. Many ancient books and text suggest the following traditional uses for kalonji oil.

1 - Asthma Attack. To treat the asthma attack mix 10 drops of kalonji oil and one tea spoon honey in one glass warm water. Drink it as morning drink and once after dinner. Forty days treatment gives a positive result..

2- Bleeding of Nose. Bleeding of nose is a common problem among kids especially in hot days of summer. For its treatment burn a clean white paper. To the ashes add twenty two drops of kalonji oil and apply inside the nose..

3- Burns. To treat the burns combine 5 gm kalonji oil, 30 gm olive oil, 15 grams of Calamus (BUCH) and 80 grams of Mehendi leaves. Application on burns and feel soothing.

4- Chest Irritation and Stomach Trouble. Follow a three days treatment to control chest irritation and stomach trouble. Make a mixture by adding half tea spoon kalonji oil in a cup of warm milk. Drink it two times in a day.

5- Cough and Congestion. Take some kalonji oil, add desi Ghee and little salt and rub it on throat and chest once a day. Taking ½ teaspoon of kalonji oil daily in the morning is also beneficial..

6- Constipation. Mix ten drops of black kalonji oil with one teaspoon castor oil in mild warm milk and drink.. 7- Dandruff. Mix 10 gms of kalonji oil, 30 gms of olive oil, 30 gms of mehindi powder. Heat for a while and apply paste on scalps when becomes cool, rinse well with shampoo after one hour..

8- Diabetic. Take one cup of black tea with one tea spoon kalonji oil in it. Take it twice a day, in the morning and before going to bed. Continue taking it for least forty days. After that take some sweet to check the sugar level. If it is on normal level, stop taking black tea. .

9- Ear Infection. Mix equal amount of kalonji oil and pure olive oil, mild warm it and put a few drops in ear..

10- Fever Treatment. For the treatment of simple fever. In a half cup of water add half lemon juice and half tea spoon of kalonji oil; mix well and use it twice a day. Treatment may continue until you get relief from fever..

11- Fresh Face. For the freshness of your face use this remedy. Mix up three table spoons of honey, half table spoon kalonji oil and half tea spoon olive oil. Apply this mixture on your face twice a day in the morning and before sleep. Continue treatment at least forty days..

12- Hair Loss and Premature Greying. Scrub the scalp thoroughly with lemon; leave it for fifteen minutes and shampoo. After getting dried apply kalonji oil to whole scalp, continue for six weeks..

13- Headache. Headache is one of the major diseases of present era. To get rid from it, at the time of headache message kalonji oil on the forehead and near ears. If you should not feel easy then also drink half tea spoon kalonji oil twice a day..

14- Heart Attack. To lower down the risk of heart attack use this effective treatment. Mix half tea spoon of kalonji oil in one cup of goat milk and use it twice a day. This will liquefy the fats and widen the veins and arteries. Avoid fatty foods. Continue drinking for ten days and after that take it once a day..

15- Joint Pain. Swelling on ankle and other pains in the joints are terrible to face. Make an effective remedy by mixing one tea spoon vinegar, two tea spoons of honey and add half tea spoon of kalonji oil. Use this mixture two times a day before breakfast and after dinner and also massage with same oils. Avoid gas producing elements for 21 days..

16- Memory Power. Weak memory power and forgetfulness is a great issue in many people. To strengthen memory power boil 10 gm mint leaves in half cup water. Strain and mix half tea spoon kalonji oil and take it twice a day. Continue treatment for twenty days..

17- Migraine. Add one drop of kalonji oil in the opposite nasal area of the headache. Head massage with black kalonji oil and drink ten drops of kalonji oil once a day to relief from migraine..

18- Obesity. Take half tea spoon of kalonji oil, two tea spoons of honey mixed in lukewarm water and take twice a day. It will help to overcome your obesity. You also need to avoid from fried foods and bakery items.

19- Perfect Sleep. For a perfect good night sleep, right after dinner take half tea spoon kalonji oil with one tea spoon honey and enjoy a sound sleep. .

20- Piles and Madness. Take half teaspoon of kalonji oil mixed with one cup black tea, take twice a day before breakfast and after dinner. Avoid hot and spicy items..

21- Pimples and Acne. Take one cup sweet lime juice or pineapple juice add half teaspoon of kalonji oil twice a time daily. Before breakfast and after dinner for four weeks..

22- Severe Cold. To treat the severe cold, take half cup of water add half tea spoon kalonji oil and quarter tea spoon of olive oil; mix together and strain. Add two drops of strained mixture into the nose. Use this twice a day for better result..

23- Tooth Ache and Swelling Gums. Mix half teaspoon of kalonji oil with warm water and gargle the mouth. Also apply kalonji oil on the affected tooth, it will lighten pain quickly..

24- Weakness of Brain. To increase brain power take one teaspoon of ghee or two teaspoons of milk cream with two drops of kalonji oil and add sugar for taste, take it daily before breakfast. Continue until gets good result..

25- White and Black Spots on Skin. Make a solution by mixing one cup white vinegar and one tea spoon kalonji oil. Apply this mixture on affected areas before sleep at night and rinse off in the morning. Repeat this until get a clear skin..

Important Note: The articles presented are provided by third party authors and do not necessarily reflect the views or opinions of hanfi-1. They should not be considered as medical advice or diagnosis. Consult with your physician prior to following any suggestions provided.

Tags: Kalonji k Fawayed, Black Cumin seed (Nigella sativa seed)

कलौंजी - मौत को छोड कर हर मर्ज की दवाई है


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم

“मौत को छोड कर हर मर्ज की दवाई है कलौंजी"

हजरत अबू हुरेरा र॰ अ॰ से रिवायत है के
नबी ए करीम (ﷺ) से सुना की कलोंजी में मौत के अलावा हर बीमारी की शिफ़ा है.|

[सहीह मुस्लिम , जिल्द:03, किताब:तिब्बी, पेज:176, बाब:29, हदीस:5728-29].

कलौंजी : बड़ी से बड़ी बीमारी का एक इलाज : कलयुग में धरती पर संजीवनी है कलौंजी, अनगिनत रोगों को चुटकियों में ठीक करता है।

कैसे करें इसका सेवन
कलयुग में धरती पर संजीवनी है कलौंजी, अनगिनत रोगों को चुटकियों में ठीक करता है।
कलौंजी के बीजों का सीधा सेवन किया जा सकता है।
एक छोटा चम्मच कलौंजी को शहद में मिश्रित करके इसका सेवन करें।
पानी में कलौंजी उबालकर छान लें और इसे पीएं।
दूध में कलौंजी उबालें। ठंडा होने दें फिर इस मिश्रण को पीएं।
कलौंजी को ग्राइंड करें तथा पानी तथा दूध के साथ इसका सेवन करें।
कलौंजी को ब्रैड, पनीर तथा पेस्ट्रियों पर छिड़क कर इसका सेवन करें।

ये किन -किन रोगों में सहायक है :

टाइप-2 डायबिटीज : प्रतिदिन 2 ग्राम कलौंजी के सेवन के परिणामस्वरूप तेज हो रहा ग्लूकोज कम होता है। इंसुलिन रैजिस्टैंस घटती है,बीटा सैल की कार्यप्रणाली में वृद्धि होती है तथा ग्लाइकोसिलेटिड हीमोग्लोबिन में कमी आती है।

मिर्गी : 2007 में हुए एक अध्ययन के अनुसार मिर्गी से पीड़ित बच्चों में कलौंजी के सत्व का सेवन दौरे को कम करता है।

उच्च रक्तचाप : 100 या 200 मिलीग्राम कलौंजी के सत्व के दिन में दो बार सेवन से हाइपरटैंशन के मरीजों में ब्लड प्रैशर कम होता है।

दमा : कलौंजी को पानी में उबालकर इसका सत्व पीने से अस्थमा में काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) : रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) में एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार पीने से रक्तचाप सामान्य बना रहता है। तथा 28 मिलीलीटर जैतुन का तेल और एक चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर पूर शरीर पर मालिश आधे घंटे तक धूप में रहने से रक्तचाप में लाभ मिलता है। यह क्रिया हर तीसरे दिन एक महीने तक करना चाहिए।

गंजापन : जली हुई कलौंजी को हेयर ऑइल में मिलाकर नियमित रूप से सिर पर मालिश करने से गंजापन दूर होकर बाल उग आते हैं।

त्वचा के विकार : कलौंजी के चूर्ण को नारियल के तेल में मिलाकर त्वचा पर मालिश करने से त्वचा के विकार नष्ट होते हैं।
लकवा : कलौंजी का तेल एक चौथाई चम्मच की मात्रा में एक कप दूध के साथ कुछ महीने तक प्रतिदिन पीने और रोगग्रस्त अंगों पर कलौंजी के तेल से मालिश करने से लकवा रोग ठीक होता है।

कान की सूजन, बहरापन : कलौंजी का तेल कान में डालने से कान की सूजन दूर होती है। इससे बहरापन में भी लाभ होता है।

सर्दी-जुकाम : कलौंजी के बीजों को सेंककर और कपड़े में लपेटकर सूंघने से और कलौंजी का तेल और जैतून का तेल बराबर की मात्रा में नाक में टपकाने से सर्दी-जुकाम समाप्त होता है। आधा कप पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल व चौथाई चम्मच जैतून का तेल मिलाकर इतना उबालें कि पानी खत्म हो जाएं और केवल तेल ही रह जाएं। इसके बाद इसे छानकर 2 बूंद नाक में डालें। इससे सर्दी-जुकाम ठीक होता है। यह पुराने जुकाम भी लाभकारी होता है।

पेट के कीडे़ : 10 ग्राम कलौंजी को पीसकर 3 चम्मच शहद के साथ रात सोते समय कुछ दिन तक नियमित रूप से सेवन करने से पेट के कीडे़ नष्ट हो जाते हैं।

प्रसव की पीड़ा : कलौंजी का काढ़ा बनाकर सेवन करने से प्रसव की पीड़ा दूर होती है।

पोलियों का रोग : आधे कप गर्म पानी में एक चम्मच शहद व आधे चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय लें। इससे पोलियों का रोग ठीक होता है।

मुंहासे : सिरके में कलौंजी को पीसकर रात को सोते समय पूरे चेहरे पर लगाएं और सुबह पानी से चेहरे को साफ करने से मुंहासे कुछ दिनों में ही ठीक हो जाते हैं।

स्फूर्ति : स्फूर्ति (रीवायटल) के लिए नांरगी के रस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सेवन करने से आलस्य और थकान दूर होती है।

गठिया : कलौंजी को रीठा के पत्तों के साथ काढ़ा बनाकर पीने से गठिया रोग समाप्त होता है।

जोड़ों का दर्द : एक चम्मच सिरका, आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय पीने से जोड़ों का दर्द ठीक होता है।

आंखों के सभी रोग : आंखों की लाली, मोतियाबिन्द, आंखों से पानी का आना, आंखों की रोशनी कम होना आदि। इस तरह के आंखों के रोगों में एक कप गाजर का रस, आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर दिन में 2बार सेवन करें। इससे आंखों के सभी रोग ठीक होते हैं। आंखों के चारों और तथा पलकों पर कलौंजी का तेल रात को सोते समय लगाएं। इससे आंखों के रोग समाप्त होते हैं। रोगी को अचार, बैंगन, अंडा व मछली नहीं खाना चाहिए।

स्नायुविक व मानसिक तनाव : एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल डालकर रात को सोते समय पीने से स्नायुविक व मानसिक तनाव दूर होता है।

गांठ : कलौंजी के तेल को गांठो पर लगाने और एक चम्मच कलौंजी का तेल गर्म दूध में डालकर पीने से गांठ नष्ट होती है।

मलेरिया का बुखार : पिसी हुई कलौंजी आधा चम्मच और एक चम्मच शहद मिलाकर चाटने से मलेरिया का बुखार ठीक होता है।

स्वप्नदोष : यदि रात को नींद में वीर्य अपने आप निकल जाता हो तो एक कप सेब के रस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करें। इससे स्वप्नदोष दूर होता है। प्रतिदिन कलौंजी के तेल की चार बूंद एक चम्मच नारियल तेल में मिलाकर सोते समय सिर में लगाने स्वप्न दोष का रोग ठीक होता है। उपचार करते समय नींबू का सेवन न करें।

कब्ज : चीनी 5 ग्राम, सोनामुखी 4 ग्राम, 1 गिलास हल्का गर्म दूध और आधा चम्मच कलौंजी का तेल। इन सभी को एक साथ मिलाकर रात को सोते समय पीने से कब्ज नष्ट होती है।

खून की कमी : एक कप पानी में 50 ग्राम हरा पुदीना उबाल लें और इस पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह खाली पेट एवं रात को सोते समय सेवन करें। इससे 21 दिनों में खून की कमी दूर होती है। रोगी को खाने में खट्टी वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए।

पेट दर्द : किसी भी कारण से पेट दर्द हो एक गिलास नींबू पानी में 2 चम्मच शहद और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार पीएं। उपचार करते समय रोगी को बेसन की चीजे नहीं खानी चाहिए। या चुटकी भर नमक और आधे चम्मच कलौंजी के तेल को आधा गिलास हल्का गर्म पानी मिलाकर पीने से पेट का दर्द ठीक होता है। या फिर 1 गिलास मौसमी के रस में 2 चम्मच शहद और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार पीने से पेट का दर्द समाप्त होता है।

सिर दर्द : कलौंजी के तेल को ललाट से कानों तक अच्छी तरह मलनें और आधा चम्मच कलौंजी के तेल को 1 चम्मच शहद में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से सिर दर्द ठीक होता है। कलौंजी खाने के साथ सिर पर कलौंजी का तेल और जैतून का तेल मिलाकर मालिश करें। इससे सिर दर्द में आराम मिलता है और सिर से सम्बंधित अन्य रोगों भी दूर होते हैं।

कलौंजी के बीजों को गर्म करके पीस लें और कपड़े में बांधकर सूंघें। इससे सिर का दर्द दूर होता है। कलौंजी और काला जीरा बराबर मात्रा में लेकर पानी में पीस लें और माथे पर लेप करें। इससे सर्दी के कारण होने वाला सिर का दर्द दूर होता है।

उल्टी : आधा चम्मच कलौंजी का तेल और आधा चम्मच अदरक का रस मिलाकर सुबह-शाम पीने से उल्टी बंद होती है।

हार्निया : 3 चम्मच करेले का रस और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह खाली पेट एवं रात को सोते समय पीने से हार्निया रोग ठीक होता है।

मिर्गी के दौरें : एक कप गर्म पानी में 2 चम्मच शहद और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से मिर्गी के दौरें ठीक होते हैं। मिर्गी के रोगी को ठंडी चीजे जैसे- अमरूद, केला, सीताफल आदि नहीं देना चाहिए।

पीलिया : एक कप दूध में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर प्रतिदिन 2 बार सुबह खाली पेट और रात को सोते समय 1 सप्ताह तक लेने से पीलिया रोग समाप्त होता है। पीलिया से पीड़ित रोगी को खाने में मसालेदार व खट्टी वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए।

कैंसर का रोग : एक गिलास अंगूर के रस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 3 बार पीने से कैंसर का रोग ठीक होता है। इससे आंतों का कैंसर, ब्लड कैंसर व गले का कैंसर आदि में भी लाभ मिलता है। इस रोग में रोगी को औषधि देने के साथ ही एक किलो जौ के आटे में 2 किलो गेहूं का आटा मिलाकर इसकी रोटी, दलिया बनाकर रोगी को देना चाहिए। इस रोग में आलू, अरबी और बैंगन का सेवन नहीं करना चाहिए। कैंसर के रोगी को कलौंजी डालकर हलवा बनाकर खाना चाहिए।

दांत : कलौंजी का तेल और लौंग का तेल 1-1 बूंद मिलाकर दांत व मसूढ़ों पर लगाने से दर्द ठीक होता है। आग में सेंधानमक जलाकर बारीक पीस लें और इसमें 2-4 बूंदे कलौंजी का तेल डालकर दांत साफ करें। इससे साफ व स्वस्थ रहते हैं।

दांतों में कीड़े लगना व खोखलापन: रात को सोते समय कलौंजी के तेल में रुई को भिगोकर खोखले दांतों में रखने से कीड़े नष्ट होते हैं।

नींद : रात में सोने से पहले आधा चम्मच कलौंजी का तेल और एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से नींद अच्छी आती है।

मासिकधर्म : कलौंजी आधा से एक ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से मासिकधर्म शुरू होता है। इससे गर्भपात होने की संभावना नहीं रहती है।

जिन माताओं बहनों को मासिकधर्म कष्ट से आता है उनके लिए कलौंजी आधा से एक ग्राम की मात्रा में सेवन करने से मासिकस्राव का कष्ट दूर होता है और बंद मासिकस्राव शुरू हो जाता है।

कलौंजी का चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में शहद मिलाकर चाटने से ऋतुस्राव की पीड़ा नष्ट होती है।

मासिकधर्म की अनियमितता में लगभग आधा से डेढ़ ग्राम की मात्रा में कलौंजी के चूर्ण का सेवन करने से मासिकधर्म नियमित समय पर आने लगता है।

यदि मासिकस्राव बंद हो गया हो और पेट में दर्द रहता हो तो एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम पीना चाहिए। इससे बंद मासिकस्राव शुरू हो जाता है।

गर्भवती महिलाओं : कलौंजी आधा से एक ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन 2-3 बार सेवन करने से मासिकस्राव शुरू होता है।

गर्भवती महिलाओं को इसका सेवन नहीं कराना चाहिए क्योंकि इससे गर्भपात हो सकता है। :

स्तनों का आकार : कलौंजी आधे से एक ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से स्तनों का आकार बढ़ता है और स्तन सुडौल बनता है।

स्तनों में दुध : कलौंजी को आधे से 1 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम खाने से स्तनों में दुध बढ़ता है।

स्त्रियों के चेहरे व हाथ-पैरों की सूजन : कलौंजी पीसकर लेप करने से हाथ पैरों की सूजन दूर होती है।

बाल लम्बे व घने : 50 ग्राम कलौंजी 1 लीटर पानी में उबाल लें और इस पानी से बालों को धोएं। इससे बाल लम्बे व घने होते हैं।
बेरी-बेरी रोग : बेरी-बेरी रोग में कलौंजी को पीसकर हाथ-पैरों की सूजन पर लगाने से सूजन मिटती है।

भूख का अधिक लगना : 50 ग्राम कलौंजी को सिरके में रात को भिगो दें और सूबह पीसकर शहद में मिलाकर 4-5 ग्राम की मात्रा सेवन करें। इससे भूख का अधिक लगना कम होता है।

नपुंसकता : कलौंजी का तेल और जैतून का तेल मिलाकर पीने से नपुंसकता दूर होती है।

खाज-खुजली : 50 ग्राम कलौंजी के बीजों को पीस लें और इसमें 10 ग्राम बिल्व के पत्तों का रस व 10 ग्राम हल्दी मिलाकर लेप बना लें। यह लेप खाज-खुजली में प्रतिदिन लगाने से रोग ठीक होता है।

नाड़ी का छूटना : नाड़ी का छूटना के लिए आधे से 1 ग्राम कालौंजी को पीसकर रोगी को देने से शरीर का ठंडापन दूर होता है और नाड़ी की गति भी तेज होती है। इस रोग में आधे से 1ग्राम कालौंजी हर 6 घंटे पर लें और ठीक होने पर इसका प्रयोग बंद कर दें।

कलौंजी को पीसकर लेप करने से नाड़ी की जलन व सूजन दूर होती है।

हिचकी : एक ग्राम पिसी कलौंजी शहद में मिलाकर चाटने से हिचकी आनी बंद हो जाती है। तथा कलौंजी आधा से एक ग्राम की मात्रा में मठ्ठे के साथ प्रतिदिन 3-4 बार सेवन से हिचकी दूर होती है। या फिर कलौंजी का चूर्ण 3 ग्राम मक्खन के साथ खाने से हिचकी दूर होती है। और यदि आप काले उड़द चिलम में रखकर तम्बाकू के साथ पीने से हिचकी में लाभ होता है।

3 ग्राम कलौंजी पीसकर दही के पानी में मिलाकर खाने से हिचकी ठीक होती है।

स्मरण शक्ति : लगभग 2 ग्राम की मात्रा में कलौंजी को पीसकर 2 ग्राम शहद में मिलाकर सुबह-शाम खाने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

छींके : कलौंजी और सूखे चने को एक साथ अच्छी तरह मसलकर किसी कपड़े में बांधकर सूंघने से छींके आनी बंद हो जाती है।

पेट की गैस : कलौंजी, जीरा और अजवाइन को बराबर मात्रा में पीसकर एक चम्मच की मात्रा में खाना खाने के बाद लेने से पेट की गैस नष्ट होता है।

पेशाब की जलन : 250 मिलीलीटर दूध में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से पेशाब की जलन दूर होती है।

दमा रोग (ASTHMA): एक चुटकी नमक, आधा चम्मच कलौंजी का तेल और एक चम्मच घी मिलाकर छाती और गले पर मालिश करें और साथ ही आधा चम्मच कलौंजी का तेल 2 चम्मच शहद के साथ मिलाकर सेवन करें। इससे दमा रोग में आराम मिलता है।

पथरी : 250 ग्राम कलौंजी पीसकर 125 ग्राम शहद में मिला लें और फिर इसमें आधा कप पानी और आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर प्रतिदिन 2 बार खाली पेट सेवन करें। इस तरह 21 दिन तक पीने से पथरी गलकर निकल जाती है।

सूजन : यदि चोट या मोच आने के कारण शरीर के किसी भी स्थान पर सूजन आ गई हो तो उसे दूर करने के लिए कलौंजी को पानी में पीसकर लगाएं। इससे सूजन दूर होती है और दर्द ठीक होता है। कलौंजी को पीसकर हाथ पैरों पर लेप करने से हाथ-पैरों की सूजन दूर होती है।

स्नायु की पीड़ा : दही में कलौंजी को पीसकर बने लेप को पीड़ित अंग पर लगाने से स्नायु की पीड़ा समाप्त होती है।

जुकाम : 20 ग्राम कलौंजी को अच्छी तरह से पकाकर किसी कपड़े में बांधकर नाक से सूंघने से बंद नाक खुल जाती है और जुकाम ठीक होता है।

जैतून के तेल में कलौंजी का बारीक चूर्ण मिलाकर कपड़े में छानकर बूंद-बूंद करके नाक में डालने से बार-बार जुकाम में छींक आनी बंद हो जाती हैं और जुकाम ठीक होता है। कलौंजी को सूंघने से जुकाम में आराम मिलता है।

यदि बार-बार छींके आती हो तो कलौंजी के बीजों को पीसकर सूंघें।

बवासीर के मस्से : कलौंजी की भस्म को मस्सों पर नियमित रूप से लगाने से बवासीर का रोग समाप्त होता है।

वात रोग : वात रोग में कलौंजी के तेल से रोगग्रस्त अंगों पर मालिश करने से वात की बीमारी दूर होती है।

नोट: ध्यान रखें कि इस दवा का प्रयोग गर्भावस्था में नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे गर्भ नष्ट हो सकता है।
Posted by : oldveda.com

Wednesday, October 28, 2015

इस्लाम क्या है?


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
इस्लाम क्या है?

इस्लाम अरबी ज़ुबान का लफ़्ज़ है| इस लफ़्ज़ को खोलने (सन्धि विच्छेद) पर इसका लफ़्ज़ "स ल म" जिसके माने अमन, पाकिज़गी, अपने आप को हवाले करना है| मज़हब के लिहाज़ से इस्लाम का मतलब अपने आप को पूरी तौर पर अल्लाह के हवाले कर देना है|

अल्लाह लफ़्ज़ भी अरबी ज़ुबान का ही लफ़्ज़ है जिसके माने "खुदा" या "भगवान" या "रब"के है| जिसके मतलब- एक और अकेला खुदा जिसने पुरी कायनात को बनाया, वो बडा रह्म करने वाला और रहीम(दयालु) है|

इस्लाम कोई नया दीन नही बल्कि ये तब से है जब अल्लाह ने इस दुनिया मै सबसे पहले इन्सान आदम अं (जो इस दुनिया मे अल्लाह के सब से पहले नबी थे) उन को भेजा| आदम अं के बाद जितने भी नबी या रसूल आये सबने सिर्फ़ इस्लाम की ही दावत या तालीम दी| दर हक़ीक़त इस्लाम किसी एक इन्सान या कौम या शहर या देश के लिये नही बल्कि तमाम दुनिया मे रहने वाले इन्सानो का दीन है जो इन्सान अपने आप को अल्लाह के सुपुर्द कर दे|

अमन व सलामती इस्लाम का एक बुनयादी तसव्वुर हैं जो के इस्लाम से गहरा ताल्लुक रखता हैं| इस्लाम का पूरा निज़ाम ए हयात, कानून, इस के अह्काम, इसके रस्म सब के सब इसकी तस्वीर अमन के साथ जोड्ते हैं| इस्लाम इस अज़ीम कायनात मे अज़ीम वहदत का दीन हैं| जिसका पहला कदम तौहीद ए इलाही से शुरु होता हैं| यानि इस ज़ात से जिससे ज़िन्दगी का सदूर होता हैं और इसी की तरफ़ रुजु होगा|

रब्बुल आलामीन का इर्शाद हैं :(ऐ मेरे नबी) आप कह दिजिए के वो अल्लाह एक हैं, अल्लाह बेनियाज़ हैं, इसने किसी को पैदा नही किया और ना वो किसी से पैदा किया गया हैं, और न उसका कोई शरीक हैं|
(सूरह इख्लास)

सब की ज़रुरते वही पूरी करने वाला हैं| इस के दर के सिवा कोई दर नही सब इसी के मोहताज हैं वो किसी का मोहताज नही क्योकि वो अपनी सिफ़ात मे मुकम्मल हैं| इसके इल्म मे हर चीज़ हैं| इसकी रहमत इसके गज़ब से ज़्यादा हैं| इसकी रहमत हर किसी के लिये आम हैं| इसी तरह वो अपनी इस सिफ़ात मे भी मुकम्मल हैं| उसमे कोई ऐब नही न कोई उस जैसा हैं| इसलिये सिर्फ़ वो ही इबादत के लायक हैं उसके सिवा कोई नही| इन्ही सिफ़ात के तहत वो कायनात मे इबादत के तमाम इख्तलाफ़ात को यही खत्म कर देता हैं|

अल्लाह सुब्हानो तालाह फरमाता हैं :अगर आसमान व ज़मीन मे अल्लाह के सिवा कई खुदा होते तो दोनो तबाह हो जाते|
(सूरह अम्बिया-22)

एक और जगह अल्लाह ने क़ुरान मे फ़र्माया :अल्लाह ने अपनी कोई औलाद नही पैदा करी और न ही इसके साथ कोई दूसरा माबूद हैं, वरना हर माबूद अपनी मख्लूक को लेकर अलग हो जाता और इन मे हर एक दूसरे पर चढ बैठता|
(सूरह अल मोमिनून-91)

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इस्लाम के बुनयादी अकायद


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
इस्लाम के बुनयादी अकायद

इस्लाम की बुनियाद जिन चीज़ो पर हैं उसके मुताबिक इन्सान को इन तमाम अकीदो पर अमल करना लाज़िमी हैं बिना इन बुनियादी अकीदो पर अमल किये और ईमान लाये एक इन्सान कतई मुसल्मान नही हो सकता| इस्लाम के बुनयादी अकीदे के मुताबिक जिन चीज़ो पर बन्दो को अमल करना और ईमान लाना हैं वो इस तरह हैं-

1.अल्लाह पर ईमान लाना अल्लाह पर ईमान लाना इस्लाम का पहला बुनयादी उसूल हैं| ईमान लाने से मतलब इस बात से हैं अल्लाह मौजूद हैं और वही हर चीज़ का मालिक हैं, वही सबका पालनेवाला हैं, वही हर चीज़ को अकेला पैदा करने वाला हैं, वो अकेला हैं और सारी कायनात को वही चला रहा हैं| इबादत का खालिस हकदार सिर्फ़ अल्लाह हैं न उसका कोई शरीक हैं न ही उसकी इबादत मे कोई शरीक हैं| उसका कोई शरीक और हिस्सेदार नही| और उसमे हर तरह की सिफ़ात हैं और वो हर ऐब से पाक और बरी हैं| इस्लाम का ये पहला बुनयादी अकायद हर इन्सान की फ़ितरत मे मौजूद हैं और अल्लाह ने हर इन्सान को इसी फ़ितरत पर पैदा किया हैं और इन्सान की ये फ़ितरत तब बदलती हैं जब उसके अकिदे को बदलने वाले दुनयावी मामलात उसके सामने होते हैं| इन्सान चाहे कैसा भी क्यो न हो लेकिन जब वो किसी परेशानी मे घिरता हैं तो सिर्फ़ अपने रब को को याद करता हैं और उसी की तरफ़ पलटता हैं ताकि उसका रब उसकी इस परेशानी को दूर कर दें|

नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम का इरशाद हैं : हर बच्चा फ़ितरते इस्लाम पर पैदा होता हैं और उसके मां-बाप या उसके अपने उसे बाद मे यहूदी या ईसाई या दूसरे दीन की तरफ़ फ़ेर देते हैं|

इन्सान की अक्ल इस बात की तरफ़ इशारा करती हैं और उसे अल्लाह पर ईमान लाने की रहनुमाई करती हैं लिहाज़ा अगर कोई इन्सान इस दुनिया और इसके अन्दर आसमान, ज़मीन, पहाड़, दरिया, जानवर और दिगर चीज़ो पर गौर करे तो उसे इस बात पर यकीन होगा की इस कायनात को पैदा करने वाला कोई अकेली ही कोई ज़ात हैं जिसने इस तमाम चीज़ो को बनाया और उसी के हाथ मे सब कुछ हैं|

इस ताल्लुक से अल्लाह ही सारी कायनात का पैदा करने वाला हैं इन्कार करने वालो की अक्ल से अगर ये सवाल किया जाये-
या तो ये कायनात किसी पैदा करने वाले के बिना ही वजूद मे आ गयी ?
इस सवाल पर अगर गौर किया जाये तो ये बात नामुमकिन सी लगती हैं और अक्ल भी हर ऐतबार से नकारती हैं क्योकि हर अक्ल वाला चाहे वो अल्लाह का इन्कार करे या न करे ये समझता हैं के कोई चीज़ बिना किसी पैदा करने वाले के बिना नही बन सकती|

या फ़िर इन्सानो और दूसरी मख्लूक ने खुद को पैदा कर लिया ?
ये बात भी काबिले गौर हैं अक्ल के ऐतबार से नामुमकिन हैं और कोई भी इन्सान इस पर यकीन नही करेगा के कोई चीज़ ने खुद को पैदा कर लिया क्योकि जब किसी चीज़ का वजूद ही नही तो वो खुद को कैसे पैदा कर सकती हैं और जब ये नही हैं तो आखिर इन्सान कैसे पैदा हुआ ?

इन सवालो से ये बात समझ आती हैं के कोई चीज़ बिना किसी के पैदा किया खुद नही हो सकती और न ही किसी मखलूक को ये ताकत के उसने खुद को पैदा कर लिया लिहाज़ा ये बात गौर करने वाली हैं के इन तमाम चीज़ो का कोई पैदा करने वाला हैं, जिसने इन्हे पैदा किया और ये सब चीज़े वजूद मे आई| और ये बात सिर्फ़ खालिस एक खुदा की तरफ़ इशारा करती हैं वही अल्लाह हैं जो हमेशा से हैं और हमेशा रहेगा|

ब्रिटिश किंग इन्स्टिटयूट और अमेरिकन इन्स्टीटयूट न्यूयार्क के प्रेसिडेंट क्रेसी मोरेसन ने अपनी किताब मे लिखा –पैदायशी रूप से इन्सान की बढ़ोत्तरी और जिम्मेदारी का अहसास अल्लाह पर ईमान लाने की निशानियो मे से एक निशानी हैं|

दूसरी जगह लिखते हैं– इन्सान की दीनदारी उसकी रूह का पता देती हैं और उसे धीरे-धीरे बुलन्द करती हैं यहा तक कि इन्सान अल्लाह से रिश्ते और जुड़ने का अहसास करने लगता हैं और अल्लाह से इन्सान की दुआ “के अल्लाह उसकी मदद करे एक फ़ितरती चीज़ हैं|

आगे लिखते हैं – इन्सान को रुतबा, इज़्ज़त, इन्सानियत किसी इन्सान को अल्लाह के इन्कार करने से नही मिलता| हमारी अक्ल और दायरे की हद हैं लिहाज़ा हम अक्ल की हद के आगे की सच्चाई तन नही जा सकते ना जान सकते और इसी बुनियाद पर हमारे लिये उस अल्लाह जिसने तमाम कायनात, हर चीज़, ज़र्रे, सितारो, सूरज और इन्सानो को पैदा किया ईमान लाना लाज़िमी हैं|

अल्लाह के अकेला होने की अक्ली दलील
इस बारे मे अनगिनत अक्ली दलीले मौजूद हैं जिनमे से एक दलील दुआओ का कबूल होना हैं| इस दुनिया मे हर ज़रुरतमंद अल्लाह से दुआ करता हैं तो अल्लाह उनकी दुआ को कबूल करता हैं उनकी मुसीबत और परेशानी कू उनसे दूर करता हैं|

अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया :
मुझे पुकारो मैं तुम्हारी दुआ करता हूं| (अल कुरान)
और वो कौन हैं जो परेशानी और मुसीबत के मारे की दुआ कबूल करता हैं और उसकी परेशानी दूर करता हैं| (अल कुरान)
और नूह को हमने निजात दी जब उसने हमको पुकारा तो हमने उसकी दुआ कबूल कर ली| (अल कुरान)

अक्ल की दलिलो मे नबीयो के वे निशानिया हैं जिनको चमत्कार कहा जाता हैं और ये वो चीज़े हैं जो इन्सान की आदत से अलग और उसकी ताकत से बाहर होती हैं जिसे अल्लाह नबियो के हाथो कराता हैं ताकि लोग नबी के ज़रिये बताये गये हक़ को पहचाने| लिहाज़ा ये मोजज़े (चमत्कार) रसूलो के भेजने वाले के वजूद की दलील हैं| इसकी मिसाल के तौर पे ये के जब मूसा अलै0 अपने मानने वालो को लेकर चले तो फ़िरऔन और उसके लश्कर ने उनका पीछा किया और जब मूसा और उनके मानने वाले दरिया नील के करीब पहुंचे तो अल्लाह के हुक्म से मूसा अलै0 ने दरिया मे अपनी लाठी मारी तो दरिया नील मे बीच से पैदल चलने के लिया रास्ता बन गया| (पूरा वाकिया कुरान मे देखे) और मूसा अलै0 और उनकी कौम ने दरिया पार कर ली लेकिन जब फ़िरऔन और उसके लश्कर ने दरिया के बीच मे पहुचा तो दरिया वापस मिल गयी और फ़िरऔन और उसका लश्कर उसमे डूब गया| इसी तरह ईसा अलै0 भी अल्लाह के हुक्म पर मुर्दो को ज़िन्दा करते थे| इसी तरह नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अल्लाह के हुक्म पर अपनी ऊंगली के इशारे से चांद के दो टुकड़े कर दियए और फ़िर से मिला दिये| ये वो मोजज़े(चमत्कार) हैं जो अल्लाह नबीयो के ज़रिये इस लिये कराता हैं के लोग अल्लाह को पहचान ले के उसके सिवा कोई दूसरा खुदा नही| क्योकि नबी भी इन्सानो मे से होता हैं और किसी इन्सान के बस मे नही के वो ऐसे मोजज़े अपनी ताकत से दिखाये| इसके अलावा किसी पैदा हुए बच्चे का मां की छाती से दूध पीना भी इस बात की दलील हैं के कोई ताकत उस बच्चे दूध पीने के लिये रहनुमाई कर रही हैं क्योकी किसी पैदा हुए बच्चे से बात कर उसे ये समझा पाना नामुम्किन हैं के उसे ये बताया जाये के उसकी भूख के लिये उसकी मां की छाती मे उसके लिये दूध का इन्तेज़ाम हैं| ये और इस तरह बहुत सी अक्ल की निशानिया इस दुनिया मे मौजूद हैं जो अकेले अल्लाह के होना का सबूत हैं|

2. फ़रिश्तो पर ईमान लाना

फ़रिश्ते अल्लाह की मख्लूक हैं जिन्हे अल्लाह ने खालिस अपनी इबादत के लिये पैदा किया हैं| फ़रिश्तो पर ईमान लाना हर मुसलमान के लिये लाज़िमी हैं और अल्लाह की इस मख्लूक से इन्कार करने वाला कतई मुसल्मान नही हो सकता| जैसा के

अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया : हमारे नबी (मुहम्मद सल्लललाहो अलैहे वसल्लम) जो कुछ उनपर उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया हैं उस पर ईमान लाये और उनके (साथ) मुसलमान भी और सब अल्लाह और उसके फ़रिश्तो और किताबो और रसूलो पर ईमान लाये|
(सूरह अल बकरा 2/285)

इसके अलावा हर फ़रीश्ते के ज़िम्मे अल्लाह ने अलग-अलग कामो को तय होना किया हैं जैसे जिब्रील अलै0 के ज़रिये अल्लाह अपने नबियो से कलाम करता हैं और अपने अहकाम बताता हैं| फ़रिश्तो की तादाद कितनी हैं इसका कोई इल्म किसी इन्सान को नही सिवाये अल्लाह के अलबत्ता हर फ़रिश्ता अल्लाह के हुक्म पर किसी न किसी काम को अन्जाम दे रहा हैं|

अल्लाह की इस मख्लूक पर ईमान लाने के लिये जिन बातो को जानना ज़रुरी हैं वो ये है-
फ़रिश्तो का वजूद हैं बल्कि फ़रिश्तो को अल्लाह ने फ़रिश्तो को इन्सान से पहले पैदा किया|

जैसा के कुरान से साबित हैं : और जब हमने फ़रिश्तो को हुक्म दिया के आदम को सजदा करो तो इब्लीस के सिवा सबने सजदा किया वो जिन्नात मे से था|
(सूरह कहफ़ 18/50)

इस आयत से साबित हैं के फ़रिश्ते का वजूद इन्सान की पैदाईश से पहले था|
जिन फ़रिश्तो का नाम मालूम हैं उनके नाम पर पर भी यकीन करना जैसे के जिब्रील अलै0 फ़रिश्तो के खसलत पर यकीन करना जैसे के

अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया : हज़रत ज़र बिन हबीश रज़ि0 से रिवायत हैं के हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद ने फ़रमाया के नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम ने जिब्रील अलै0 को देखा इनके छै सौ पंख हैं|
(बुखारी)

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत हैं के
नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया : मुझे कहा गया के मैं तुम्हे हामीलीन अर्श के एक फ़रिश्ते के बारे मे बताऊँ| बिलाशक व शुबहा इसके एक कानो से दूसरे कानो की दूरी सात सौ साल के बराबर हैं|
(अबू दाऊद)

फ़रिश्तो के काम और इबादत पर यकीन करना जैसे तमाम फ़रिश्तो को अल्लाह ने सिर्फ़ अपनी इबादत के लिये पैदा किया और हर फ़रिश्ता इस काम को बिना रुके, थके कर रहा हैं जैसे के

अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया : "आसमान और ज़मीन मे जो हैं वो इस अल्लाह का हैं और जो इसके पास हैं वह इसकी इबादत से न सरकशी करते हैं और न थकते हैं| रात दिन उसकी तस्बीह करते हैं कभी काहिली नही करते|
(सूरह अंबिया 21/,20)

फ़रिश्तो को देख पाना किसी इन्सान के बस की बात नही सिवाये नबियो को अल्लाह के हुक्म से जैसा के उपर हदीस गुज़री के नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम ने जिब्रील अलै0 को उनकी असल शक्ल मे देखा और उनके छ सौ पंख थे इसके अलावा जिब्रील अलै0 जब भी अल्लाह के हुक्म से अल्लाह का अहकाम लेकर नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम के पास आते तो इन्सानी शक्ल मे आते हैं जैसा के

अल्लाह ने कुरान मे फ़रमाया : "फ़िर हमने इस के पास अपनी रूह(जिब्रील अलै0) को भेजा| पस वो इसके सामने पूरा आदमी बन कर ज़ाहिर हुआ|
(सूरह मरियम 19/17)

इसके अलावा जिब्रील अलै0 जब भी अल्लाह का अहकाम नबी सल्लललाहो अलैहे वसल्लम के पास लेकर आते तो इन्सान की ही शक्ल मे लेकर आते जैसा के कई हदीसो से साबित हैं|

3. रसूलो पर ईमान लाना

रसूल हर उस इन्सान को कहा जाता हैं जिसे कोई शरीयत अल्लाह की तरफ़ से दी जाती हैं और उसे उस शरीयत की (तब्लीग) प्रचार का हुक्म भी मिलता हैं| इसके उल्टे नबी हर उस इन्सान को कहते हैं जो पहले किसी और नबी की लाई हुई शरीयत को जारी रखता हैं या मुर्दा हो चुकी हुई शरीयत को ज़िन्दा करने के लिये भेजा जाता हैं|

अल्लाह ने हर कौम मे अपना रसूल भेजा जैसा के कुरान से साबित हैं| : " और ऐसी कोई उम्मत नही गुज़री जिसमे हमारा डराने वाला नबी न आया हो|
(सूरह फ़ातिर 35/24)

रसूल इन्सानो से कोई अलग नही होता बल्कि इन्सानो मे से ही होता हैं ताकि वो शरीयत को सबसे पहले अपने ऊपर अमल करके दिखाये और आम इन्सान उसे अपने लिये नामुमकिन न समझे| रसूल भी आम इन्सानो की तरह होता हैं और उसे भी हर तरह से दुख बीमारी परेशानी का सामना करना पड़ता हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना हैं किसी रसूल का इन्तेखाब अल्लाह के ज़रिये होता हैं इन्सानो के ज़रिये नही क्योकि रिसालत का इन्तेखाब अल्लाह का हक हैं न के इन्सानो का| रसूल इन्सानो मे सबसे बेहतर होता हैं और हर गुनाह से पाक होता हैं|

इन्सानो पर इस बात की पाबन्दी लाज़िम हैं के तमाम रसूलो पर जिसके बारे मे कुरान और हदीस से जानकारी मिलती हैं उस पर ईमान लाये| जिस किसी ने किसी रसूल का इन्कार किया उसका ईमान मुकम्मल नही अल्बत्ता नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के बाद से कयामत तक जो सिर्फ़ नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की लाई हुई शरियत की ही पाबन्दी हर इन्सान के लिये हैं लेकिन इस शरियत मे अल्लाह के तमाम रसूलो का इकरार लाज़िम हैं| लिहाज़ा किसी इन्सान ने अगर किसी रसूल को जानने के बाद भी उसका इन्कार किया तो वो मुसल्मान नही हो सकता| इन्सानो को जिन रसूलो के नाम मालूम हैं उन रसूलो के नाम के साथ उनकी रिसालत का यकीन करना लाज़िम हैं जिनका नाम नही मालूम उनके बारे मे बस इतना ही काफ़ी हैं के अल्लाह ने हर कौम मे अपना नबी भेजा हैं और कोई कौम बिना नबी के नही गुज़री| इसके साथ ही ये भी लाज़िम हैं के हर नबी ने सिर्फ़ अल्लाह ही की बात को लोगो तक पहुँचाया और उनकी ये खबर सच्ची हैं|

अल्लाह ने अपने आखरी रसूल जनाब मुहम्मद सल्लललाहो अलेहे वसल्लम को दुनिया मे भेज कर अपनी रिसालत के सिलसिले को खत्म कर दिया लिहाज़ा अब हर इन्सान के लिये ये लाज़िम हैं के वो मुहम्मद सल्लललाहो अलेहे वसल्लम और उनकी लाई हुई शरीयत यानि दीन ए इस्लाम को अपनाये क्योकि मुहम्मद सल्लललाहो अलेहे वसल्लम तमाम दुनिया के लिये नबी बना कर भेजे गये न के किसी एक मुल्क या बस्ती के लिये|

रसूल पर ईमान लाने का सबसे बड़ा फ़ायदा ये हैं के बन्दे को अल्लाह से कुरबत और उसकी रहमत और उसके डर का अहसास होता हैं साथ ही अल्लाह को किस तरह जानना हैं और पूजना हैं इसका इल्म होता हैं|

4. आखिरत पर ईमान लाना

आखिरत का दिन कयामत का दिन हैं जिस दिन दुनिया खत्म कर दी जायेगी और शुरु दुनिया से लेअक्र कयामत तक पैदा होने वाले तमाम लोग दुबारा ज़िन्दा करके उठाये जायेगे| उसे आखिरत का दिन इसलिये कहा जाता हैं के क्योकि सिर्फ़ उसी दिन हर इन्सान के दुनिया मे किये गये अमल का हिसाब होगा और उसके अमल के मुताबिक उसे जहन्नम या जन्नत मे रहने को दिया जायेगा| आखिरत के दिन पर ईमान लाने से मुराद इस बात से हैं के हर इन्सान जान ले के एक दिन उसे अल्लाह के सामने पेश होना हैं और उसके दुनिया मे किये गये अमल-दखल का हिसाब देना होगा| लिहाज़ा हर इन्सान ये जान ले के उसे उसके किये के मुताबिक ही बदला दिया जायेगा जहन्नम या जन्नत के तौर पर लिहाज़ा हर इन्सान को चाहिये के दुनिया मे रहते हुए अल्लाह के हुक्म पर चले ताकि उसे आखिरत मे अच्छा सिला मिले| आखिरत पर ईमान रखने के साथ तमाम इन्सान को इस बात पर भी गौर करना हैं जिसका बिना यकीन के आखिरत का ईमान मुकम्मल नही हो सकता|

दुबारा कब्र से उठाये जाने पर ईमान : "हर इन्सान जो कयामत होने से पहले दुनिया मे पैदा होगा उसे अल्लाह दुबारा ज़िन्दा करेगा| जब फ़रिश्ता सूर फ़ूकेगा और तब सारे लोग अल्लाह के सामने बिना कपड़ो के पेश होगे| सबसे पहले नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की कब्र फ़टेगी इसके बाद दूसरे लोगो कि|"

बदला और हिसाब पर ईमान : "हर इन्सान जो इस दुनिया मे भेजा गया उसका हर अमल जो दुनिया मे किया चाहे अच्छा या बुरा उसका हिसाब होगा और उसके अमाल के मुताबिक उसे जन्नत और जहन्नम मे जगह दी जायेगी| किसी पर भी ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म न होगा| इसके बाद जन्नती जन्नत मे जहन्नमी जहन्नम मे हमेशा हमेशा रहेगे फ़िर न किसी को मौत आयेगी न किसी को दुबारा दुनिया मे वापस आकर नेक काम करके अपनी आखिरत सवारने का मौका दिया जायेगा|"

जन्नत और जहन्नम पर ईमान लाना : "जन्नत और जहन्नम इन्सान का आखिरी ठिकाना हैं जिसे अल्लान ने अपने बन्दो के लिये तैयार किया हैं| जन्नत मोमिन और अल्लह से डरने वाले नेक बन्दो के लिये और जहन्नम काफ़िर और सरकश बन्दो के लिए जिन्होने अल्लाह के साथ शिर्क किया और हमेशा अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी करी| ये दोनो जगहे ऐसी हैं जिसे ना किसी इन्सान ने अभी तक देखा ना किसी इन्सान ने इसके बारे अभी तक अहसास किया| जन्नत मे लोग अपने दुनिया मे किये गये अमल के मुताबिक अलग-अलग दर्जो के हिसाब से जगह पायेगे|"

अकसर लोग ये गुमान करते हैं के वो दुबारा कैसे ज़िन्दा किये जायेगे| इस बारे मे कुरान एक खुली चुनौती देता हैं उन इन्कार करने वालो के लिये जो दुबारा जी उठने पर यकीन नही करते| कुरान मे अल्लाह ने अलग-अलग कई जगहो इन्सान के दुबारा जी उठने के बारे मे बताया हैं ताकि इन्सान इस बात पर गौर फ़िक्र करले के इन्सान को जिस तरह अल्लाह ने अभी पैदा किया ठीक उसी तरह दुबारा पैदा करना अल्लाह के लिये कोई मुश्किल काम नही|

5. आसमानी किताब(अल्लाह की किताब) पर ईमान लाना

किताबो पर लाने से मतलब वो किताबे हैं जिसे अल्लाह ने अपने रसूलो को दिया ताकि वो अल्लाह के बन्दो को एक कानून के तहत जोड़ सके और उस किताब मे लिखे अल्लाह के कानून पर अमल कर अपनी ज़िन्दगी को अल्लाह के बताये तरीके पर गुज़ार सके जिससे बन्दे कि दुनिया और आखिरत संवर सके|

किताबो को उतारने का मकसद सिर्फ़ ये के इन्सान को जब भी कोई परेशानी हो या किसे मसले का हल तलाशना हो तो वो सीधे अल्लाह की तरफ़ रुजू करे और अपने मसले को हल करे न के अपने आप से ही बिना सोचे समझे किसी मसले पर खुद का मालिक बन के फ़ैसला करे| हकीकतन मालिक सिर्फ़ एक हैं और वो हैं अल्लाह लिहाज़ा बन्दो के तमाम ज़िन्दगी के आने वालो मसले का हल सिर्फ़ अल्लाह की किताब मे हैं| किताबो पर ईमान लाने से मतलब ये भी हैं के जो किताबे अल्लाह ने अपने रसूलो को दी हैं उन्हे अल्लाह की ही बात समझा जाये क्योकि अल्लाह ने खुद किताब नही लिखी बल्कि अपने रसूल को दी जिसके ज़रिये अल्लाह की बात एक से दूसरे इन्सान तक पहुची| इसलिये किताबो पर बिना चू-चरा के इस बात पर यकीन करना ईमान का हिस्सा हैं|

जिस तरह अल्लाह ने मुहमम्द सल्लललाहो अलेहे वसल्लम को कुरान मजीद दी उसी तरह पिछली कौमो मे भी अपने रसूल के ज़रिये किताबे(शरियत या कानून) भेजी जैसे ईसा अलै0 को इंजील, मूसा अलै0 को तौरेत और दाऊद अलै0 को ज़बूर दी| आज ये किताबे अपनी असल हालत मे मौजूद नही और न ही इन किताबो की शरियत पर अमल करना हैं लेकिन फ़िर भी मुसलमान के लिये ये लाज़िम हैं बल्कि ईमान क एक हिस्सा हैं के इन किताबो पर ईमान लाये के ये अल्लाह की ही किताब हैं| इसके अलावा पिछली किताबे जैसे इंजील, तौरेत और ज़बूर इस बात की शहादत देती हैं के कुरान अल्लाह की आखिरी किताब हैं जो के मुहम्मद सल्लललाहो अलेहे वसल्लम पर उतारी गयी और यही आखिरी शरियत हैं जिसे अल्लाह ने कयामत तक के लिये बाकि छोड़ा लिहाज़ा हर इन्सान चाहे वो किसी मुल्क का हो या किसी कौम का सबके लिये लाज़िम हैं के वो कुरान पर ईमान लाये और मुसलमान हो जाये|

पिछ्ली शरियत मे अल्लाह की किताबे आज अपनी असल हालत मे मौजूद नही न ही अब वो शरियत मक्बूल हैं इसमे सबसे अहम बात ये हैं के पिछ्ली किताबे किसी को याद नही लेकिन कुरान की खासियत ये हैं के अल्लाह ने इसे इतना आसान कर दिया के 1400 सालो से आज तक लातादाद ऐसे लोग गुज़रे जिन्होने कुरान को याद(हिफ़्ज़) किया उसके अलावा खुद अल्लाह ने कुरान की ज़िम्मेदारी ली के इसे कयामत तक कोई नही बदल पायेगा बल्कि कुरान खुद इस बात का खुला चैलेन्ज करती हैं| 1400 सालो से आज तक कुरान वैसा ही मौजूद हैं जैसा अल्लाह ने इसे नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम पर उतारा था|

6. अच्छी बुरी तकदीर पर ईमान लाना

तकदीर पर ईमान लाने से मतलब ये के जो कुछ ह चुका या जो कुछ हो रहा हैं या जो कुछ होगा सब अल्लाह के इल्म मे हैं| अल्लाह ने हर इन्सान की तकदीर उसके पैदा होने से पहले लिख दी| क्योकि अल्लाह को हर चीज़ का इल्म हैं और कोई चीज़ उसके इल्म से बाहर नही| न कोई चीज़ उसकी मर्ज़ी के बिना हो सकती हैं न कोई अल्लाह की मर्ज़ी के बिना कुछ कर सकता हैं|

तकदीर पर ईमान लाना इन्सान को कल्बी सुकून व आराम देता हैं और न मिलने वाली चीज़े या न हो पाने वाले काम पर वो सब्र करता हैं और ये कहता हैं कि ये उसके रब की मर्ज़ी थी जबकि तकदीर पर ईमान न ला पाने के सबब इन्सान दुखी और परेशान रहता और और न मिलने वाली चीज़ो पर सब्र नही कर पाता| तकदीर पर ईमान लाना इन्सान के अन्दर बहादुरी और सब्र की ताकत पैदा करता हैं और बन्दा अपने आप को अपने रब यानि अल्लाह के हवाले कर देता हैं| तकदीर पर ईमान न लाने की ज़िन्दा मिसाल इन्सान का खुदकुशी करना हैं जो पशचमी देशो मे बहुत ज़्यादा हैं जहा गैर मुस्लिम कसरत से खुदकुशी करते हैं और इसका आकड़ा पूर्वी मुस्लिम देशो से बहुत ज़्यादा हैं|

Posted by : ISLAM THE TRUTH

आखिर तकलीद पर क्यो?

بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم

आखिर तकलीद पर क्यो?


ऐ ईमानवालो अल्लाह से इतना डरो जितना उससे डरने का हक़ हैं और तुम इस्लाम के सिवा किसी और दीन पर हर्गिज़ न मरना| (क़ुरान)
ऐ ईमानवालो अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो और अपने आमाल को बरबाद मत करो| (कुरान)
तुममे बेहतर शख्स वो हैं जो कुरान सीखे और सिखाये|(हदीस)


इस्लाम के शुरु के 400 साल तक तकलीद का नामोनिशान नही था फ़िर अचानक 4 मज़हबो की बुनियाद पड़ गयी और लोगो मे ये बात आम हो गयी चार मज़हब मे से किसी एक मज़हब की पैरवी फ़र्ज़ हैं बिना किसी एक मज़हब की पैरवी के इन्सान कामयाब नही हो सकता| अस्तगफ़िरुल्लाह लोग तकलीद को फ़र्ज़ कहने मे हिचकिचाये भी नही| फ़र्ज़ जो के सिर्फ़ अल्लाह के लिये है, ये तक भी लोगो ने ना सोचा की सिर्फ़ अल्लाह किसी चीज़ को फ़र्ज़ करता हैं अगर तकलीद फ़र्ज़ हैं तो अल्लाह इस लफ़्ज़ का इस्तेमाल कुरान मे भी ज़रूर करता या नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम इसको सहाबा को ज़रूर बताते| अगर तकलीद को फ़र्ज़ मान लिया जाये तो नाऊज़ोबिल्लाह अव्वल मुस्लीमीन जो सहाबा थे उनके बाद ताबाईन, उनके बाद ताबाअ ताबाईन, उनके बाद ताबाअ ताबाअ ताबाईन से एक फ़र्ज़ छुट गया| अस्तगफ़िरुल्लाह ! क्या आज का मुसलमान इनसे ज़्यादा मुत्तकी, परहेज़गार हैं| आईये ज़रा इस फ़र्ज़ को जिसे उम्मत मुसलिमा करती चली आ रही हैं इस पर गौर करते है |

तकलीद के मायने
लुगत से - गर्दन बन्द(गले का पट्टा) गले मे डालना और किसी की ज़िम्मेदारी पर काम करना और अपनी गर्दन पर कोई काम ले लेना और माअनी मज़ाज़ी ये हैं की ताबेदारी बगैर हकीकत मालूम किये करना| गले का पट्टा |
(अज़ ग्यास अल लुगत पेज 103)

शराह से - तकलीद ये हैं के जिस कि बाबत मुल्ला कारी हनफ़ी रह0 अपनी किताब शरह कसिदा अमाली मतबुआ युसुफ़ी देहली सफ़ा 34 मे लिखते हैं कि-
तकलीद कुबूल करना किसी और की बात को बिना सबूत के, तो इस मुकल्लिद ने बोझा कुबूल कर लिया अपने इमाम की बात का और अपने इमाम की बात को गले का हार बना लिया|

मगतनम अल हसूल मे फ़ाज़िल कंधारी हनफ़ी फ़रमाते हैं-
तकलीद उस शख्स की बात पर बिना दलील अमल करना हैं जिस की बात शरई हुज्जतो मे से ना हो| तो रुजु करे मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम और इज्माअ से तकलीद नही|
(मयारुल हक़ मतबुआ रहमानी पेज 37)

लिहाज़ा किसी की बात को उसकी दलील (सबूत) के बिना जाने मान लेना तकलीद हैं|


तकलीद कब शुरु हुई ?
शाह वलीउल्लाह किताब हुज्जतुल बलाग मतबुआ सिद्दीकी बरेली पेज 157 मे लिखते है कि-
मालूम होना चाहिए की चौथी सदी हिजरी से पहले के लोग किसी खालिस एक मज़हब पर मुत्ताफ़िक ना थे|

अल्लामा अल मौकाईन मतबुआ अशरफ़ अल मताबअ देहली जिल्द अव्व्ल पेज 222 मे हैं-
ये तक्लीद कि बिदअत चौथी सदी हिजरी मे जारी हुई हैं| ये वो ज़माना हैं कि जिस कि मज़म्मत मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम से साबित हो चुकी हैं|

अल्लामा सनद बिन अन्नान मालिकी तहरीर फ़रमाते हैं-
तक्लीद नाम का मज़हब न था जिसको पढ़ा पढ़ाया जाता हो और इसकी तकलीद की जाती हो बल्कि वो लोग वाकई मे कुरान व हदीस की तरफ़ रुजु करते थे और कुरान व हदीस मे न मिलने कि सूरत मे जिस तरफ़ उनकी बसीरत पहुँचती| इसी तरह ताबाईन रह0 करते रहे| यानि कुरान व हदीस कि तरफ़ रुजु करते अगर कुरान व हदीस से न मिलता तो इज्माअ सहाबा कि तरफ़ रुख करते, अगर इज्माअ भी न मिलता तो खुद इज्तेहाद करते और बाज़ सहाबी के कौल को कवि समझ कर इख्तेयार कर लेते| फ़िर ताबाअ ताबाईन का ज़माना आया| इस ज़माने मे इमाम अबु हनीफ़ा रह0, इमाम मालिक रह0, इमाम शाफ़ई रह0 और इमाम अहमद बिन हंबल रह0 हुए क्योकि इमाम मालिक रह0 ने 179 हिजरी मे वफ़ात पाई और इमाम अबु हनीफ़ा रह0 ने 150 हिजरी मे वफ़ात पाई और इसी साल इमाम शाफ़ई रह0 पैदा हुए और इमाम अहमद बिन हंबल रह0 164 हिजरी मे पैदा हुए| ये चारो भी पहले वालो के तरीके पर थे और इस ज़माने मे भी किसी खास शख्स का मज़हब मुकर्रर न था| जिस की ये चारो इमाम दर्स या तब्लीग करते हो बल्कि इनका अमल भी इत्तेबाअ सुन्नत था| लिहाज़ा तकलीद इनके ज़माने मे भी न वजूद मे आई और अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के कौल को सच कर दिखाया कि बेहतर ज़मानो मे पहले मेरा ज़माना हैं, फ़िर बाद वाले हैं, फ़िर बाद वाले हैं|(सहीह बुखारी)

तमाम तकलीद करने वालो पर अफ़सोस हैं के वो कैसे कहते हैं के दीन ए इस्लाम तकलीद वाला मज़हब हैं| हांलाकि जिन बुज़ुर्गो का नाम लेकर तकलीद की जाति हैं वो 200 हिजरी के आस-पास पैदा हुए हैं और खुद मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने जो बेहतर ज़माने की पेशनगोई की वो इससे पहले का हैं|


तकलीद की तरक्की
शाह वलिउल्लाह साह्ब हुज्जतुलाह अल बलाग मतबुआ सिद्दीकी बरेली पेज 151 मे फ़रमाते हैं-
इमाम अबु हनीफ़ा रह0 के शागिर्दो मे सब से ज़्यादा शोहरत इमाम अबु युसुफ़ रह0 कि हुई| हारुन रशीद के अहद मे काज़ी का मनसब (ओहदा) उनको हासिल हुआ जिसकी वजह से इमाम अबु हनीफ़ा रह0 का मज़हब फ़ैल गया और तमाम आस-पास के मुल्को इराक़, खुरासान तक इसकी शोहरत हुई और ये मज़हब फ़ैला|

तकलीद की मज़म्मत(विरोध)
अल्लाह ने क़ुरान मे फ़रमाया : इन लोगो ने अल्लाह को छोड़ कर अपने आलिमो और दुर्वेशो अपना रब बना रखा हैं और मरयम के बेटे ईसा को | हांलाकि उन्हें सिवाये अल्लाह के किसी और की इबादत का हुक्म ना दिया गया था जिसके सिवा कोई माबूद नही वो पाक हैं इनके शरीक मुकर्रर करने से|
(सूरह तौबा 9/31)

इमाम फ़खरुद्दीन राज़ी इस आयत की तफ़सीर अपनी तफ़सीर कबीर मतबुआ इस्ताम्बुलजिल्द जिल्दसाजी पेज 623 मे फ़रमाते हैं-
अकसर मुफ़्फ़सरीन कहते हैं की इस आयत मे अरबी लफ़्ज़ अरबाब से मुराद ये नही की यहुदी और ईसाई ने अपने मौलवियो और दुर्वेशो को खुदा बना लिया बल्कि इससे मुराद ये है के उन्होने उनकी इताअत की थी और अपने मौलवियो और दुर्वेशो के हलाल ठहराने को हलाल जानते और हराम ठहराने को हराम जानते|

इस आयत के बारे मे जब हज़रत अदी बिन हातिम रज़ि0 ने अल्लाह के रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम से पूछा के ऐ अल्लाह के रसूल हम तो अपने आलिमो और दुर्वेशो को अपना रब नही ठहराते| तो अल्लाह के रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया| क्या तुम उनके हराम की गयी चीज़ को जो अल्लाह ने हलाम की थी हराम ना जानते थे और क्या तुम उनके हलाल की गयी चीज़ जिसे अल्लाह ने हराम किया हलाल ना जानते थे| हज़रत अदी बिन हातिम रज़ि0 ने कहा हा ऐसा ही होता था तो अल्लाह के रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया "यही उनकी इबादत हैं" |


तकलीद का हदीस से जायेज़ा
हज़रत जाबिर रज़ि0 से रिवायत हैं : के हज़रत उमर रज़ि0 नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के पास तौरात का एक नुस्खा लाये और कहा ऐ अल्लाह के रसूल ये तौरात क नुस्खा है और पढ़ना शुरु किया और नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम क चेहरा सुर्ख होने लगा तो हज़रत अबु बक्र रज़ि0 ने कहा गुम करे तुझे तेरी मां, क्या नही देखता तू उस चीज़ को रसूल अल्लाह सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के चेहरे पर हैं| हज़रत उमर रज़ि0 ने नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के चेहरे की तरफ़ देखकर फ़रमाया मैं अल्लाह की पनाह मांगता हूं उसके गज़ब से और रसूल अल्लाह सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के गज़ब से| हम अल्लाह के रब होने पर और इस्लाम के दीन होने पर और मुहम्मद सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के नबी होने पर राज़ी हुए|

फ़िर नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने फ़र्माया : कसम हैं उस ज़ात की जिस के हाथ मे मुहम्मद की जान हैं अगर मूसा तुम्हारे वास्ते ज़ाहिर होते और मुझे छोड़ कर तुम उनकी पैरवी करते तो सीधी राह से भटक जाते और अगर मूसा ज़िन्दा होते और मेरी नबूवत पाते तो सिवाए मेरी पैरवी के उनके पास कोई चारा न होता|"
(मिश्कात)

सहाबा रज़ि0, ताबईन रह0, और ताबाअ ताबईन से
हज़रत उमर रज़ि0 फ़रमाते थे कसम हैं उस ज़ात की जिस के कब्ज़े मे उमर की जान हैं नही कब्ज़ की अल्लाह ने अपने नबी रुह और न उठाया उन से वह्यी को यहां तक की बेपरवाह कर दिया अपनी उम्मत को राय से|
[ मीज़ान शीरानी मतबुआ मिस्र जिल्द 1 पेज 47 मे हैं ]

हज़रत उमर रज़ि0 जब कोई फ़त्वा देते तो कहते कि ये उमर कि राय हैं अगर ठीक हैं तो अल्लाह की तरफ़ से समझो वरना खता हो तो उमर कि तरफ़ से|
[ मीज़ान शीरानी जिल्द 1 पेज 47 मे हैं ]

शरीह रह0 कहते हैं कि हज़रत उमर ने मुझे खत लिखा इस मे ये था कि अगर कोई मसला दरपेश हो और कुरान मे हो तो इससे फ़ैसला करना, अगर ऐसी चीज़ पेश आये जो कुरान मे नही हैं तो इसका फ़ैसला सुन्न्त रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के मुताबिक करना, अगर असला कोई ऐसा पेश आये जो न कुरान मे हो न हदीस रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम मे हो तो अगर लोग किसी बात पर मुत्तफ़िक हो गये तो इस पर अमल करना| अगर अगर ऐसा मामला पेश आये जो न कुरान मे हो न हदीस मे हो न तुम से पहले इसे किसी ने कहा हैं तो तुझे इख्तेयार हैं कि इन दो बातो मे से एक पंसद करे| एक ये कि इज्तेहाद करके अपनी राय से फ़ैसला करे दूसरा ये के सुकूत कर और कोई फ़ैसला न कर| मेरी राय मे तेरे वास्ते सुकूत बेहतर हैं|
[हुज्जतुल बलाग मतबुआ सिद्दीकी बरेली पेज 154 ]

हज़रत जाबिर बिन जैद रज़ि0 से अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि0 ने फ़रमाया
कि तुम बसरा के फ़कीहो मे से हो इसलिये हमेशा फ़त्वा कुरान व हदीस के मुवाफ़िक ही देना अगर ऐसा न करोगे तो खुद भी हलाक होगे और हलाक करोगे|
[ हुज्जातुल बलाग पेज 153 ]

हज़रत अबुद्ल्लाह बिन मसऊद रज़ि0 फ़रमाते थे तकलीद करे कोई मर्द किसी मर्द की अपने दीन मे (इस तरह) की अगर ईमान लाये तो वो ईमान लाये ये और अगर काफ़िर करे वो तो काफ़िर करे ये|
[ मीज़ान शीरानी जिल्द 1 पेज 47 ]

हज़रत इब्ने मसऊद रज़ि0 फ़रमाते हैं
के कोई शख्स दीन के बारे मे किसी की तकलीद न करे क्योकि अगर वो मोमिन रहा तो इसका मुकल्लिद भी मोमिन रहेगा और अगर वो काफ़िर हुआ तो इसका मुकल्लिद भी काफ़िर रहेगा| बस बुराई मे किसी की पैरवी नही|
[ अल्लामा अलमौकईन मतबूआ अशरफ़ अल मताबेए जिल्द 1 पेज 217 ]

शाअबी रह0 कहते थे
कि कयास वालो के पास मत बैठो वरना तू हलाल को हराम और हराम को हलाल कर देगा|
[ अल्लामा अल मौकईन जिल्द 1 पेज 94 ]

दाऊद बिन अबी हिन्द रह0 कहते हैं
कि इब्ने सीरिन ने कहा की पहले जिस ने क्यास किया वो शैतान हैं और सूरज और चांद कि क्यास ही से इबादत की गयी हैं|
[ दारमी पेज 25 ]

मुजाहिद अपने शागिर्द से कहते थे
कि मेरी हर बात और हर फ़त्वा मत लिखा करो सिर्फ़ हदीस रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम को लिखने के कायल रहो शायद कि मैं आज जिन चीज़ो का हुक्म देता हूं कल इससे रुजु कर लूं|
[ मीज़ान जिल्द 1 पेज 48 ]


तकलीद की मनाही इमामो के कौल से
चारो इमाम से साबित हो चुका हैं कि उन्होने लोगो को अपनी तकलीद से मना किया हैं और यही हुक्म दिया हैं कि जब कोई बात उन को किताब व सुन्नत से मालूम हो जाये जो उनकी बात के खिलाफ़ हो तो इसी बात को ले जो किताब व सुन्नत से मालूम हुई हो और उन की बात को छोड़ दे|
[ फ़तावा इब्ने तैमिया मतबुआ मिस्र पेज 406 ]

इमाम अबू हनीफ़ा का हुक्म
इमाम अबू हनीफ़ा रह0 से किसी ने पूछा अगर आपने कुछ कहा और कुरान इस के खिलाफ़ हो, इमाम अबू हनीफ़ा रह0 ने जवाब दिया मेरी बात छोड़ दो| इसने फ़िर पूछा कि अगर नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम की हदीस आपकी बात के खिलाफ़ हो तो, इमाम अबू हनीफ़ा रह0 ने जवाब दिया मेरी बात छोड़ दो| इसने फ़िर पूछा अगर सहाबा रज़ि0 की बात आपकी बात के खिलाफ़ हो तो, इमाम अबु हनीफ़ा रह0 ने जवाब दिया मेरी बात छोड़ दो|
[ - ]

इमाम आज़म(अबु हनीफ़ा) रह0 ने अपने इस कौल से इशारा किया हैं कि जो नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम से पहुंचे वो सर आंखो कुबूल हैं, जो सहाबा रज़ि0 से पहुंचे इस मे इन्तिखाब करेंगें और जो सहाबा क सिवा ताबईन रह0 वगैराह से पहुंचे तो वो आदमी हैं और हम भी आदमी हैं|
[ मीज़ान शीरानी मतबुआ मिस्र पेज 29 ]

कलमात तैयबात मतबुआ मताला अलउलूम मे इमाम अबु हनीफ़ा रह0 क कौल नकल फ़रमाते हैं कि- "जब सही हदीस मिल जये तो वही मेरा मज़हब हैं|"
[ कलमात तैयबात मतबुआ मताला अलउलूम पेज 30 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 फ़रमाते थे कि लोग हिदायत पर रहेंगे जब तक कि उन मे हदीस के तलब करने वाले होंगें जब हदीस को छोड़ कर और चीज़ तलब करेंगे तो बिगड़ जायेंगे|
[ मीज़ान सफ़ा 49 ]

हदीसे मर्सल हमरे लिये हुज्जत हैं|
[ ऐनी शरह हिदाया मतबुआ जिल्द 1 पेज 253 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 फ़रमाते थे कि ज़ईफ़ हदीस मुझे ज़्यादा मह्बूब हैं लोगो कि राय से|
[ दुर्रे मुख्तार शरह दुर्रे मुख्तार मतबुआ देहली जिल्द 1 पेज 51 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 कहते हैं कि जो शख्स मेरी दलील से वाकिफ़ न हो उस को हक़ नही कि मेरे कलाम का फ़त्वा दे|
[ अकीदा अल जैद पेज 70 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 फ़रमाते हैं कि किसी को हलाल नही कि मेरी बात को माने जबकि ये न जाने की मैंने क्या कहा हैं, तो तकलीद से मुमानियत कि और मार्फ़त दलील कि जानिब तरगीब दी|
[ मुकदमा हिदाया जिल्द 1 पेज 93 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 फ़रमाते थे कि मेरी तकलीद मत करना और न मालिक रह0 कि और न किसी और कि तकलीद करना और अहकाम को वहा से ले जहा से उन्होने लिये हैं किताब व सुन्नत से|
[ मतबुआ फ़ारुकी से पेज 4 ]

इमाम मालिक का हुक्म
इमाम मालिक रह0 फ़रमाते थे मैं भी एक आदमी हूँ कभी मेरी राय सही और कभी गलत होती हैं, तुम मेरी राय को देख लो जो किताब व सुन्नत के मुताबिक हो इसको ले लो और जो मुखालिफ़ हो इसे छोड़ दो|
[ जलबू अल मनफ़आता पेज 74 ]

हाफ़िज़ हमीद ने हकायत की हैं कि कानबी ने ब्यान किया कि मैं इमाम मालिक रह0 के मर्ज़ मौत मे उनके पास गया और सलाम करके बैठा तो देखा उन को रोते हुए| मैंने कहा आप क्यो रोते हैं| फ़रमाया ऐ कानबी मैं क्यो न रोऊ मुझ से बढ़ कर रोने के काबिल कौन हैं मैंने जिस जिस मसले मे राय से फ़त्वा दिया, मुझे ये अच्छा मालूम होता हैं कि उन मसले के बदले कोड़े से मैं मार खाता, मुझको इसमे गुन्जाईश थी काश मैं राय से फ़त्वा न देता|
[ तारीख इब्ने खलकान मतबुआ इरान जिल्द जिल्दसाज पेज 11 ]

इमाम शाफ़ई का हुक्म
इमाम शाफ़ई रह0 फ़रमाते हैं जब मैं कहूँ और नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने मेरी बात के खिलाफ़ फ़रमाया हो तो, जो मसला नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम की हदीस से साबित हो वो अव्वल हैं, लिहाज़ा मेरी तकलीद मत करना|
[ अकदाल ज़ैद पेज 54 ]

इमाम शाफ़ई रह0 से रिवायत हैं वह फ़रमाया करते थे जब सहीह हदीस मिल जाये तो वही मेरा मज़हब हैं| एक और रिवायत मे हैं कि जब मेरी बात को हदीस के खिलाफ़ देखो तो हदीस पर अमल करो और मेरी बात को दीवार पर मार दो| एक दिन मजनी से कहा कि ऐ इब्राहिम हर एक बात मे मेरी तकलीद न करना और इससे अपनी जान पर रहम करना, क्योकि ये दीन हैं| इसके अलावा इमाम शफ़ई रह0 ये भी फ़रमाया करते थे कि किसी कौल मे हुज्जत नही हैं सिवाये रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के| चाहे कहने वाले बहुत ज़्यादा क्यो न हो, और न किसी क्यास मे, और न किसी शै मे| यहां बात सिवाये अल्लाह और उसके रसूल की तसलीम करने के और कुछ नही हैं|
[ अकदाल ज़ैद पेज 80 ]

अल्लामा मरजानि हनफ़ी फ़रमाते हैं इमाम शाफ़ई रह0 ने फ़रमाया कि सब मुसल्मानो ने इत्तेफ़ाक किया है नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम कि हदीस से तो किसी की बात से हदीस ना छोड़ी जाये|
[ नज़रातूलहक मतबुआ बल्गार पेज 26 ]

इमाम शाफ़ई रह0 ने इमाम अहमद रह0 से कहा कि सही हदीस का इल्म तुम को हम से ज़्यादा हैं, जो हदीस सही हुआ करे वह मुझे बता दिया करो ताकि मैं इसी को अपना मज़हब करार दूँ|
[ हुज्जतुल बलाग मतबुआ सिद्दीकी पेज 153 ]

इमाम अहमद बिन हंबल का हुक्म
इमाम अहमद बिन हंबल रह0 फ़रमाते थे कि किसी को अल्लाह और उसके रसूल सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम के कलाम के साथ गुन्जाईश नही है|
[ अकदाल ज़ैद मतबूआ सिद्दीकी लाहौर पेज 81 ]

इमाम अहमद बिन हंबल रह0 के बेटे अब्दुल्लाह कहते हैं कि मैने अपने बाप अहमद बिन हम्बल रह0 से दरयाफ़्त किया कि एक शहर ऐसा हैं जहां एक मुहद्दीस हैं जो सही, ज़ईफ़ हदीस का इल्म नही रखता और एक सहाबुल राय हैं| अब आप फ़रमाये कि मैं किस से फ़तवा पूंछू| तो इमाम अहमद बिन हंबल रह0 सहाबुल हदीस से पूछो सहाबुल राय से नही|
[ मीज़ान शअरानी मे मतबुआ मिस्र जिल्द जिल्ददार पेज 51 ]

इमाम अहमद बिन हम्बल रह0 फ़रमाते थे कि अपना इल्म इसी जगह से लो जहां से इमाम लेते हैं और तकलीद मत करो क्योकि ये अंधापन हैं, समझे|
[ मीज़ान शअरानी मतबुआ मिस्र जिल्द जिल्ददार पेज 10 ]

इमाम अहमद बिन हम्बल रह0 फ़रमाते थे और फ़रमाया करते थे कि मेरी तकलीद न करना और न मालिक कि और न औज़ाई कि और न किसी और कि तकलीद करना और अहकाम को वहां से लेना जहां से उन्होने लिये हैं(किताब और सुन्नत)|
[ अकदाल ज़ैद मतबुआ सिद्दीकी लाहौर पेज 81 ]

इस तरह हर दौर के बुज़ुर्गो ने इस उम्मत पर आने वाली तबाही को पहले ही भांप लिया था और वक्त ब वक्त इससे आगाह करते रहे मगर अफ़सोस उम्मत गहरी गुमराहीयो मे गुम हो गयी और उस गुमराही को ही हक समझ बैठी और जो लोग कुरान और सुन्नत के पांबन्द हैं या पांबदी करने की कोशिश करते हैं उन्हें बदमज़हब का खिताब दे देते हैं|

अल्लाह कुरान मे फ़रमाता हैं और जो लोग अल्लाह कि उतारी हुई वह्यी(कुरान और सुन्नत) के साथ फ़ैसला न करें वो काफ़िर हैं|
[ सूरह माइदा 5/44 ]

इमाम अबू हनीफ़ा रह0 के इन्तेकाल के 278 साल के बाद 428 हिजरी मे उनकी तरफ़ मन्सूब करके पहली किताब कुदुरी लिखी गयी, फ़िर 573 हिजरी मे हिदाया लिखी गयी जिसे क़ुरान की तरह माना गया|(नाऊज़ोबिल्लाह) और ढ़ेरो मनगंढत मसले इमाम अबू हनीफ़ा कि तरफ़ मंसूब कर दिये गये और धीरे-धीरे लोग इस मज़हब पर एक के बाद एक जमा होते गये और हिन्दुस्तान मे इस मज़हब की बुनियाद पड़ गयी और अब तो हनफ़ी मसलक के भी अनगिनत टुकड़े हो गये|

नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम का इर्शाद हैं हज़रत अबू हुरैरा रज़ि0 रिवायत करते हैं कि नबी सल्लल लाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – मेरी उम्मत एक ज़माने तक तो कुरान व सुन्नत पर अमल करती रहेगी इसके बाद उम्मती उम्मतीयो कि राय पर चलने लगेगा तो उम्मत गुमराह हो जयेगी|
[ इब्ने कसीर ]

बैतुल्लाह मे चार मुसल्ले
चोथी सदी हिजरी मे तकलीद निकली फ़िर तकलीदी मज़हब पैदा हुये फ़िर इनकी आपस मे इख्तेलाफ़ शुरु हुये|
हनफ़ी शाफ़ई मे इतना इख्तेलाफ़ बढ़ा कि एक दूसरे के पीछे नमाज़ न पढ़ते थे यहां तक की 665 हिजरी मे मिस्र मे चारो मज़हबो के चार काज़ी बना दिये गये| इसके बाद 900 हिजरी के शुरु मे बैतुल्लाह के अंदर चार मुसल्ले बना दिये गये| हालत ये थी जब एक इमाम जमात करा रहा होता तो तीन मसलक के दूसरे नमाज़ी बैठे रहते और एक दूसरे के पीछे नमाज़ नही पढ़ते|

वत तखेज़ू मिम मकामे इब्राहीमा व मुसल्ला की मिसाल को तकलीदी मज़हब ने पारा पारा कर दिया था| सुल्तान इब्ने मसूद रह0 कि कब्र को अल्लाह नूर से भरे कि जब अल्लाह ने उसे हिजाज़ का बादशाह बनाया तो उसने 1343 हिजरी मे बैतुल्लाह से इस बिदअत को मिटा दियाऔर चारो मुसल्लो को ढहा दिया और अल्हम्दुलिल्लाह अब एक ही मुसल्ले पर नमाज़ होती हैं|

सबसे ज़्यादा गौर फ़िक्र की बात ये हैं के आज जो मसलकी तकलीद का दम भरते हैं उनको तो शायद ये भी नही पता के जिन इमाम की तकलीद वो करते हैं खुद उन्होने या उनकी पिछ्ली पुश्त ने उनकी पिछली की पिछली पुश्त ने भी तकलीद को नही जाना सिवाये कुरान और हदीस के| सिर्फ़ सहाबा की जमात थी जो हर मसले का हल कुरान और हदीस से लेती थी लिहाज़ा जो कोई भी कुरान और हदीस से हट कर कही और से किसी और से मसले का हल तलाश करेगा वो खुली गुमराही मे पड़ जायेगा|

Posted by : Islam The Truth

Tuesday, October 27, 2015

मुख़्तसर सहीह अल बुखारी हिंदी में


بِسْــــــــــــــــــمِ اﷲِالرَّحْمَنِ اارَّحِيم
मुख़्तसर सहीह अल बुखारी हिंदी में

नबी ए करीम की आखरी बात मैं अपने पीछे इस धरती पर दो चीज़े छोड़ कर जा रहा हूँ. अगर तुम इनको मजबूती से पकड़े रहोगे तो कभी गुमराह नही होंगे. वह है क़ुरान और मेरा तरीका ( हदीस). जो मेरा आवाज़ सुन रहा है वा उन लोगो तक पहुचा देना जो मेरा आवाज़ नही सुन रहा है. और वह लोग उनको जो उनके आगे आने वाले है, और बेहतर मेरे बातों को समझेगे. ए अल्लाह गवाह रहना हम ने सारे तेरे संदेश लोगो तक पहुँचा दिए. 

यह पुस्तक “मुख़्तसर सही बुख़ारी”, जिसका नाम “अत्तजरीदुस्सरीह लि-अहादीसिल जामिइस्सहीह” है, क़ुरआन करीम के बाद सबसे विशुद्ध और विश्वसनीय किताब सही बुख़ारी का संक्षेप है। इसमें इमाम अज़्ज़ुबैदी ने सहीह बुखारी की हदीसों को बिना तकरार के व बिना सनदों के उल्लेख किया है; ताकि बिना कष्ट के उसको याद करना आसान हो जाए। जो हदीस कई बार आई है उसे उसके पहले स्थान पर बाक़ी रखा है, यदि दूसरे स्थान पर उसमें कोई वृद्धि है तो उसे उल्लेख किया है अन्यथा नहीं। अगर एक मुख्तसर हदीस के बाद दूसरी जगह वह तफ्सील और वृद्धि के साथ आई है तो दूसरी हदीस को वर्णन किया है। तथा केवल उसी हदीस का चयन किया है जो सहीह बुख़ारी में मुत्तसिल व सनद के साथ है। मक़तूअ या मुअल्लक़ हदीस को छोड़ दिया है। यह पुस्तक इस किताब के उर्दु अनुवाद से हिंदी में रुपांतरित की गई है।

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